शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

मोदी सरकार का मूर्ख बनाओ कार्यक्रम

मित्रों, मोदी सरकार के ५ साल पूरे होनेवाले हैं. अगर आपसे सरकार के काम-काज का निष्पक्ष होकर आकलन करने के लिए कहा जाए तो आपका निष्कर्ष क्या होगा राम जाने लेकिन हमारा तो वही आकलन होगा जो एक सच्चे राष्ट्रवादी का होना चाहिए.
मित्रों, क्या आपको याद है कि २०१४ में श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी ने क्या-क्या वादे किए थे? चलिए मैं याद दिला देता हूँ-१. मोदी जी ने वादा किया था कि वे १०० दिनों में विदेशों से कालाधन वापस लाएंगे.
२. एक साल में सारे दागी सांसदों-विधायकों पर मुकदमा चलवाकर फैसला करवाएंगे.
३. देश के पूर्वी हिस्से के तीव्र विकास के लिए प्रयास करेंगे.
४. भ्रष्टाचारियों को सजा दिलवाएँगे और उनके द्वारा लूटे गए धन-समाप्ति को बिना भेदभाव के जब्त करेंगे.
५. गंगा को फिर से प्रदूषण-मुक्त बनाया जाएगा.
६. महंगाई कम की जाएगी.
७. हर साल २ करोड़ रोजगार पैदा किए जाएँगे.
८. सरकारी अस्पतालों की स्थिति में सुधार किया जाएगा.
९. कृषकों की आमदनी की दोगुना किया जाएगा.
१०. पुलिस में सुधार किया जाएगा.
११. न्यायिक प्रक्रिया को सरल और तीव्र किया जाएगा.
१२. पाक समर्थित आतंकवाद का स्थायी ईलाज किया जाएगा.
१३. भारत न तो किसी को आँख दिखाएगा न ही किसी से आँखें चुराएगा बल्कि हर किसी से आँखों में ऑंखें डालकर बात करेगा.
१४. सबको अपना आवास उपलब्ध करवाया जाएगा.
१५. भारत की शिक्षा को वैश्विक स्तर का बनाया जाएगा.
१६. गरीबों का पैसा सीधे उनके खाते में डाला जाएगा.
१७. भारत से गरीबी का नामोनिशान मिटा दिया जाएगा. सबको अमीर बनाया जाएगा.
१८. देश के खजाने को सुरक्षित किया जाएगा और कोई खूनी पंजा इस पर हाथ नहीं डाल पाएगा.
१९. सारे बंगलादेशी घुसपैठियों को चिन्हित कर वापस भेजा जाएगा.
२०. भारत को वैज्ञानिक और तकनीकी अनुसन्धान में अग्रणी बनाया जाएगा.
२१. वे प्रधानमंत्री की तरह नहीं बल्कि प्रधान सेवक की तरह व्यवहार करेंगे.
२२. रुचि और प्रतिभा के आधार पर नामांकन को सुनिश्चित किया जाएगा.
२३. स्वायल हेल्थ कार्ड बनाया जाएगा और कृषि ऋण और फसल बीमा को सस्ता और सरल बनाया जाएगा.
२४. आधारभूत संरचना में सुधार किया जाएगा.
२५. २४ घंटे बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी.
आदि आदि.
मित्रों, चुनाव जीतने के बाद देश की प्रगति को समर्पित कई गीत मोदी सरकार ने बनाए-जैसे कि मेरा देश बदल रहा है, आगे चल रहा है. दुर्भाग्यवश आज यह गीत एक नारा भर बनकर रह गया है. देश तो नहीं बदला लेकिन भाजपा बदल गई, उसका कार्यालय बदल गया. भाजपा आज पापी नेताओं के पापों का नाश करनेवाली गंगा बन गई है. उसका कार्यालय दुनिया का सबसे बड़ा कार्यालय है और वो खुद दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी.
मित्रों, बांकी किस क्षेत्र में क्या काम हुआ है आप ऊपर वर्णित वायदों को सरसरी निगाह से देखकर भी आसानी से मूल्यांकन कर सकते हैं. बर्बादे गुलिस्ताँ के लिए बस एक ही उल्लू काफी है, हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामें गुलिस्तान क्या होगा. यानि देश को बर्बाद करना है तो वित्त मंत्री किसी मूर्ख को बना दीजिए. बस वो अर्थव्यवस्था का नाश कर देगा और बांकी विभाग खुद ही बर्बाद हो जाएँगे, पूरा देश तबाह हो जाएगा. नोटबंदी से क्या लाभ हुआ राम जाने लेकिन जीएसटी से व्यापक नुकसान जरूर हुआ है. राज्यों की कर वसूली तो घटी ही है केंद्र की भी घट गयी है. राज्य सरकार व विश्वविद्यालयों  के कर्मियों को ६-६ महीने से वेतन नहीं मिला है. बिहार और दिल्ली का तो मैं प्रत्यक्ष गवाह हूँ बांकी राज्यों का आपलोगों को बेहतर पता होगा. और उस पर तुर्रा यह है कि ऐसी हालत तब है जब अभी नए वेतनमान को लागू करना बांकी है उसके बाद वेतन चालू रहेगा या बिलकुल ही बंद हो जाएगा अरुण जेटली जाने या हमारी पॉकेटमार सरकार जाने जो इन दिनों टेलकॉम कंपनियों की तरह ग्राहकों के बैंक खातों से चुपके से पैसा खिसकाने में लगी हुई है. १५ लाख तो आए नहीं १५०० भी गए.
मित्रों, आपने ध्यान दिया होगा कि मोदी सरकार २०१९ की बात ही नहीं कर रही बल्कि २०२२ की बात कर रही है. ५ साल में कुछ अच्छा होता दिख नहीं रहा तो ३ सालों में क्या हो जाएगा और भारत को क्या बना दिया जाएगा? मुझे तो लगता है कि सिवाय मूर्ख के और कुछ नहीं. आपको क्या लगता है?
मित्रों, कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि मैंने पार्टी बदल ली है लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है. मैंने आज भी घनघोर राष्ट्रवादी हूँ. मेरे लिए मोदिभक्ति कभी देशभक्ति नहीं थी, नहीं है और न ही होगी.

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

वित्तीय आपातकाल की ओर अग्रसर भारत

मित्रों,  भारतीय संविधान में तीन आपातकाल वर्णित हैं- 1. राष्ट्रीय आपात - अनुच्छेद 352) राष्ट्रीय आपात की घोषणा काफ़ी विकट स्थिति में होती है. इसकी घोषणा युद्ध, बाह्य आक्रमण और राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर की जाती है.

2. राष्ट्रपति शासन अथवा राज्य में आपात स्थिति- अनुच्छेद 356) इस अनुच्छेद के अधीन राज्य में राजनीतिक संकट के मद्देनज़र, राष्ट्रपति महोदय संबंधित राज्य में आपात स्थिति की घोषणा कर सकते हैं. जब किसी राज्य की राजनैतिक और संवैधानिक व्यवस्था विफल हो जाती है अथवा राज्य, केंद्र की कार्यपालिका के किन्हीं निर्देशों का अनुपालन करने में असमर्थ हो जाता है, तो इस स्थिति में ही राष्ट्रपति शासन लागू होता है. इस स्थिति में राज्य के सिर्फ़ न्यायिक कार्यों को छोड़कर केंद्र सारे राज्य प्रशासन अधिकार अपने हाथों में ले लेती है.

3. वित्तीय आपात - अनुच्छेद 360) वित्तीय आपातकाल भारत में अब तक लागू नहीं हुआ है. लेकिन संविधान में इसको अच्छी तरह से परिभाषित किया गया है. अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपात की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा तब की जाती है, जब राष्ट्रपति को पूर्ण रूप से विश्वास हो जाए कि देश में ऐसा आर्थिक संकट बना हुआ है, जिसके कारण भारत के वित्तीय स्थायित्व या साख को खतरा है. अगर देश में कभी आर्थिक संकट जैसे विषम हालात पैदा होते हैं, सरकार दिवालिया होने के कगार पर आ जाती है, भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त होने की कगार पर आ जाए, तब इस वित्तीय आपात के अनुच्छेद का प्रयोग किया जा सकता है. इस आपात में आम नागरिकों के पैसों एवं संपत्ति पर भी देश का अधिकार हो जाएगा. राष्ट्रपति किसी कर्मचारी के वेतन को भी कम कर सकता है. गौरतलब है कि संविधान में वर्णित तीनों आपात उपबंधों में से वित्तीय आपात को छोड़ कर भारत में बाकी दोनों को आजमाया जा चुका है. भारत में कभी वित्तीय आपात लागू न हो, इसकी हमें प्रार्थना करनी चाहिए.

मित्रों, क्या इस समय भारत सरकार की साख और वित्तीय स्थायित्व को खतरा नहीं है? चार दिन पहले तक तो सरकार दावा कर रही थी कि उसके समय एक पैसे का भी गलत लोन नहीं दिया गया है और आज देश के सारे-के-सारे बैंक गलत लोन के चलते दिवालिया होने की स्थिति में हैं. कल अगर बैंक नकदी के अभाव में बंद हो जाते हैं या लोगों की जमाराशि को लौटाने से मना कर देती है तो सरकार ने सोंचा है कि तब वो क्या करेगी? जनता ने बैंकों पर अपने जमा धन की निकासी के लिए अगर धावा बोल दिया और बैंकों को आग के हवाले करना शुरू कर दिया तो क्या होगा क्या सरकार सोंचा है?

मित्रों, सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या सरकार पूरे मामले को गंभीरता से ले भी रही है? वो इन दिनों जिस तरह का व्यवहार कर रही है उससे तो ऐसा लगता नहीं। मोदी जी को तत्काल सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए और विपक्ष से भी न केवल परामर्श करना चाहिए बल्कि उसको विश्वास में भी लेना चाहिए. यह संकट कोई सरकार मात्र का संकट नहीं है बल्कि राष्ट्रीय संकट है. लेकिन सरकार कर क्या रही है? वित्त मंत्री घोटाला सामने आने के बाद भी २ दिनों तक देश में थे लेकिन वे मीडिया के सामने नहीं आए और विदेश चले गए. प्रधानमंत्री कभी बच्चों से परीक्षा कैसे देनी चाहिए पर बात करते हैं तो कभी कृत्रिम बुद्धि पर व्याख्यान दे रहे हैं. अर्थात उनको जो करना चाहिए और प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए वे नहीं कर रहे हैं. इसी को बिहार में कहते हैं हंसिया के लगन में खुरपी का गीत. आप ही बताईए अगर कोई श्राद्ध में शामिल होने जाए और विवाह के गीत गाने लगे तो आपको ख़ुशी होगी या गम, गायक पर प्यार आएगा या क्रोध?

