रविवार, 22 जनवरी 2017

नेशन फर्स्ट से इंडिया फर्स्ट को ओर प्रयाण



मित्रों,आपने अगर अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के शपथ-ग्रहण के बाद दिए गए पहले संबोधन को देखा-सुना होगा तो एक बात पर जरूर गौर किया होगा कि उन्होंने देशवासियों से एक बार फिर से अमेरिका को दुनिया का सिरमौर बनाने की दिशा में कार्य करने की अपील की.
मित्रों,सौभाग्यवश आज भारत में भी एक ऐसा स्वप्नदर्शी प्रधान सेवक है जो नेशन फर्स्ट की बात करता है.परन्तु सिर्फ नेशन फर्स्ट की बात करने से काम नहीं चलनेवाला है.वह समय आ गया है जब भारत भी नेशन फर्स्ट से इंडिया फर्स्ट की ओर प्रस्थान करे.सोंचनेवाली बात यह है कि अगर अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति बन सकता है तो भारत क्यों नहीं बन सकता? भारत के पास ऐसा क्या नहीं है जो अमेरिका के पास है? मानव संसाधन से लेकर प्राकृतिक संसाधन तक प्रत्येक मामले में हमारा भारत प्राचीन काल से ही धनी रहा है.अगर हमारे पास कोई कमी है तो वो है जोश,ईमानदारी,एकता और निःस्वार्थता की और इन सब कमियों को पूरा करने के लिए हमें अपने ज्यादा-से-ज्यादा देशवासियों में नेशन फर्स्ट का जज्बा भरना होगा.दो-चार प्रतिशत लोग तो हर देश में यहाँ तक कि अमेरिका में भी हमेशा-से देशविरोधी रहे हैं.
मित्रों,जब हम २०१४ के लोकसभा चुनाव् के परिणामों को देखें तो हमें मानना ही पड़ता है कि आज भी देश की बहुसंख्यक जनसंख्या की प्राथमिकता सूची में कहीं-न-कहीं देश मौजूद है भले ही पहले स्थान पर नहीं हो.अगर केंद्र सरकार वास्तव में भारतीयों के लिए देश को सर्वोच्च स्थान पर लाना चाहती है तो उसे लगतार ऐसे कदम उठाने पड़ेंगे जिससे ऐसा प्रतीत होता रहे कि वो वास्तव में नेशन फर्स्ट की नीति पर पूरी गंभीरता के साथ अग्रसर है.जिस दिन सवा सौ करोड़ भारतीयों में से सौ करोड़ लोगों के लिए राष्ट्र सर्वोपरि हो जाएगा भारत के दुनिया में सर्वप्रथम होने का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाएगा बस जरुरत पड़ेगी देश को सही दिशा देने की.तब किसी नरश्रेष्ठ नरेन्द्र को न तो राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनावों के लिए चिंता करनी पड़ेगी और न ही लोकसभा चुनाव परिणामों की.