मित्रों, इसलिए मैं कहता हूँ कि स्थिति की गंभीरता को समझते हुए सरकार तुरंत सर्वदलीय बैठक बुलाए और उसके बाद प्रेस वार्ता करके देशवासियों के समक्ष स्थिति को स्पष्ट करना चाहिए और विश्वास दिलाना चाहिए कि स्थिति नियंत्रण में है इसलिए भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है. विदेशों में तो ऐसी स्थिति में सर्वदलीय राष्ट्रीय सरकारों का भी गठन हो चुका है फिर सरकार को यशवंत सिन्हा, सुब्रमण्यम स्वामी और अरुण शौरी जैसे अपने लोगों से सलाह लेने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए. कुछ लोग फिर से बैंकों के निजीकरण की मांग भी कर सकते हैं लेकिन मैं नहीं मानता कि यह कोई समाधान है क्योंकि दिवालिएपन के कगार पर तो निजी बैंक भी हैं.

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

क्या यह मोदी के अंत का आरम्भ है?

मित्रों, अगर आपने मेरे आलेखों को लगातार पढ़ा होगा तो देखा होगा कि जब भी केंद्र की मोदी सरकार ने अच्छा काम किया है मैंने पूरे मन से उसका समर्थन किया है और जब भी उसका काम मुझे देशहित में नहीं लगा है मैंने पूरी ताक़त से उसका प्रतिकार किया है. चाहे कश्मीर में गठबंधन का मामला हो या फिर भूमि-अधिग्रहण कानून पर आगे बढ़कर पीछे हट जाने का सवाल हो या फिर पापियों-प्रलापियों को मंत्रिमंडल में स्थान देने का प्रश्न हो या फिर सैनिकों की शहादत मेरी कलम ने कभी मोदी सरकार पर प्रहार करने में देर ने नहीं की.
मित्रों, मैं मानता हूँ कि अर्थशास्त्र का अच्छा ज्ञान होने के बावजूद मैं न सिर्फ नोटबंदी के पीछे मोदी सरकार की छिपी हुई मंशा को नहीं समझ पाया बल्कि जीएसटी को अब तलक भी नहीं समझ पाया हूँ. फिर भी ऐसा मानकर कि इस सरकार की नीति तो गलत हो सकती है लेकिन नीयत गलत नहीं होगी इन दोनों मुद्दों पर सरकार के कहे को सच मानकर उसकी पैरोकारी की यह जानते हुए भी कि नीतिगत गलती भी अक्षम्य होती है. लेकिन जैसे गर्म शीशे के टुकड़े पर ठंडा पानी पड़ने से शीशा टूटकर बिखर जाता है वैसे ही पीएनबी घोटाला के सामने आने बाद हमारा भोला-भाला भक्त-ह्रदय पूरी तरह से भग्न-ह्रदय में परिवर्तित हो गया है.
मित्रों, मोदी खुद को खजाने का पहरेदार कहते हैं अन्ना चौबीस घंटे चौकन्ना फिर कैसे कोई खूनी पंजा खजाने को लूट गया.  और सबसे दुखद समाचार तो यह है कि वो खूनी पंजा कोई और नहीं है बल्कि प्रधान सेवक सह चौकीदार जी का मेहुल भाई और उन मेहुल भाई का भांजा है. हो सकता है कि जनता के पैसे की खुली लूट का यह मामला २०११ तक जाता हो लेकिन तथ्य तो यही बताते हैं कि ९० प्रतिशत से ज्यादा लूट २०१६ और उसके बाद हुई. हमने यह भी माना कि पहले की सरकारों के समय भी बैंकों में जमा जनता की मेहनत की कमाई को लूटा और लुटाया गया लेकिन मैं मोदी जी से पूछना चाहता हूँ कि अगर आपकी सरकार में भी चलता है चलता रहा तो फिर आपकी और पहले की सरकार में क्या अंतर रहा?  तो क्या जनता ने आपको मन की बात के जरिये कोरे प्रवचन करने के लिए ही चुना था?
मित्रों, स्वर्गीय संजय गाँधी जिनका पूरा परिवार अभी भाजपा में शरणार्थी है कहते थे कि बातें कम काम ज्यादा। लगता है कि मोदी जी का मूल मंत्र है बातें ही बातें और काम शून्य. बिहार में इस सन्दर्भ में एक बहुत ही खूबसूरत कहावत प्रचलन में है कि बात हमसे लीजिए और काम हमारे दादाजी से. दरअसल बिहार में कुछ ऐसे महारथी भी हैं जो बातों से न सिर्फ मन भर देते हैं बल्कि पेट भी भर देते हैं और होशियार-से-होशियार लोग भी उनके झांसे में आ जाते हैं.
मित्रों, अब जब अगला लोकसभा चुनाव दरवाजे से कुछेक फर्लांग ही दूर रह गया है तब मुझे एक किस्सा याद आ रहा है. किसी गांव में एक डॉक्टर था जो था तो डिग्री के अनुसार सर्जन लेकिन अल्पज्ञ और बातूनी था. शुरुआत में जो भी उसके संपर्क में आता उससे बिना ईलाज कराए रह नहीं पाता. कभी वो किसी का पेट खोल देता तो कभी किसी का फेफड़ा तो किसी का ब्रेन लेकिन आतंरिक अंगों की जटिलता को समझ नहीं पाता और मरीज मरघट पहुँच जाता. धीरे-२ लोग उसकी परछाई से भी डरने लगे और डॉक्टर शहर छोड़कर चला गया.
मित्रों, आज मोदी सरकार हर मोर्चे पर असफल है लेकिन यह उसकी असफलता नहीं है बल्कि भारत की असफलता है. समझ में नहीं आता कि अगले चुनाव में हम किसे वोट डालेंगे? आपकी समझ में कुछ आ रहा है क्या? यह सरकार या आनेवाले चुनाव में उपस्थित विकल्प? कुछ भी?

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

मोदी सरकार की टच एंड रन की नीति

मित्रों, हमारे बिहार में एक कहावत है कि मंत्र तो बिच्छू का भी नहीं पता और चले हैं सांप के बिल में हाथ डालने. पता नहीं आपके यहाँ इसके बदले कौन-सी कहावत प्रचलन में है. इसी तरह एक और कहावत भी बिहार में चलती है कि झोली में दाम नहीं और सराय में डेरा अर्थात अपने बारे में ओवरस्टीमेट होना.
मित्रों, दुर्भाग्यवश ये दोनों कहावतें इन दिनों केंद्र में सत्ता संभाल रही मोदी सरकार पर लागू हो रही है. चाहे वो नोटबंदी हो या जीएसटी, गंगा-सफाई हो या मेक इन इंडिया, हरित क्रांति हो या स्वास्थ्य क्रांति हो या पुलिस और न्यायपालिका में सुधार हो या सबके लिए आवास उपलब्ध करवाना या भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई हो या कालाधन या रोजगार-सृजन या कश्मीर हर मामले में मोदी सरकार पूरी तरह से असफल है या फिर आंशिक रूप से सफल है. उसने हर मामले को छेड़ जरूर दिया है लेकिन सच्चाई यह भी है कि किसी भी मामले को अंत तक नहीं ले जा पाई है और अधूरा छोड़ दिया है या छोड़ना पड़ा है.
मित्रों, पता नहीं सरकार के दिमाग में कैसा केमिकल लोचा चल रहा है? बेवजह सुरेश प्रभु का मंत्रालय बदल दिया, स्मृति ईरानी को लगातार महत्वपूर्ण मंत्रालय दिया जा रहा है, राफेल पर पर्दादारी की जा रही है, रोजगार की नई परिभाषा ही गढ़ दी गई है. कदाचित मोदी जी अपने बारे में ओवरस्टीमेटेड थे और हैं या फिर देश की जनता ने ही उनकी क्षमताओं के बारे में जरुरत से ज्यादा अनुमान लगा लिया. आज भी मोदी जी के पास सिवाय जन-धन खातों और उज्ज्वला के कुछ भी नहीं है और अगर कुछ है भी तो अभी परिणति से कोसों दूर है. सबसे हद तो कश्मीर में की जा रही है. भाजपा और महबूबा दोनों निहायत विपरीत ध्रुवों की राजनीति करते हैं और और अभी भी कर रहे हैं जिससे वहां विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई है.
मित्रों, गांवों में एक और कहावत है कि नीम हकीम खतरे जान. अब अपने देश की अर्थव्यवस्था को ही लीजिए जो आगे जाने के बदले पीछे जा रही है. जैसे कोई झोला छाप डॉक्टर किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त मरीज का ईलाज करता है और बार-बार दवा बदलकर प्रयोग करता है वैसे ही जेटली जी भी अंदाजन दवा-पर-दवा बदलते जा रहे हैं. मरीज ठीक हो गया तो श्रेय लूट लेंगे और ठीक नहीं हुआ तो वैश्विक स्थिति पर सारा ठीकरा फोड़ देंगे.
मित्रों, जो गलती बिहार में नीतीश ने नौकरशाही के बल पर शासन सुधारने की कोशिश करके की वही गलती इन दिनों मोदी सरकार कर रही है. सरकार तो वाजपेयी जी ने भी चलाई थी और हर मंत्रालय में उसके विशेषज्ञों को बैठाया था तो क्या वाजपेयी पागल थे? बल्कि मेरा तो यहाँ तक मानना है कि अगर जरूरी हो तो विपक्षी खेमे में शामिल योग्य लोगों से भी सलाह लेनी चाहिए. मुझे एक दृष्टान्त याद आ रहा है. १८६१ में लिंकन जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने दास प्रथा को समाप्त कर दिया. दक्षिणी राज्यों ने विद्रोह कर दिया और भयंकर युद्ध छिड़ गया. उस समय पूरे अमेरिका में सबसे बड़े सैन्य जनरल थे ग्रांट लेकिन समस्या यह थी कि वे लिंकन के विरोधी थे. इसके बावजूद लिंकन ने उनको ही सेनाध्यक्ष बनाया. जब लिंकन के दोस्तों ने इस पर आपत्ति की तो उनका जवाब था कि भले ही वो मेरा विरोधी है लेकिन पूरे अमेरिका में उससे ज्यादा योग्य सेनानायक नहीं है इसलिए मैंने अहम पर देशहित को अहमियत दी. चूंकि लिंकन यह मानते थे कि वे सर्वज्ञ नहीं थे इसलिए उनका नाम विश्व इतिहास में गर्व से लिया जाता है.
मित्रों, आज भारत को भी लिंकन सरीखे व्यक्तित्व की आवश्यकता है लेकिन क्या मोदी जी उनके समकक्ष भी हैं? यह अद्बभुत संयोग है कि लिंकन 16वें राष्ट्रपति थे तो मोदी 16वें प्रधानमंत्री हैं। तो मुझे यह भी लगता है कि मोदी जी ने मार्गदर्शक मंडल की स्थापना करके ठीक नहीं किया. बल्कि देशहित में यही ठीक रहता कि आडवाणी जी और जोशी जी को भी मंत्रिमंडल में लिया जाता. वे कम-से-कम गिरिराज और स्मृति ईरानी से तो बेहतर ही सिद्ध होते. क्योंकि मुझे लगता है कि मोदी जी के इर्द-गिर्द जो लोग हैं और जिनकी सलाह पर वे चलते हैं वे सही नहीं हैं और मुझे यह भी लगता है कि मोदी जी को पता नहीं है कि टीम वर्क करते समय खुद १६-१८ घंटे काम करने से ज्यादा जरूरी होता है दूसरों से काम करवाना.

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

बढ़ते भारत का प्रतीक पकौड़ा साहित्य

मित्रों, मैं वर्तमान पकौड़ा-विमर्श को देखते हुए झूठ नहीं बोलूंगा कि मैं पकौड़ों से प्रेम नहीं करता हूँ लेकिन सच यह भी है कि जबसे मेरे शरीर के भीतर डाईबीटिज का बसेरा हुआ है प्रेम में कमी आ गई है. अगर पकौड़ा जरूरी है तो उससे ज्यादा जीना जरूरी है. धीरे-धीरे हालात इतने ख़राब हो गए हैं कि मैं पकौड़ों की तरफ देखना तो दूर, जुबाँ पर उसका नाम लेना तो दूर, उसका नाम भी नहीं सुनना चाहता.
मित्रों, मगर मुझे क्या पता था कि देश में कई दशकों से चल रहे दलित-विमर्श के स्थान पर पकौड़ा-विमर्श आरम्भ हो जाएगा और मुझे भी मजबूरन पकौड़ावादी बनना पड़ेगा. जो साहित्य किसी वाद का हिस्सा न हो अर्थात निर्विवाद हो वो कम-से-कम हिंदी वांग्मय में तो साहित्य कहला ही नहीं सकता. पहले राष्ट्रवाद आया, फिर छायावाद, फिर प्रगतिवाद, फिर नव प्रयोगवाद, फिर नई कहानी नई कविता, फिर उत्तरवाद और नव उत्तरवाद, फिर समकालीन साहित्य, फिर दलित साहित्य और अब पकौड़ावाद.
मित्रों, मैं अपने देश के प्रधानमंत्री जी का इस बात के लिए आभार व्यक्त करता हूँ कि उन्होंने सबका साथ सबका विकास के अपने मूलमंत्र पर चलते हुए निहायत उपेक्षित पकौड़े को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया. साथ ही उम्मीद करता हूँ कि वे भविष्य में भिक्षा और कटोरे का जिक्र करके कटोरावादी साहित्यिक आंदोलन की शुरुआत का मार्ग भी प्रशस्त करेंगे. अगर वे ऐसा करते हैं तो हिंदी साहित्य उनका हमेशा ऋणी रहेगा.
मित्रों, लेकिन हम अपने विमर्श को फ़िलहाल पकौड़ा साहित्य तक ही सीमित रखना चाहेंगे क्योंकि मैं वर्तमान में जीता हूँ. तो मैं कह रहा था कि मैं चाहता हूँ कि भविष्य में पकौड़े पर कविता, कहानी ही नहीं वरन महाकाव्य और उपन्यास भी लिखे जाएं. बल्कि मैं तो चाहता हूँ कि पकौड़ा साहित्य साहित्यिक आंदोलन का रूप ले और देश के निमुछिए से लेकर कब्र में पाँव डाल चुके साहित्यकार तक फिर चाहे वो किसी भी लिंग, वर्ग, प्रदेश या संप्रदाय का हो दशकों तक पकौड़ा साहित्य रचे. पकौड़ों पर थीसिस लिखे जाएं और पकौड़ों पर पीएचडी हो. जब रसगुल्ले को लेकर दो राज्य सरकारों में मुकदमेबाजी हो सकती है तो फिर ऐसा क्यों नहीं हो सकता? अभी दो दिन पहले मैंने प्रधानमंत्री निवास के निकटवर्ती लोक कल्याण मार्ग मेट्रो स्टेशन पर एक विचित्र मशीन को देखा. वो मशीन न केवल इच्छित स्टेशन के टोकन ही दे रही थी बल्कि पैसे काटकर वापस भी कर रही थी. अगर इसी तरह सरकारी सेवाओं का मशीनीकरण होता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब कटोरावाद पकौड़ावाद का स्थान लेकर हिंदी साहित्य के कारवां को आगे बढ़ाएगा।
मित्रों, अंत में मैं एक भविष्यवाणी करना चाहूंगा. वो यह कि जिस तरह से आधार को ऑक्सफ़ोर्ड ने २०१७ का शब्द घोषित किया है मैं इस बात की अभी से ही मोदी जी की तरह जापानी ढोल पीटकर भविष्यवाणी कर सकता हूँ कि ऑक्सफ़ोर्ड इस चलंत साल यानि २०१८ का शब्द पकौड़ा को ही घोषित करेगा, करना पड़ेगा. अंत में मैं चाहूंगा कि आप भी दोनों मुट्ठी बंद कर जोरदार नारा लगाएं-जय पकौड़ा, जय पकौड़ावाद. इतनी जोर से कि हमारी आवाज पश्चिमी देशों तक पहुंचे और वहां भी पकौड़ावादी साहित्यिक आंदोलन शुरू हो जाए. कब तक हम साहित्यिक आंदोलनों के मामले में पश्चिम के पीछे चलेंगे? गाना तो बजाओ भाई मेरा देश बदल रहा है, पकौड़े तल रहा है. 

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

बजट:दुरुस्त आयद मगर देर से आयद

मित्रों, एक जमाना था जब हम क्रिकेट के दीवाने हुआ करते थे और भारत की हार हमारे लिए नाकाबिले बर्दाश्त हुआ करती थी. कई बार तो ऐसा भी होता कि भारतीय टीम को अंतिम ओवर में जीत के लिए ४०-५० रन बनाने होते थे लेकिन हमें तब भी पूरी उम्मीद होती थी कि जीत भारत की ही होगी. जाहिर है असंभव तो असंभव ही होता है इसलिए हार के बाद हम टूट-से जाते थे.
मित्रों, हमारी कुछ ऐसी ही मनःस्थिति इन दिनों केंद्र में काबिज नरेंद्र मोदी की सरकार को लेकर हो रही थी. सरकार के चार साल बीत चुके हैं. काम कुछ खास हो नहीं पाया है लेकिन लगता था जैसे एक साल में ही क्रांति हो जाएगी, चमत्कार हो जाएगा. जैसे दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बॉलर अंतिम ओवर में लगातार कई दर्जन नोबॉल फेंकेगा और भारत का दसवां बल्लेबाज उन हरेक नोबॉल पर सिर्फ छक्के ही जड़ेगा।
मित्रों, अब इस साल के बजट को ही लें. बेहतरीन दस्तावेज है, जबरदस्त, सुपर. लेकिन सवाल उठता है कि ऐसा बजट तो पहले साल आना चाहिए था. बजट में जो प्रावधान किए गए हैं एक साल में उनपर काम होगा कैसे? माना कि सरकार ने उपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा दिया लेकिन वो किसानों को मिलेगा कैसे? माना कि सरकार ने उद्योंगों को करों में छूट दे दी लेकिन एक साल में करोड़ों रोजगार कहाँ से आ जाएंगे? इसी तरह आदिवासियों की शिक्षा के लिए, शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए भी जो कुछ किया गया है वो भी स्वागत योग्य है लेकिन इनके परिणाम आने में कई साल लग जाएंगे फिर इस काम में देरी क्यों की गई?
मित्रों, कई मामलों में यह बजट सरकार की लाचारी और नाकामी को भी दर्शाता है. जैसे सरकार ने जो न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि की जो घोषणा की है उससे साबित होता है सरकार कृषि के क्षेत्र में कुछ नया नहीं कर पाई. बल्कि वही सब कर रही है जो पिछली सरकारें कर रही थीं. कहाँ है पर ड्राप मोर क्रॉप और मृदा स्वास्थ्य कार्ड? कहाँ हैं नदियों को जोड़नेवाली नहरें?
मित्रों, इसी तरह सरकार ने जो स्वास्थ्य बीमा की राशि बढ़ाने की घोषणा की है उसको भी सरकार की नाकामी का प्रतीक मानता हूँ. आखिर कोई क्यों जाए निजी अस्पतालों में? फिर इसकी क्या गारंटी है कि निजी अस्पताल उन पैसों को बेईमानी कर हजम नहीं कर जाएंगे? बिहार में तो अविवाहित लड़कियों के गर्भाशय तक उनकी बिना जानकारी के लापता कर दिए गए.
मित्रों, इसी तरह इस बजट में रक्षा क्षेत्र को ज्यादा राशि दी गयी है जो स्वागतयोग्य है लेकिन रोजाना पाकिस्तानी सीमा पर जो कैप्टेन कपिल कुंडू मारे जा रहे हैं उनकी मौतों को रोकने के लिए सरकार के पास कोई योजना है क्या? युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं हौसलों से जीते जाते हैं. क्या है इस सरकार के पास हौसला? अगर है तो फिर कश्मीर में सेना पर एफआईआर क्यों हो रहे हैं और क्यों सेना पर पत्थर फेंकनेवालों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लिए जा रहे हैं? सरकार का गठन देश की सुरक्षा के लिए हुआ था या वोटों की सुरक्षा के लिए?
मित्रों, तमाम सवालों के बावजूद इस सरकार ने आधारभूत संरचना के क्षेत्र में अद्भुत काम किया है. रेलवे की सिग्नल प्रणाली बदलने से, नई पटरियों के बिछने से आनेवाले वर्षों में उम्मीद की जानी चाहिए कि पटना से दिल्ली आने में जाड़े में भी १२ से १४ घंटे ही लगेंगे न कि दो-दो दिन. इसी तरह भारत भविष्य में अपनी बेहतरीन ६ लेन सडकों, पुलों, और फ्लाईओवरों के लिए जाना जाएगा.
मित्रों, बड़े ही खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि सरकार त्वरित न्याय की दिशा में कार्यकाल के चार साल बीत जाने के बाद भी कुछ नहीं कर पाई है. इस बजट में भी इस बारे में शून्य बटा सन्नाटा ही है. बड़े ही खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि देश में अभी भी हर कदम पर भ्रष्टाचार है, अराजकता है जबकि १८ राज्यों में भाजपा की सरकार है. पुराने पापी मजे में हैं. बड़े ही खेद के साथ कहना पड़ रहा है मोदी सरकार भी जातिवादी राजनीति में आकंठ डूब गई है. ये दलित, वो पटेल तो यहाँ आरक्षण, वहां आरक्षण. पता नहीं देश समझ पाया या नहीं कि मध्यम वर्ग को आयकर में छूट नहीं दी जा सकती क्योंकि देश को पैसा चाहिए लेकिन मैं यह नहीं समझ पाया कि बजट द्वारा आखिर राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति और सांसदों के वेतन को बढ़ाने की जरुरत क्या थी? क्या ये लोग भूखों मर रहे थे? क्या इनका वेतन बढ़ाने से खजाने पर कोई बोझ नहीं पड़ेगा? प्रधानमंत्री के आग्रह पर करोड़ों लोगों ने गैस की सब्सिडी छोड़ दी लेकिन अमीर सांसद कब वेतन और सुविधा लेना बंद करेंगे?
मित्रों,  राजस्थान तो पहली झांकी है पूरा भारत बांकी है. पता नहीं सरकार कैसे एक साल में सरकार जनता का दिल जीत पाएगी? कैसे साबित कर पाएगी कि मोदी सिर्फ जुमलावीर नहीं हैं?