सोमवार, 16 जनवरी 2017

मेरी सरकार मर गयी है हुजूर



मित्रों,मैंने ६ मार्च,२०१४ को एक आलेख लिखा था जिसका शीर्षक था मेरी सरकार खो गयी है हुजूर. यद्यपि वह आलेख भी मैंने बिहार सरकार की घनघोर अकर्मण्यता से परेशान होकर लिखा था तथापि उन दिनों मैं परेशान केंद्र सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार और उसकी देशविरोधी नीतियों से भी था. नरेन्द्र मोदी जी और भारत की जनता-जनार्दन की कृपा से इन दिनों केंद्र में तो जरूर एक ऐसी सरकार आ गयी है जो सिर्फ और सिर्फ देश की भलाई के लिए काम कर रही है लेकिन बिहार में अभी भी न सिर्फ स्थिति वही है जो ६ मार्च,२०१४ को थी बल्कि उस समय की तुलना में और भी ख़राब ही हो गयी है.
मित्रों,हमारे गाँवों में जब कोई घर छोड़कर भाग जाता है और १२ सालों तक वापस नहीं आता है तो गाँव के लोग मान लेते हैं कि वो मर गया होगा और तब उसका श्राद्ध कर दिया जाता है. पता नहीं सरकार के लापता हो जाने के कितने दिनों के बाद मान लेना चाहिए कि सरकार मर गयी है. शास्त्र और स्मृति भी इस बारे में खामोश हैं. वैसे बिहार सरकार में मृतकों वाले सारे लक्षण मौजूद जरूर हैं. अब कोई डीका नौकरशाही द्वारा मुन्नीबाई के कोठे में बदल दिए गए अंबेकर छात्रावास में दुष्कर्म के बाद मार दी जाती है और प्रशासन पूरे मामले की लीपा-पोती कर देता है, गुजरात की देखा-देखी राज्य सरकार पतंग-उत्सव का आयोजन तो कर लेती है लेकिन लोग आयोजन-स्थल पर कैसे आएंगे-जाएंगे का इंतजाम नहीं करती और जब कई दर्जन परिवार तबाह हो जाते हैं तो बलि का बकरा गरीब-लाचार नाववाले को बना देती है. मार्च,२०१४ में लोग-बाग़ हमसे कहा करते थे कि बिहार की नौकरशाही इन दिनों सिर्फ मीडिया से ही डरती है. मगर आज स्थिति यह है कि राजदेव रंजन की दिनदहाड़े हत्या के बाद वो मीडिया का भय भी उसके मन से जाता रहा. मतलब कि अब बिहार की सरकार पूरी तरह से संवेदनहीन हो चुकी है.
मित्रों,कहने का मतलब यह है कि अबतक जो सरकार उलटी सांस ले रही थी उसकी पूरी तरह से मौत हो चुकी है. अब बिहार में ऐसी कोई संस्था नहीं रही जो जनता को नौकरशाही के क्रूर दमन-चक्र से बचा सके. अब तो हालत ऐसी है कि हम मीडियावाले खुद ही अफसरशाही से डरने लगे हैं. ऐसा भी नहीं है कि बिहार के लोग इस बात से अनभिज्ञ हैं कि ऐसा परिवर्तन कैसे आया. सीधी-सी बात है कि जब राजा ने ही मीडिया पर ध्यान देना बंद कर दिया है और उसे बेकार में कांव-कांव करनेवाला कौआ मानकर पूरी तरह से अनसुना करना शुरू दिया है तो फिर अफसरशाही क्योंकर उसे भाव देगी. लेकिन राजा साब यह भूल गए हैं कि यह मीडिया को उनके द्वारा दिया जानेवाला महत्व ही था जो उसके शासन को जीवंत बनाता था. बात इतनी होती तो फिर भी गनीमत थी लेकिन अब तो लगता है कि राजा साब ने मीडिया को अपना हितैषी तो दूर दुश्मन ही मानना शुरू कर दिया है. कदाचित राजा साब खुद को सचमुच में चुना हुआ नुमाईन्दा मानने के बदले राजा मानने लगे हैं. इतना ही नहीं वे लुई १४वें की तरह यह भी मानने लगे हैं कि वे हीं राज्य हैं और उनके कहे शब्द ही कानून. आगे मैं यह नहीं कह सकता कि बिहार में कब क्रांति होगी और किस रूप में और किस तरह होगी लेकिन होगी तो जरूर लुई १४वें न सही १६वें के समय ही सही लेकिन बास्तिल का किला ढहेगा,जरूर ढहेगा.