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

विराट कोहली और नरेंद्र मोदी

मित्रों, इन दिनों भारतीय क्रिकेट टीम द. अफ्रीका के दौरे पर है. तीन टेस्ट मैचों की श्रृंखला में भारत पहले दोनों मैच हारकर बाहर हो चुका है लेकिन भारतीय कप्तान को इसका जरा भी मलाल नहीं है और वे अपने आलोचकों के ऊपर ही भड़क रहे हैं.
मित्रों, ठीक यही हालत इस समय भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की है. नाच न जाने आँगन टेढ़ा और अगर कोई नाचने पर टिपण्णी कर दे तो बंटाधार. पहले टेस्ट मैच में भुवनेश्वर कुमार ने शानदार प्रदर्शन किया तो कोहली ने उन्हें अगले मैच में बाहर ही बैठा दिया. न तो मोदी और न ही कोहली को ही पता है कि उनको करना क्या है और उनको चाहिए क्या. अपनी जिद में दोनों ने अच्छे खिलाडियों और नेताओं को बाहर बिठा रखा है मगर चाहते हैं कि टीम हर मैच को जीते. टीम मोदी में शामिल जो लोग ख़ामोशी से अपना काम रहे हैं वे हाशिए पर हैं और जो मोदी की ठकुरसुहाती छोड़ और कुछ नहीं कर रहे या नहीं कर सकते वे मजे में हैं. कोहली तो रेफरी तक से होटल के कमरे में जाकर झगड़ने लगते हैं. वैसे यह काम अभी टीम मोदी नहीं बल्कि विपक्ष कर रहा है जो बार-बार चुनाव आयोग और ईवीएम पर आरोप लगाता रहता है.
मित्रों, भारतीय क्रिकेट टीम और मोदी टीम दोनों में ही आपको ऐसे लोग मिल जाएंगे जो सिर्फ इस कारण से टीम में हैं क्योंकि वे मोदी और कोहली को पसंद हैं भले ही उनका प्रदर्शन कितना भी ख़राब क्यों न हो. कोहली और मोदी दोनों ही कदाचित चाहते हैं कि सिर्फ उनको ही वाहवाही मिले और कोई उनसे अच्छा खेलने या प्रदर्शन करने की हिमाकत न करे जबकि क्रिकेट मैच खेलना हो या देश को चलाना दोनों टीम वर्क होता है और इसके लिए अच्छी टीम की आवश्यकता होती है.
मित्रों, इस समय शेयर बाजार पूरे उफान पर है लेकिन मेरा हमेशा से मानना रहा है कि शेयर बाजार अर्थव्यवस्था का आईना नहीं हो सकता। ऐसा हमने तब भी कहा था जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे. एक बार फिर से कर्णाटक में भाजपा दूसरे दलों से नेताओं का आयात करने में जुट गई है जैसा कि वो हर राज्य के चुनाव से पहले करती है. मोदी जी और भाजपा को समझना पड़ेगा कि येन-केन-प्रकारेण सिर्फ चुनाव-दर-चुनाव जीत लेने से देश न तो बदल जाएगा और न ही आगे हो जाएगा. यह घनघोर निराशाजनक है कि मोदी भी वोट बैंक की गन्दी राजनीति के कीचड़ में कूद गए हैं. काम बहुत कम हो रहा है और दिखावा बहुत ज्यादा. शोर मचाकर और आक्रामकता दिखाकर मोदी कोहली की तरह यह साबित करने में लगे हैं कि सब कुछ शानदार है जबकि परिणाम बता रहे हैं कि हालात चिंताजनक है.
मित्रों, वैसे प्रदर्शन के मामले में दोनों टीमों की हालत बिलकुल उलट है. जहाँ मोदी की विदेश नीति शानदार है वहीँ टीम कोहली का विदेशों में प्रदर्शन शून्य रहा है वहीँ टीम कोहली का घरेलू मैदानों पर प्रदर्शन अच्छा है लेकिन टीम मोदी का आतंरिक क्षेत्रों में प्रदर्शन चिंताजनक है. गंगा माँ आज भी मोदी जी को बुला रही हैं किन्तु भाजपा स्वयं गंगा बन गई है डुबकी लगाई नहीं कि भ्रष्टाचारी से परम पवित्र हो गए देश तो बदला नहीं भाजपा जरूर बदल गयी. मंदी और बेरोजगारी पहले से भी ज्यादा है, सरकारी कर्मियों तक को कई-कई महीनों तक वेतन नहीं मिल रहा, बैंक ब्याज देने के बदले खाता खाली कर रहे हैं, चारों तरफ भुखमरी है लेकिन मोदी सरकार कह रही है आप खुश होईए क्योंकि आप मोदी राज में रह रहे हैं. जैसे कोहली कहते हैं कि आप खुश होईए क्योंकि आपके देश की क्रिकेट टीम का कप्तान मेरे जैसा महान खिलाडी है भले ही टीम शर्मनाक तरीके से मैच हारती रहे. 