शनिवार, 14 जनवरी 2017

बिहार में धड़ल्ले से हो रही है शराब की होम डिलीवरी

मित्रों,यह तो आप भी जानते हैं कि हम हमेशा से पीने और पिलाने के खिलाफ रहे हैं. हमने तब शराब पीना समाज के लिए हानिकारक है शीर्षक से आलेख लिखा था. अच्छी बात है कि नीतीश कुमार जी ने हमारी बातों पर कान दिया और राज्य में इस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया. लेकिन बिहार ऐसे ही बिहार थोड़े है. सरकार डाल-2 तो बिहारी पात-2. सो शुरू हो गई तस्करी.
मित्रों,अब तो स्थिति ऐसी है कि कुआँ खुद प्यासे के पास आने लगा है. मतलब कि बांकी चीज़ों की तरह शराब की भी होम डिलीवरी होने लगी है. सेवा की गुणवत्ता के मामले में स्नैपडील भी इनकी बराबरी नहीं कर सकती है. इधर फ़ोन किया नहीं कि उधर माल हाजिर.
मित्रों,कुछ लोग तर्क देते हैं कि इस सुविधा का लाभ तो केवल अमीर लोग उठाते हैं ग़रीबों का तो पैसा बच रहा है न. अगर आप भी ऐसा मानते हैं तो ग़लत मानते हैं. बल्कि ग़रीबों की जेबों पर भी शराबबंदी भारी पड़ रही है. हम समझाते हैं आपको. पहले 20 रुपया के पॉलिथीन में उनका काम चल जाता था. अब उतना ही मिज़ाज बनाने के लिए उनको 3 बोतल ताड़ी पीनी पड़ती है जो 60 रुपए की आती है.
यहाँ हम यह भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि बिहार सरकार किसी भी कीमत पर ताड़ी की बिक्री को रोक नहीं सकती है क्योंकि इसके लिए उसको सारे ताड़ के पेड़ों को कटवाना पड़ेगा जो संभव नहीं है. फिर जो सरकार शराब की बिक्री को नहीं रोक पाई ताड़ी को क्या रोकेगी.
मित्रों,ऐसा नहीं है कि हम अब नशामुक्त समाज के समर्थन नहीं हैं लेकिन सरकार को उसकी विफलता के प्रति आगाह करना भी तो हमारा ही काम है. इसलिए अच्छा होगा कि नीतीश जी अपने हाथों अपना ढिंढोरा पीटने के बदले शराब की तस्करी और अवैध निर्माण को रोकें. इस आलेख को भी हमने इस उम्मीद में लिखा है कि नीतीश जी इस बार भी हमारी बातों पर कान देंगे.

बुधवार, 11 जनवरी 2017

मोदी जी कब चलेगा भ्रष्ट पुलिस पर सुधार का डंडा

मित्रों,यह बात सर्वविदित है कि पुलिस चाहे वो किसी भी राज्य की हो उस राज्य की सबसे भ्रष्ट संस्था है.बिहार में तो दारोगा शब्द का विशेष तरीके से शब्द-विस्तार भी किया जाता है कि द रो के या गा के.मतलब कि पुलिस का काम ही रिश्वत खाना है वो आज से नहीं अंग्रेजों के ज़माने से ही.हो भी क्यों नहीं भारतीय पुलिस का न सिर्फ ढांचा बल्कि उसको पावर देनेवाले कानून भी अंग्रेजों के ज़माने के हैं.और यह तो हम सभी जानते हैं कि अंग्रेजों ने भारत पर कब्ज़ा कोई परोपकार की भावना से ओतप्रोत होकर नहीं किया था बल्कि भारत को अनंत काल तक लूटने के लिए किया था.इसलिए जाहिर है कि हमारी पुलिस का ढांचा और हमारे कानून आज भी देश को लूटने की दृष्टि से वर्तमान हैं.
मित्रों,कई साल पहले मैंने राजनीतिक दलों को मिलनेवाले चंदे में होनेवाली गड़बड़ियों के बारे में ७ अप्रैल,२०११ को एक आलेख लिखा था कि कैसे बांधे बिल्ली खुद अपने ही गले में घंटी.यह ख़ुशी की बात है कि एक लंबे इंतज़ार के बाद लंबी तपस्या के उपरांत भारत में एक ऐसा प्रधान सेवक सत्ता में आया है जो अपने साथ-साथ सबके गले में घंटी बांधने को न सिर्फ तैयार है बल्कि तत्पर भी है.
मित्रों,हम अपने देश के उसी प्रधान सेवक से हाथ जोड़कर विनती करते हैं कि देशभर की पुलिस को लुटेरी से सेविका बनाने के लिए संसद से कानून बनवाएं और देश की जनता की इन कथित रक्षकों के अत्याचार से रक्षा करें.वैसे भी पुलिस से परेशान गरीब,कमजोर और अनपढ़ लोग ही ज्यादा हैं क्योंकि पुलिस गांधीजी के ज़माने से लेकर आज तक अमीरों की रखैल है.प्रधानसेवक जी भ्रष्टाचार को अगर जड़ से उखाड़कर उसकी जड़ में मट्ठा डालना है तो पहली प्राथमिकता निश्चित रूप से इस सबसे भ्रष्ट विभाग को देनी होगी.हमें इंतज़ार रहेगा कि आप इस दिशा में क्या कदम उठाते हैं.देश को बदलना है तो देश के हर विभाग का कायाकल्प करना होगा.

शनिवार, 7 जनवरी 2017

भाजपा के लिए बहत कठिन है डगर यूपी की


मित्रों,यूं तो हर चुनाव महत्वपूर्ण होता है लेकिन जब चुनाव यूपी में हो तो बात अलग हो जाती है.बात दरअसल यह है कि एक लम्बे समय तक ऐसा माना जाता रहा है कि दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर जाता है.जनसंख्या के दृष्टिकोण से भी यूपी एक राज्य नहीं बल्कि महादेश है.चाहे केंद्र में किसी की भी सरकार क्यों न हो बिना यूपी का विकास किए भारत के विकास के बारे में वो सोंच भी नहीं सकती.सवाल है कि कैसे हो यूपी का विकास?तभी होगा जब वहां की जनता चाहेगी.विकास जबरदस्ती तो किया नहीं जा सकता.
मित्रों,सौभाग्यवश उसी यूपी में अगले महीने चुनाव होने जा रहा है.सुप्रीम कोर्ट चाहे जितना भी ऑर्डर-ऑर्डर कर ले यूपी में चुनाव जाति और धर्म के नाम पर लडे जाते रहे हैं और इस बार भी लडे जाएंगे.मायावती ने उम्मीदवारों की घोषणा से पहले ही सीटों का जातीय और सांप्रदायिक विभाजन करके इसकी विधिवत शुरुआत भी कर दी है.आगे यह यूपी की जनता को निर्णय लेना है कि उनको पिछले ७५ साल की तरह जाति चाहिए या विकास चाहिए.
मित्रों,यहाँ मैं भारतीय जनता पार्टी से उम्मीद रखता हूँ कि वो कम-से-कम उन गलतियों को तो नहीं दोहराए जो उसने बिहार विधानसभा चुनावों के समय की थी और बिहार को विनाश की राह पर धकेल दिया था.सबसे पहले तो भाजपा को अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर देना चाहिए.साथ ही उम्मीदवारों का चयन बिहार की तरह पैसे लेकर नहीं बल्कि जीत की सम्भावना को देखते हुए करना चाहिए.इन दोनों कामों को करने के लिए गहन सर्वेक्षण की आवश्यकता होगी.बूथ मैनेजमेंट तो हर चुनाव में महत्वपूर्ण होता ही है.साथ ही भाजपा को अपने बूते पर चुनाव जीतने की तैयारी करनी होगी न कि दूसरे दलों में चल रहे कलह के बल पर चुनाव जीतने के सपने देखने चाहिए.हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए प्रशांत किशोर पूरी कोशिश करेगा कि यूपी में भी महागठबंधन हो जाए और अगर ऐसा होता है तो क्या करना है के लिए भी पूरी तैयारी रखनी होगी.हम जानते हैं कि रसायन शास्त्र में २ और २ बाईस होता है लेकिन बिहार चुनाव ने साबित कर दिया है कि २ और २ हर बार २२ ही नहीं होता शून्य भी हो सकता है.
मित्रों,साथ ही नोटबंदी के समय नकद निकासी की जो सीमा निर्धारित की गयी थी उसमें क्रमशः ढील देनी चाहिए क्योंकि मैं अपने अनुभव के आधार पर कहता हूँ कि इससे काफी परेशानी हो रही है.अब बेनामी संपत्ति के खिलाफ युद्ध छेड़ा जाना चाहिए और सारे गड़े हुए कालेधन को पाताल से भी बाहर निकालना चाहिए क्योंकि अगर कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम को नोटबंदी से आगे नहीं बढाया जाता है तो जनता के बीच ऐसे संकेत जाएंगे कि मोदी सरकार ने भी सिर्फ दिखावा किया जिसके फलस्वरूप नोटबंदी के कारण अभी जो लाभ भाजपा को मिलता दिख रहा है वो समाप्त तो हो ही जाएगा साथ ही नुकसानदेह भी हो जाएगा.