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

बहरीन में राहुल गाँधी का बेहया भाषण

मित्रों, हमारे बुजुर्गों ने फ़रमाया है कि किसी भी संगठन का चेहरा बदल जाने से कोई जरुरी नहीं है कि उसका चाल और चरित्र भी बदल जाए. उदाहरण के लिए अलकायदा या लश्कर का कमांडर कोई भी रहे करेगा तो वही जो उनका संगठन करता आया है. कुत्ता जब भी पेशाब करेगा तो खम्भे पर ही चाहे वो विलायती ही क्यों न हो. ठीक यही बात कांग्रेस के ऊपर भी लागू होती है. जब माँ अध्यक्ष थी तब पार्टी देशविरोधी गतिविधियों में लीन थी और आज जब बेटा अध्यक्ष बन गया है तब भी पार्टी वही कर रही है.
मित्रों, क्या आपको याद है कि इससे पहले किसी विपक्षी नेता ने विदेश जाकर देश के खिलाफ कोई बयान दिया है या देश के खिलाफ कोई अभियान छेड़ा है? दरअसल कांग्रेस मोदी विरोध और भारत विरोध का अंतर पूरी तरह से भूल गई है. नहीं तो क्या कारण था कि राहुल गाँधी विदेशी धरती पर जाकर यह कहते कि इस समय भारत में संकट की स्थिति है और प्रवासी भारतीय देश की मदद कर सकते हैं. पता नहीं राहुल जी को बहरीन से कैसी मदद चाहिए. कहीं उनको वैसी मदद तो नहीं चाहिए जैसी मदद मांगने मणिशंकर अय्यर पाकिस्तान गए थे?
मित्रों, राहुल जी का कहना है कि वे ऐसे भारत की कल्पना भी नहीं कर सकते, जहां देश का हर नागरिक खुद को देश का हिस्सा न समझे. राहुल जी कल्पना तो हम भी नहीं करना चाहते लेकिन यही सच है कि एक खास विचारधारा और एक खास मजहब में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो खुद को भारत का नागरिक नहीं समझते. उनको कल तक राष्ट्र गीत से परेशानी थी, आज राष्ट्र गान से है और कल भारत राष्ट्र से होगी. लेकिन सवाल उठता है कि क्या इसके लिए राष्ट्रवादी दोषी हैं? अगर कोई वानी सरकारी सुविधाओं से लाभ उठाकर अलीगढ मुस्लिम विवि में पीएचडी की पढाई करने के बावजूद हिजबुल में शामिल हो जाता है या कोई उमर खालिद वर्षों सरकारी सब्सिडी पर जेएनयू में गुलछर्रे उड़ाने के बाद भी भारत तेरे टुकड़े होंगे हजार का नारा लगाता है तो इसके लिए कौन दोषी है? राहुल जी क्या किसी के ह्रदय में जबरदस्ती देशप्रेम पैदा किया जा सकता है? क्या आपके ह्रदय में ही पैदा किया जा सकता है? कदापि नहीं. इसी तरह से किसी के ह्रदय में जबरदस्ती देश के प्रति नफरत भी नहीं भरी जा सकती बल्कि प्रेम हो या नफरत ये तो उधो मन माने की बात होती है. अब कोई अगर अपने को देश का हिस्सा नहीं समझता है तो हमारी पहली कोशिश होती है समझाने की, सुविधा देकर मुख्य धारा में लाने की और अगर फिर भी वो नहीं मानता तो न माने अपनी बला से. और अगर फिर वो एक कदम आगे बढ़कर किसी देशविरोधी गतिविधि में संलिप्त पाया जाता है तो फिर हम देश की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकते हैं. 
मित्रों, राहुल जी फरमाते हैं कि भारत में रोजगार सृजन पिछले आठ सालों के निम्नतम स्तर पर है. सही है लेकिन इस साल ऐसी स्थिति नहीं रहेगी और रोजगार के इतने अवसर पैदा होंगे जितने पहले कभी किसी खास वर्ष में पैदा नहीं हुए. दरअसल राहुल जी अधूरा सच बोल रहे हैं. उनको सिर्फ खाली गिलास दिख रहा है या फिर वे जानबूझकर सिर्फ खाली गिलास को ही देखना और दिखाना चाहते हैं.
मित्रों, सच्चाई तो यह है कि आज तक भारत में जितना भी विदेशी पूँजी निवेश हुआ है उसका आधा सिर्फ पिछले ३ सालों में हुआ है. जाहिर है कि पैसा आ रहा है तो रोजगार भी आएगा ही. यह जानते हुए कि फैक्ट्रियों को स्थापित करने में समय लगता है राहुल गाँधी धूर्तता का प्रदर्शन करते हुए सरकार को बिलकुल भी समय नहीं देना चाहते.
मित्रों, राहुल जी को यह तो दिख रहा है कि देश में बैंक क्रेडिट ग्रोथ पिछले 63 सालों के निम्नतम स्तर पर है लेकिन यह नहीं दिख रहा कि इस समय नई रेल लाईनों के निर्माण, रेल लाईनों के दोहरीकरण, राष्ट्रीय उच्च पथ के निर्माण, शिपिंग क्षमता वृद्धि, नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन की गति पिछली सरकार के मुकाबले दोगुनी है. वे इतनी हारों के बाद भी जिद पर अड़े हैं कि नोटबंदी से देश की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा है. झटका तो लगा जरुर है लेकिन कालेधन की अर्थव्यस्था को लगा है न कि देश की अर्थव्यवस्था को.
मित्रों, राहुल जी फरमाते हैं कि सड़कों पर लोग गुस्से में दिखाई दे रहे हैं. विभाजनकारी ताकतें तय कर रही हैं कि लोगों को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं. चारों ओर नफरत फैलाई जा रही है. कैसी नफरत भाई? जातीय विभाजन तो कांग्रेस ही कर रही है. गोहत्या पर तो रोक लगाने की बात स्वयं गाँधी जी करते थे और यही कारण था कि संविधान के अनुच्छेद ४८ में इसकी व्यवस्था भी की गई है. तो क्या राहुल अब हिन्दू नहीं रहे? गाँधी तो वो कभी नहीं थे. उनका जनेऊ कहाँ गया? कहीं उन्होंने उसका पाजामे का नाडा तो नहीं बना लिया? आखिर कोई भी सच्चा हिन्दू और उसमें भी ब्राह्मण गोहत्या का समर्थन कैसे कर सकता है?
मित्रों, राहुल जी का कहना है कि दलितों को पीटा जा रहा है, पत्रकारों को धमकाया जा रहा है और जजों की रहस्यमयी हालतों में मौत हो रही है. इक्का-दुक्का घटनाओं को चलन कैसे माना जा सकता है? लड़ाई-झगडे में कभी एक पक्ष भारी पड़ता है तो कभी दूसरा. कौन-सा जज मर गया पता नहीं. क्या पहले जज नहीं मरते थे,अमर होते थे? पत्रकार अगर कानून तोड़ेंगे तो फिर कानून उनको तोड़ेगा क्योंकि वे कानून से ऊपर तो होते नहीं हैं.
मित्रों, जब भी कोई किसी को धमकाता है कानून अपना काम करता है. कई बार तो प्रधानमंत्री ने बडबोले नेताओं को चुप रहने की हिदायत दी है. क्या राहुल बताएँगे कि जब इमरान मसूद ने पीएम को बोटी-बोटी करके काटने की धमकी दी थी तब उन्होंने उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की और उसको कांग्रेस का टिकट क्यों दे दिया?
मित्रों, क्या इमरान मसूद जैसे बयानों से देश में फिर से भाईचारा आएगा और अहिंसा फैलेगी? अगर राहुल ऐसा समझते हैं तो हमें उनकी समझ पर तरस आता है. क्या गुजरात में पटेल हिंसा और महाराष्ट्र में दलित हिंसा को बढ़ावा देकर राहुल जी ने देश में सहिष्णुता को बढ़ावा दिया है?
मित्रों, मेरा मानना है कि राहुल जी को अगर अपने देश की सरकार से कोई शिकायत थी तो उनको संसद में सरकार को घेरना चाहिए था न कि विदेश में जाकर अपने ही देश के खिलाफ माहौल बनाना चाहिए था. लेकिन उनकी पार्टी संसद को तो चलने ही नहीं देती फिर चर्चा कैसे होगी. घर के झगडे को घर में ही निपटाया जाता है दूसरा देश इसमें क्या कर लेगा सिवाय दो के झगडे से लाभ उठाने के? बड़े ही दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि कांग्रेस बेवफा तो पहले से ही थी लेकिन अब लगता है कि वो बेहया भी हो गई है और अपने-पराए का अंतर भूल गई है.

शनिवार, 6 जनवरी 2018

कांग्रेस की भारतविरोधी गन्दी राजनीति

मित्रों, हम पहले भी कह चुके हैं कि कांग्रेस भारत के लिए खतरनाक थी और अब पहले से भी ज्यादा खतरनाक हो गयी है. हम पहले भी कह चुके हैं कि कांग्रेस जो दिखाती है सिर्फ वही उसका चेहरा नहीं है बल्कि एक के भीतर एक उसके कई सारे घूंघट हैं. हमेशा उसकी निगाहें जाहिर तौर पर कहीं और होती हैं और निशाना कहीं और होता है.
मित्रों, भारत में कई सौ राजनैतिक दल हैं. इन दलों को हम दो श्रेणियों में बाँट सकते हैं. पहली श्रेणी में वे हैं जिनकी प्राथमिकता में देश भले ही पहले स्थान पर नहीं हो लेकिन है जरूर और दूसरी श्रेणी में वैसे दल आते हैं जिनकी प्राथमिकता में सिर्फ सत्ता और देश को लूटना है देश कहीं है ही नहीं. दुर्भाग्यवश इस समय पहली श्रेणी में भाजपा आती है तो वहीँ दूसरी श्रेणी में वो कांग्रेस आती है जिसका इतिहास १३२ साल पुराना है.
मित्रों, आज की कांग्रेस न तो गाँधीजी वाली कांग्रेस है और न ही तिलक या पटेल वाली बल्कि आज की कांग्रेस राहुल-सोनिया वाली कांग्रेस है. यह हमारा दुर्भाग्य है कि इंदिरा के समय से ही कांग्रेस पारिवारिक संपत्ति बनकर रह गई है. पिछले २० सालों का इतिहास गवाह है कि जब भी कांग्रेस सत्ता में होती है तब तो देश को दोनों हाथों से लूटती है और जब विपक्ष में होती है तो वापस फिर से सत्ता पाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार होती है फिर चाहे उससे देश को कितना भी बड़ा नुकसान ही क्यों न हो जाए. १९९९ में कांग्रेस ने कथित ताबूत घोटाले को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा लेकिन चुनाव के बाद मुद्दे को ही भूल गयी क्योंकि सारे आरोप फर्जी और मनगढ़ंत थे.
मित्रों, २०१९ के लिए कांग्रेस ने जो रणनीति बनाई है वो देश को १९९९ से भी ज्यादा महँगी पड़नेवाली है. कांग्रेस ने हिन्दुओं को जहाँ तक हो सके आपस में लड़ाने-भिड़ाने की कुत्सित योजना बनाई है और उसके इस काम में सारे छद्मधर्मनिरपेक्ष और साम्यवादी शक्तियां उसकी मदद कर रही हैं. कांग्रेस ने पटेलों के नाम पर पहले गुजरात को जलाया और अब महाराष्ट्र को जला रही है आगे पता नहीं कौन-कौन सा जिला जलेगा क्योंकि कांग्रेस को पता है कि हिन्दू अगर संगठित रहे तो भारत मजबूत होगा और महाशक्ति बन जाएगा. कांग्रेस को पता है कि मुसलमान हर स्थिति में झक मारकर उसको ही वोट देंगे और चीन-पाकिस्तान के साथ-साथ कांग्रेस को भी पता है कि मोदी की ताक़त का राज मशरूम नहीं है बल्कि हिन्दुओं की चट्टानी एकता है.
मित्रों, कांग्रेस को तो यह भी पता था कि भीमा कोरेगांव में भारत की हार और अंग्रेजों की जीत का जश्न मनाने का क्या असर होगा. आखिर इस महोत्सव को मनाने की जरुरत ही क्या थी? इतिहास गवाह है कि सिखों के खिलाफ अंग्रेजों ने पूर्वी भारत के सैनिकों को लडवाया और बाद में १८५७ के विद्रोह के समय पूर्वी भारत के सैनिकों को दबाने के लिए सिखों का प्रयोग किया. अंग्रेजों की तो नीति ही यही थी कि फूट डालो और शासन करो तो क्या सिखों और पूर्वी भारतियों को एक-दूसरे के खिलाफ जीत का जश्न मनाना चाहिए?
मित्रों, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिग्नेश मेवानी और उमर खालिद शुरू से ही कांग्रेस को लाभ पहुँचाने की दिशा में काम करते रहे हैं, भले ही ये कांग्रेस के कागजी सदस्य नहीं हैं. इतने सालों में तो कोई बड़ा कांग्रेस नेता इस मौके पर भीमा कोरेगांव नहीं गया फिर इस साल इन दोनों को क्या आवश्यकता थी दलितों के कथित विजयोत्सव में शामिल होकर तनाव को बढाने की?
मित्रों, कांग्रेस और उसके समान विचारधारा वाली पार्टियों के एजेंडे को समझिए. उनके निशाने पर न तो राजपूत हैं, न ही जाट, न ही गुज्जर या ब्राह्मण या यादव या पटेल या सिख या जैन या बनिया बल्कि उनके निशाने पर सिर्फ और सिर्फ भारत है. कांग्रेस पहले भी सत्ता के लिए भारत के टुकड़े कर चुकी है और आज भी भारतीय समाज को विभाजित कर रही है. कही भी पहले विभाजन की रेखा ह्रदय और मन में खींची जाती है बाद में जमीन पर. इसलिए भारत के सारे देशप्रेमियों को सचेत रहने की जरुरत है. इतना ही नहीं भारत के सबसे बड़े शत्रु चीन के प्रति कांग्रेस की प्रीति भी संदेह पैदा कर रही है. वैसे भी जैसे अभी पाकिस्तान के नेता विदेश भाग रहे हैं ये भारतीय अंग्रेज भी अपने पूरे कुनबे और चमचों के साथ जब देश बर्बाद हो चुका होगा क्वात्रोची की तरह इटली या माल्या की तरह लन्दन निकल लेंगे लेकिन हमें और हमारे वंशजों को तो इसी मिट्टी की खाक में मिलना है और यहीं पर रहना है इसलिए सचेत रहिए कि कहीं कांग्रेस आपके प्रदेश में भी जातीय विभाजन का गन्दा खेल तो नहीं खेल रही. जनेऊ-मंदिर धोखा है, दरअसल रावण साधू के वेश में घात लगाए घूम रहा है.

रविवार, 31 दिसंबर 2017

अलविदा २०१७ स्वागतम २०१८

मित्रों, आज साल २०१७ का अंतिम दिन है. समझ में नहीं आता कि इस साल को किस तरह याद करूँ? व्यक्तिगत जीवन की अगर बात करूँ तो ये साल हमारे लिए काफी अच्छा रहा. साल की शुरुआत में हमने अधूरा ही सही घर बनाया. भगवान ने हमें साल के अंत में दिसंबर की सात तारीख को ७ बजकर ७ मिनट पर एक और पुत्र दिया जिसका नाम उसके बड़े भाई भगत सिंह ने कुंवर सिंह रखा. लेकिन हमारा कुछ भी व्यक्तिगत तो होता नहीं है बल्कि हमारा दिल तो देश के लिए धडकता है इसलिए आगे हम बीते हुए साल की व्याख्या देश के सन्दर्भ में करेंगे.
मित्रों, इस साल हमारे देश में सबसे बड़ी घटना हुई जीएसटी लागू होना. इसे हम एक आर्थिक क्रांति का नाम भी दे सकते हैं हालाँकि वर्तमान में इसका अल्पकालिक दुष्प्रभाव देखने को मिल रहा है लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि बहुत जल्दी केंद्र और प्रदेशों की सरकारें मिलकर तात्कालिक मंदी को दूर कर लेंगी और न सिर्फ जीडीपी दहांई के अंकों में दहाडेगी बल्कि तेजी से बढती बेरोजगारी भी घटेगी और भारत २०१८ में एक बार फिर से वर्ष १८१३ से पहले के भारत की तरह दुनिया की फैक्ट्री बन सकेगा.
मित्रों, इस साल में देश में जो दूसरी सबसे बड़ी घटना घटी वो थी तीन तलाक पर प्रतिबन्ध. इसे हम रक्तहीन सामाजिक क्रांति की संज्ञा भी दे सकते हैं. इस क्रांति का नेत्रित्व किया स्वयं मुस्लिम बहनों ने लेकिन उनके पीछे चट्टान की तरह खड़ी दिखी केंद्र सरकार. पहले सुप्रीम कोर्ट ने स्वाधीनता दिवस के ठीक एक सप्ताह बाद इसे प्रतिबंधित कर दिया और करोड़ों मुस्लिम महिलाओं को डेढ़ हजार साल की लैंगिक गुलामी से आजादी दे दी . परन्तु फिर भी जब तीन तलाक जारी रहा तब केंद्र सरकार ने दो कदम आगे बढ़कर संसद में तत्सम्बन्धी नया कानून पेश किया. कानून लोकसभा से ध्वनिमत से पारित भी हो चुका है, उम्मीद की जानी चाहिए कि नए साल में राज्यसभा से पारित होने के बाद लागू भी हो जाएगा. गौरतलब है कि नए कानून में तीन तलाक को गैरजमानती अपराध बना दिया गया है और इसके लिए शौहर को ३ साल की जेल हो सकती है.
मित्रों, मुस्लिम पारिवारिक और विवाह कानून में बदलाव करने की हिम्मत आज तक न तो अंग्रेजों ने की थी और न ही पिछले ७० सालों में आनेवाली सरकारों ने. अब अगर लगे हाथों जनसंख्या स्थिरीकरण की दिशा में भी कोई कानून आ जाता है तो भारत को महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता.
मित्रों, इस साल भी नरेन्द्र मोदी अपराजेय बने रहे. गोवा और मणिपुर में यद्यपि भाजपा को बहुमत नहीं मिला फिर भी अमित शाह ने अनहोनी को होनी में बदलते हुए भाजपा की सरकार बनवा दी तथापि देश के यशस्वी रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर को फिर से गोवा भेजना पड़ा. उत्तर प्रदेश में एक बार फिर से मोदी लहर चली और राजग गठबंधन ने ४०३ में से ३२५ सीटें जीत लीं और रामजी जी की कृपा से योगी सरकार अच्छा काम भी कर रही है. पंजाब,उत्तराखंड और हिमाचल में हर बार सत्ता बदली की परम्परानुसार सत्ताविरोधी लहर चली. पंजाब में भाजपा को झटका लगा तो वहीँ उत्तराखंड में उसने सरकार बनाई.
मित्रों, सबसे आश्चर्यजनक राजनैतिक बदलाव देखने को मिला बिहार में. नीतीश कुमार ने लालू परिवार को झटका देते हुए एक बार फिर से भाजपा का हाथ थाम लिया. हालाँकि अभी तक बिहार में कुव्यवस्था और कुशासन का दौर ही जारी है और न जाने नीतीश कुमार जी किस बात और किस तरह की समीक्षा के लिए एक बार फिर से यात्रा पर निकले हुए हैं. इससे तो अच्छा होता कि वे एक बार पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल की औचक यात्रा कर लेते. चिराग तले ही अँधेरा है, बालू पर रोक के चलते लाखों ट्रक मालिक और करोड़ों मजदूर भुखमरी को मजबूर हैं और नीतीश सुशासन का बुझा हुआ दीपक लेकर घूम रहे हैं चंपारण और जमुई में.
मित्रों, साल का अंत हुआ गुजरात और हिमाचल के बहुचर्चित चुनावों से. हिमाचल की बात हम पहले ही कर चुके है. गुजरात में इस बार कांग्रेस ने बिहार वाला कुत्सित फार्मूला अपनाया जिससे भाजपा को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. ईधर भाजपा का हिन्दू वोट बैंक बंट गया तो उधर सारी जातिवादी और सांप्रदायिक शक्तियां कांग्रेस के पक्ष में एकजुट हो गईं. कांग्रेस ने अपनी रणनीति में मौलिक परिवर्तन करते हुए यहाँ सॉफ्ट हिन्दू कार्ड खेला जिसका उसे लाभ भी मिला तथापि देखना है कि कांग्रेस कब तक अपने नए रूख पर कायम रहती है और कब तक फिर से भगवा आतंकवाद के अपने हिंदूविरोधी एजेंडे पर नहीं जाती है. राहुल की ताजपोशी को मैंने बहुत बड़ी घटना नहीं मानता. अंतर बस इतना आया है कि पहले बेटा छुट्टी पर जाता था अब माँ जा रही है. हालाँकि गुजरात में भाजपा जीत गई है लेकिन उसके कमजोर होने का असर अब भी दिख रहा है क्योंकि उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल अभी से ही आँखें दिखाने लगे हैं. आगे क्या होगा रामजी ही जानें.
मित्रों, बीते साल में अदालतों की निरंकुशता जारी रही. जिसको जी चाहा छोड़ दिया जिसको जी चाहा जेल भेज दिया. उच्च न्यायालय के एक जज ने तो घनघोर क्रांतिकारिता दिखाते हुए सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ ही अवमानना का मुकदमा चलाने का आदेश दे दिया. श्रीमान ६ महीने की सजा काटकर बाहर आए हैं. देश की जनता २०१७ में भी न्यायिक सुधार की प्रतीक्षा करती रही लेकिन निराशा ही हाथ लगी. कोलेजियम सिस्टम को लेकर भी गतिरोध बना रहा अलबत्ता राममंदिर की रोजाना सुनवाई का रास्ता जरूर साफ़ हो गया है.
मित्रों, कूटनीति के परिपेक्ष्य में भारत ने चीनी सेना को डोकलाम में पीछे हटने के लिए बाध्य करके अभूतपूर्व सफलता पाई. ईरान के चाबहार बंदरगाह से अफगानिस्तान माल पहुंचाकर भारत ने एक मील का पत्थर स्थापित किया. साल के मध्य में प्रधानमंत्री ने इजराईल की यात्रा की जिससे भारत की सामरिक शक्ति में अकूत वृद्धि का मार्ग खुला. ऐसा करनेवाले वे भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं. साल के अंत में येरुसलम के सवाल पर भारत ने यूएनओ में इजराईल के खिलाफ वोट दिया लेकिन उम्मीद करनी चाहिए कि इसका दोनों देशों के संबंधों पर बुरा असर नहीं पड़ेगा. तथापि फिलिस्तीन के राजदूत ने हाफिज सईद के साथ खड़े होकर भारत सरकार की फिलिस्तीन नीति पर सवालिया निशान जरूर लगा दिया है. श्रीलंका ने हम्बनतोता बंदरगाह चीन के हवाले करके भारत को करारा झटका दिया तो वहीँ मालदीव भी चीन के नजदीक जाता दिखा. रोहिंग्या शरणार्थियों की समस्या ने भी भारत के सामने नई चुनौतियाँ पेश की. देखना है कि भारत सरकार इससे कैसे निबटती है. कुलभूषण जाधव की रिहाई बीते साल भी नहीं हो पाई और पाकिस्तानी गोलीबारी में रोजाना जवान कालकवलित होते रहे. नए साल में देखना है कि भारत सरकार चीन और पाकिस्तान से कैसे निबटती है.
मित्रों, आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर गत वर्ष सुधार हुआ और नक्सली हमले में प्रभावी कमी आई. कश्मीर में दो सौ से ज्यादा आतंकियों को जहन्नुम का रास्ता दिखाया गया और स्थिति ऐसी भी आई कि कोई जैस और लश्कर का कमांडर बनने को ही तैयार नहीं था.
मित्रों, कुल मिलाकर देश के लिए भी २०१७ अच्छा रहा यद्यपि अर्थव्यवस्था की हालत नाजुक बनी रही और बेरोजगारी घटने के बजाए बढ़ी. लगा जैसे जीएसटी लागू करने से पहले भी सरकार ने नोटबंदी की तरह ही पूरी तैयारी नहीं की थी. जहाँ तक साल २०१८ का सवाल है तो यह साल मोदी सरकार के लिए काफी महत्वपूर्ण रहनेवाला है क्योंकि २०१९ के लोकसभा चुनाव में जनता का जो भी निर्णय होगा वो केंद्र और १९ राज्यों में सत्तासीन भाजपा सरकारों के आगामी वर्ष में प्रदर्शन पर निर्भर करेगा. आशा करनी चाहिए कि नए साल में जो भी होगा देश और देशवासियों के लिए अच्छा ही होगा क्योंकि उम्मीद पर ही दुनिया कायम है.