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

नोटबंदी, तुगलक और मोदी



मित्रों, क्या आप बता सकते हैं कि दुनियाभर में इतिहास क्यों पढ़ा-पढाया जाता है?  इतिहास कोई साहित्य नहीं है जिसका केवल रसानंद लिया जाए बल्कि इतिहास सबक सीखने के लिए भी है. इतिहास गवाह है कि हमारे देश पर १३२५ से १३५ ई. तक मुहम्मद बिन तुगलक नामक व्यक्ति ने शासन किया था. उसने सांकेतिक मुद्रा सहित कई प्रयोग किए थे लेकिन उनको सही तरीके से लागू न करवा पाने के चलते बुरी तरह असफल हुआ था.
मित्रों, कई लोग ८ नवम्बर के बाद हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तुलना तुगलक से करने लगे हैं. हमने घर बनाने में नकद की कमी से परेशान रहने के बावजूद पहले भी कहा है कि नोटबंदी अच्छा कदम है लेकिन तभी जब मोदी बैंक प्रबंधकों पर नियंत्रण कर सकें. दुर्भाग्यवश ऐसा होता दिख नहीं रहा है. कुछेक बैंक वाले पकडे भी जा रहे हैं लेकिन उनकी संख्या काफी कम है. बैंकवालों ने बड़ी संख्या में नए फर्जी खाते खोलकर मोदी सरकार की कालेधन के खिलाफ मुहिम को विफल साबित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा है. सरकार को चाहिए कि सारे बैंकों और बैंक अधिकारियों की जांच की जाए. साथ-ही-साथ आय कर अधिकारियों और जजों की संपत्ति की भी जाँच होनी चाहिए क्योंकि अंग्रेजी में एक कहावत है हू विल गार्ड द गार्ड.
मित्रों, अभी कुछ दिन पहले हमें अपुष्ट सूत्रों से जानने को मिला कि भारत के ११०० पंजीकृत राजनैतिक दलों में से ४०० ने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा. फिर इनके गठन का उद्देश्य क्या है?  क्या सूचना के अधिकार से बाहर होने के चलते राजनैतिक दल काले धन को सफ़ेद करने की फैक्ट्री बन गए हैं? सवाल उठता है कि जबकि बांकी सारे दलों की रैलियां नकद नहीं होने के चलते स्थगित हो गयी हैं भाजपा रैलियों के लिए कहाँ से और कैसे खर्च कर रही है?
मित्रों, कई लोग सरकार से सवाल पूछ रहे हैं कि जब सारी नकदी बैंक में आ गयी तो नोटबंदी से लाभ क्या हुआ. मगर वे यह भूल जाते हैं कि अब सारा पैसा सरकार के पास आ गया है और सरकार के लिए एक-एक खाते की जाँच करना कोई मुश्किल काम नहीं है जबकि हर घर पर छापा मारना नामुमकिन था. 
मित्रों,सारे सवालों के बावजूद कम-से-कम मैं अभी मोदी की तुलना तुगलक से करने की मूर्खता नहीं करूंगा और वेट एंड वाच की नीति का पालन करूंगा.आलेख का अंत मैं एक संस्कृत कहावत से करना चाहूँगा कि अगर कोई राजकीय योजना विफल होती है तो या तो राजा के सलाहकार मूर्ख हैं या फिर राजा अयोग्य.