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

पगड़ी संभालिए मोदी जी

मित्रों, हम भारतीयों के लिए पगड़ी का बड़ा महत्व है. सौभाग्यवश इस बात को हमारे प्रधान सेवक जी भी खूब समझते हैं. तभी तो लगभग हर भाषण में पगड़ी धारण किए रहते हैं. पगड़ी एक कपडा-मात्र नहीं होती वो एक जिम्मेदारी भी होती हैं.
मित्रों, जाहिर हैं कि हमारे प्रधान सेवक जी को जिम्मेदारियां देना नहीं लेना ज्यादा पसंद है. ऐसा जज्बा होना भी चाहिए लेकिन क्या वे इसमें सफल भी हो रहे हैं? क्या एक अकेली जान सबकुछ कर सकता है? अगर ऐसा संभव होता तो भगवत और देव मंडली में पोर्टफोलियो सिस्टम नहीं होता. फिर आदमी की तो औकात ही क्या!
मित्रों, जब मोदी सरकार ने शपथ ली थी तब और बाद में भी मैं बार-बार कहता आ रहा हूँ कि प्रधान सेवक जी आपका मंत्रिमंडल सही नहीं है. चाहे आप कपिलदेव को कप्तान बना दीजिए या इमरान खान को या फिर क्लाईब लायड को जब टीम अच्छी नहीं होगी कप्तान कुछ नहीं कर सकता. जब कई महीने पहले कई मंत्रियों से प्रधान सेवक जी ने इस्तीफा लिया तो लगा कि देर से ही सही उन्होंने हमारी बातों पर ध्यान दे दिया है लेकिन हुआ कुछ नहीं. एक रूडी भैया की बलि देकर सुधार की खानापूरी कर ली गई. जो मजबूत पड़े बच गए कमजोर पड़े नप गए.
मित्रों, फिर तो देश की जो स्थिति होनी थी हो रही है. देश इस समय एक साथ मंदी और महंगाई की विकट स्थिति को झेल रहा है. उधर किसान १० पैसे किलो आलू और ४ रूपये किलो मूंगफली बेचने को बाध्य हैं तो ईधर उपभोक्ताओं को वही आलू १२० गुना महंगा १२ रूपये किलो और मूंगफली २५ गुना महंगा १०० रूपये किलो मिल रहा है. दोनों छोर पर बैठे लोग मर रहे हैं और बीचवाला माल छाप रहा है. सरकार कहती है कि जीएसटी कम कर दिया लेकिन एक तरफ उपभोक्ताओं को सामान पुराने दरों पर ही मिल रहा है वहीँ दूसरी ओर सरकार को जीएसटी का भुगतान नए दर से किया जा रहा है. सेल टैक्स, इनकम टैक्स आदि सारे विभागों के बाबुओं का हफ्ता फिक्स है इसलिए सब आँखवाले अंधे बने हुए हैं. पाकिस्तान की गोलीबारी में आज भी रोजाना हमारे जवान बेमौत मारे जा रहे हैं. धंधा मंदा है और बेरोजगारी बढती ही जा रही है.
मित्रों, न्यायपालिका निरंकुश है, न्याय दुर्लभ है, कदम-२ पर घूसखोरी और कमीशनखोरी है, सार्वजानिक शिक्षा की मौत हो चुकी है और निजी विद्यालय लूट मचाए हुए हैं, परीक्षा दिखावा बनकर रह गई है, असली से ज्यादा नकली दावा बाजार में है, सरकारी अस्पतालों में कुत्ते टहल रहे हैं और निजी अस्पतालों से तो लुटेरे कहीं ज्यादा भले, पुलिस खुद ही अपराध कर और करवा रही है, सारे धंधे मंदे हैं लेकिन अवैध शराब और गरम गोश्त का व्यापार दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति कर रहा है. पुलिस छापा मारती भी है तो सरगने को भगा देती है और बांकी लोग भी एक-दो महीने में ही न जाने कैसे बाहर आ जाते हैं. कुल मिलकर स्थिति इतनी बुरी है कि पीड़ित may I help you का बोर्ड लेकर घूमनेवाली पुलिस के पास जाने से भी डरते हैं. बैंकों की तो पूछिए ही नहीं पहले १० %  कमीशन काट लेते हैं बाद में लोन की रकम देते हैं. बिहार में तो यही रेट है इंदिरा आवास तक में और प्रधान सेवक समझते हैं कि १००% पैसा गरीबों तक पहुँच गया. इतना ही नहीं क्या अमीर और क्या गरीब बैंक न्यूनतम राशि खाते में न होने के बहाने बिना हथियार दिखाए सबको लूट रहे हैं.
मित्रों, बिहार की स्थिति तो और भी बुरी है. यहाँ छोटे भाई नीतीश और छोटे मोदी मिलकर बालू से तेल निकालने का अनथक प्रयास कर रहे है जिससे गृह-निर्माण से जुड़े सारे दिहाड़ी मजदूर फांकाकशी को मजबूर हैं. खजाना खाली होने से सरकारी कर्मियों तक को कई-२ महीने तक वेतन के दर्शन नहीं होते. कुल मिलाकर जो गति तोरा सो गति मोरा रामा हो रामा. आम आदमी मर रहा है वहीँ तंत्र शराब बेचकर और घूस खाकर अपनी तोंद फुला रहा है.
मित्रों, सवाल उठता है कि इसका ईलाज क्या है? ईलाज तो यही है कि मोदी जी को समझ लेना होगा कि उनकी सरकार का हनीमून पीरियड अब समाप्त हो चुका है. जनता की आँखों में कुछ समय के लिए धूल जरूर झोंका जा सकता है लेकिन उनको स्थाई रूप से अंधा नहीं किया जा सकता. नोटा का सोंटा अभी गुजरात में चला है कल पूरे हिंदुस्तान में चलेगा. आज गुजरात में मोदी जी की पगड़ी उछलने से बच गई है लेकिन क्या पूरे देश में बच पाएगी? न जाने मोदी जी किससे और क्यों भयभीत हैं जबकि उनके पीछे सवा सौ करोड़ भारतीयों का न सही नए सर्वे के अनुसार कम-से-कम ८० करोड़ भारतीयों का समर्थन है? कहीं ऐसा न हो कि नेहरु जैसी ताकत पाने के चक्कर में मोदी जी की हालत सब साधै सब जाए वाली हो जाए. जागिए मोदी जी और अपनी और हमारी पगड़ी संभालिए क्योंकि हमने अपनी पगड़ी आपके हवाले कर रखी है. कुछ ऐसी धरातल पर दिखनेवाली योजनाएं भी बनाईए जिनकी समय सीमा २०१९ हो २०२२ नहीं क्योंकि २०१९ २०२२ से पहले आता है बाद में नहीं. साथ ही सरकार GDP के आंकड़े दिखाना बंद करे क्योंकि मुकेश अम्बानी की आय में तो हजारों करोड़ की वृद्धि हो गई लेकिन आम आदमी की हालत आज २०१४ से कहीं ज्यादा ख़राब है.

रविवार, 24 दिसंबर 2017

कब तक बेवजह शहीद होते रहेंगे जवान?

मित्रों, वैसे तो देश पर शहीद होना गर्व की बात होती है. हम राजपूतों से ज्यादा इस बात को कौन जानता है? लेकिन हमें याद है कि जब हमारे छोटे चचेरे भाई वीरमणि ने १९९९ में अप्रतिम वीरता का प्रदर्शन करते हुए शहादत दी थी तब हमारे परिवार की क्या हालत हो गई थी. जी में आता था कि अभी हाथ में बन्दूक उठाऊँ और पाकिस्तान का नामोनिशान मिटा दूं. शहादत से १० दिन पहले ही तो हमसे मिलकर वो गया था और पांव छूकर हमसे आशीर्वाद लिया था.
मित्रों, खैर मेरे भाई ने तो तब शहादत दी थी जब पाकिस्तान के साथ घोषित युद्ध चल रहा था लेकिन आजकल तो कोई युद्ध नहीं चल रहा फिर रोजाना हमारे जवान क्यों शहीद हो रहे?  पिछले तीन वर्ष में देश के अन्दर और बाहर 425 भारतीय सशस्त्र बल के जवान शहीद हो चुके हैं। इस बात की जानकारी लोकसभा में रक्षा राज्यमंत्री डॉक्टर सुभाष भामरे ने दी। उन्होंने बताया कि 2014 से 2016 के बीच भारतीय सेना के 291, नौसेना के 105 और वायुसेना के 29 जवानों ने शहादत दी है।
मित्रों, हमारे प्रधान मंत्री कहते हैं कि हमें चलता है की आदत को बदलना पड़ेगा तो हम पलटकर उनसे से पूछना चाहते हैं कि सैनिकों की शहादत के मामले में कब चलता है बंद होगा और कब तक बिना घोषित युद्ध के ही हमारे बहुमूल्य जवान मरते रहेंगे? अपने निजी अनुभव के आधार पर हम जानते हैं कि जब कोई जवान शहीद होता है तो वो अकेला शहीद नहीं होता बल्कि उसके साथ उसका परिवार भी शहीद होता है. माँ-बाप आजीवन अपने बेटे, पत्नी अपने पति, भाई-बहन अपने भाई के लिए तरसते रहते हैं. बच्चों के भी अरमानों का खून हो जाता है.
मित्रों, नेताओं का क्या है वो तो पहले भी कहते रहे हैं कि जवान सेना में जाता ही है शहीद होने के लिए. आज भी वे उतनी ही आसानी से यह बात कह सकते हैं क्योंकि उनका कोई सगा तो सेना में जाता नहीं.
मित्रों, कल जिस तरह से दिन के १२ बजे एक मेजर सहित हमारे ४ जवानों को पाकिस्तानी गोलीबारी में जान देनी पड़ी वो यह बताने के लिए काफी है कि अब पानी सर से होकर गुजर रहा है. अब वो वक़्त आ गया है कि पाकिस्तान को यह बता दिया जाना चाहिए कि हम उसकी शरारतों को और बर्दाश्त कर सकने की स्थिति में नहीं हैं. हमारे जितने जवान कारगिल युद्ध में मारे गए थे लगभग उतने जवान पिछले ३ सालों में बेवजह मारे जा चुके हैं और हम हैं कि अभी भी ट्विट-ट्विट खेल रहे हैं. कब बंद होगी हमारे जवानों की शहादत? कब एक सर के बदले १०० नरमूंडों को लाया जाएगा? अगर एक और कारगिल जरूरी है और हो जाए लेकिन पाकिस्तानी बंदूकों का मुंह बंद होना ही चाहिए जल्द-से-जल्द. सेना और भारत सरकार अगर उम्र में छूट देती है तो माँ भवानी की कसम हम खुद भी इसमें हिस्सा लेंगे. जब ८० साल की आयु में बाबू कुंवर सिंह जंग लड़ सकते हैं तो हम तो अभी उनसे आधी उम्र के ही हैं.  