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

जयललिता शून्य से शून्य तक



मित्रों, जब कोई नेता मरता है तो कसम से समझ में नहीं आता कि उसको किस रूप में याद करूँ। जयललिता को ही लीजिए। उनका नाम जेहन में आते ही मुझे सबसे पहले याद आता है कि कभी आय से ज्यादा धन रखने के अपराध में जेल गई थीं। आज से 20 साल पहले उनके पास से कई क्विंटल सोना-जवाहरात बरामद हुए थे। बाद में जयललिता ने इसका बदला भी लिया करूणानिधि को जेल भेजकर।
मित्रों, फिर हमारे जेहन में आता है तमिल राष्ट्रवाद। भुलाए नहीं भूलता कि जयललिता के लिए तमिलनाडु पहली प्राथमिकता था और अंतिम भी। जयललिता ने चुनाव जीतने के लिए हर पैंतरे का भरपुर उपयोग किया। लगभग हर चीज जनता को मुफ्त में दिया। खासकर तमिलनाडु की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था आज भी देश में सर्वोत्तम है। इन सबके बावजूद गरीबों को गरीब बनाकर रखा। चुनाव जीतने के लिए जयललिता भूल गई कि वो जन्मना ब्राह्मण है। वो भूल गई कि उनका भी कोई अपना है,अपना परिवार है। अस्पताल में उनके परिजनों को उनका दूर से दर्शन तक नहीं होने दिया गया। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है मृत्योपरांत उनका अंतिम संस्कार भी इस डर से नहीं किया गया कि कहीं ऐसा करने से द्रविड़ वोटबैंक नाराज न हो जाए या फिर लोग जान न जाएँ कि जयललिता का कोई परिवार भी है।
मित्रों, फिर याद आता है हमें कि किस तरह जयललिता ने स्व. एमजी रामचंद्रन की पत्नी को अपदस्थ कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कब्जा किया था। फिर किस तरह वो शशिकला के संपर्क में आई जो महत्त्वाकांक्षा में कहीं-न-कहीं उनसे भी बढ़कर थी। उसने उनको जहर देना शुरू कर दिया। फिर पोल खुलने के बाद दोनों अलग हो गए। बाद में न जाने क्यों जयललिता ने उसको फिर से अपने साथ कर लिया।
मित्रों, फिर याद आता है कि किस तरह उसने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को बिना वजह गिरा दिया था।
मित्रों, आज जयललिता जीवित नहीं है। पनीर सेल्वम एक बार फिर से मुख्यमंत्री बन चुके हैं लेकिन क्या वे सचमुच पार्टी में सर्वोच्च हैं? नहीं पहले जो जगह जयललिता की थी आज उस जगह पर शशिकला विराजमान हो चुकी हैं। कदाचित् जयललिता सरीखी वैसे नेताओं का अंत इसी तरह विधि ने लिखा होता है जो अपने परिवार से दूर रहकर राजनीति करते हैं। पहले कांशीराम के साथ भी लगभग ऐसा ही कुछ हुआ था। एनटी रामाराव के मामले में स्थिति जरूर उल्टी रही।
मित्रों, आप चाहे देवता बनकर जीयें या दानव बनकर उनको एक-न-एक दिन मरना तो होता ही है। जयललिता भी मरी,हम सब भी मरेंगे। खाली हाथ आए थे,खाली हाथ चले जाएंगे। रह जाएगी बस यादें और करनी।