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

कानून के साथ एक साक्षात्कार

मित्रों, कल हमारी अचानक मुलाकात उस शक्सियत के साथ हो गई जिसके बारे में अक्सर कहा जाता है कि उसका भारत में राज है. दरअसल कल मैं सदर अस्पताल के दौरे पर था खबर की तलाश में तभी मैंने एक अपाहिज वृद्धा को अस्पताल के सामने लगे कूड़े के ढेर के पास कराहते हुए देखा. बेचारी के अंग-अंग से खून टपक रहा था. वो कराह भी रही थी लेकिन जैसे मारे कमजोरी के उसके मुंह से कोई आवाज ही नहीं निकल रही थी. लोग-बाग़ आ-जा रहे थे लेकिन कोई उनकी तरफ देख तक नहीं रहा था.
मित्रों, मेरे मन में दया का सागर उमड़ पड़ा और मैं जा पहुँचा उसके पास. लेकिन जब उसने अपना परिचय दिया तो जैसे मुझे ४४० वोल्ट का झटका लगा. उनसे बताया कि वो कानून है. फिर मैंने पूछा कि नेताओं का तो यह कहते मुंह नहीं दुखता कि देश में कानून का राज है फिर आपकी ऐसी हालत कैसे हो गई तो उसकी आँखों से जैसे गंगा-जमुना की धारा बह निकली. उसने रूंधे हुए गले से कहा कि झूठ बोलते हैं सारे. सच्चाई तो यह है कि कभी मेरा राज था ही नहीं. जब अंग्रेजी शासन था तब मैं अमीरों की रखैल थी. हालाँकि पत्नी का दर्जा तो मुझे नहीं मिला हुआ था लेकिन मेरा ख्याल जरूर रखा जा रहा था लेकिन जबसे देश में मेरे अपनों का शासन आया है लगातार मेरी उपेक्षा बढती गई है. अब तो मेरी स्थिति इतनी बुरी हो गई है कि मेरा प्रत्येक अंग सड़ने लगा है लेकिन घर में देखभाल तो दूर की बात है अस्पताल तक में मुझे जगह नहीं मिल रही है. कभी कोई जूठन फेंक गया तो खा लेती हूँ. कुत्ते अलग मुझे नोच लेने के चक्कर में रहते है. सहायता के लिए चिल्लाते-चिल्लाते मेरा गला भी बैठ गया है लेकिन कोई नहीं सुन रहा. मैं जब अपना धौंस दिखाकर धमकाती हूँ तो चोर-उच्चके तक ताना देते हैं कि हमने तेरे परिजनों, तेरे रक्षकों को ही खरीद लिया है तू हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती.
मित्रों, हमसे रहा नहीं गया और हम इमरजेंसी वार्ड की तरफ लपके और अधिकारियों से कहा कि बेचारी बुढ़िया को भर्ती कर लो तो उन्होंने टका-सा जवाब दिया कि टका है क्या?  उसने यह भी पूछा कि वो तेरी क्या लगती है? उन्होंने मुझे फटकार लगाई कि जब उसको उसके अपनों ने ही मरने के लिए छोड़ दिया है तो तू क्यों उसकी चिंता में दुबले हो रहे हो? मैं भला कहाँ से पैसे लाता मैं खुद फटेहाल इसलिए वहां से चुपचाप टरक लेने में ही भलाई समझी. लेकिन दूर तक उस गरीब-लाचार बुढ़िया की आँखें मेरा पीछा कर रही थीं और ईधर मेरी आँखें भी जैसे छलकने को बेताब हो रही थीं.

गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

मोदी सरकार की साख पर बट्टा है २जी पर कोर्ट का फैसला

मित्रों, आज ही २जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर कोर्ट का फैसला आया है और क्या फैसला आया है! आरुषि हत्याकांड, सलमान खान हिट एंड रन केस,जेसिका लाल केस, प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड, शशिनाथ झा मर्डर केस की तरह बिल्कुल अप्रत्याशित. जिस तरह जेसिका लाल के मामले में कोर्ट ने कहा था कि नो वन किल्ड जेसिका अर्थात किसी ने भी जेसिका की हत्या नहीं की बल्कि उसकी हत्या उसी तरह से हो गई जैसे मुहब्बत हो जाती है की नहीं जाती उसी तरह आज कोर्ट ने कहा है कि किसी ने घोटाला नहीं किया घोटाला हो गया. लेकिन सवाल उठता है कि कोर्ट ने आज जो पागलपंथी भरा फैसला सुनाया है क्या उसके लिए अकेले कोर्ट ही जिम्मेदार है?

मित्रों, देख रहे हैं और देखकर लगातार निराश हो रहे हैं कि सरकारी तोते सीबीआई के कामकाज करने का तरीका आज भी वही है जो सोनिया-मनमोहन के समय था. बिहार के सृजन घोटाले को सबसे पहले उजागर करनेवालों में मेरा नाम भी आता है लेकिन मुझे भारी दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि इस मामले में सीबीआई ने जानबूझकर समय पर चार्जशीट दाखिल नहीं किया जिससे लगभग सारे बाघडबिल्ले बाहर आ गए. इतना ही नहीं आगे भी लगता है कि सीबीआई मामले की सिर्फ लीपापोती ही करनेवाली है. सवाल उठता है कि क्या यही रिकॉर्ड लेकर प्रधानमंत्री २०१९ में जनता के समक्ष जानेवाले हैं? अगर यहीसब करना था तो फिर जनता को ठगा क्यों? क्यों भ्रष्टाचार मुक्त समाज और देश के सपने दिखाए?

मित्रों, माननीयों के लिए अलग से कोर्ट बना देने मात्र से क्या सरकार की जिम्मेदारियां समाप्त हो जाती हैं? उनके खिलाफ निष्पक्ष तरीके से मुकदमा कौन लडेगा कौन जाँच करेगा? क्या वहां भी सरकार उसी तरह केस लड़ेगी जैसे उसने २जी मामले में लड़ा है या सृजन घोटाले में लड़ रही है? मोदी जी २०१९ देखते-देखते सर पर आकर खड़ा हो जाएगा इसलिए न्यायपालिका और शिक्षा में सुधार, रोजगार-सृजन, कालाधन आदि की दिशा में जो भी करना जल्दी करिए। ऐसा न हो कि फिर देर हो जाए और जिस खूनी पंजे के हाथों से आपने देश को निकाला है फिर से देश उन्हीं देशद्रोही हाथों में चला जाए. मैं सीधे आपसे पूछना चाहता हूँ कि आप जिन लोगों पर सार्वजानिक मंचों से गंभीर आरोप लगाते रहते हैं वे आजाद हवा में साँस कैसे ले रहे हैं? क्या आपको सिर्फ और सिर्फ आरोप लगाना ही आता है?

मित्रों, जो लोग आज फिर से जीरो लॉस थ्योरी की बात कर रहे हैं उनको मैं बता देना चाहता हूँ कि घोटाला तो हुआ था और जरूर हुआ था क्योंकि अगर सही तरीके से स्पेक्ट्रम अलॉटमेंट होता तो सरकार को ज्यादा फायदा होता। नियम बदलकर पहले आओ, पहले पाओ पॉलिसी अपनाई गई। मोदी सरकार ने नीलामी की तो न केवल ज्यादा पैसा मिला बल्कि आज फोन और डाटा की दर उस समय की अपेक्षा काफी सस्ती भी है। सनद रहे कि बाद में मोदी सरकार ने स्पेक्ट्रम को नीलाम किया। नतीजा यह हुआ कि जिस स्पेक्ट्रम के पहले 1734 करोड़ मिल रहे थे 2015 में 1.10 लाख करोड़ रुपए मिले। कुल मिलकर पूरे घटनाक्रम को अगर देखा जाए तो बिना नीलामी के स्पेक्ट्रम कुछ लोगों को दे दिया गया। पहले आओ पहले पाओ की पॉलिसी को भी बदलकर पहले पेमेंट करो, पहले पाओ कर दिया गया। यह पूरी तरह से भ्रष्ट पॉलिसी थी। 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी यही कहा था और आगे भी मामला सुप्रीम कोर्ट तक जानेवाला है।

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

क्या कांग्रेस आतंकी संगठन नहीं है?

मित्रों, हमारे पूर्वजों ने जो आजादी की लडाई के समय गर्व से सीना चौड़ा करके कहते थे कि मैं कांग्रेसी हूँ कभी सपने में भी नहीं सोंचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब कांग्रेस देशविरोधी आतंकवादियों की पार्टी बन जाएगी. क्या विडंबना है कि पाकिस्तान में जब भारत का सबसे बड़ा घोषित शत्रु आतंकी संगठन जमात उद दावा का संस्थापक हाफिज सईद चुनाव लडेगा तब लडेगा भारत में तो कांग्रेस पार्टी कई दशकों से न केवल चुनाव लडती आ रही है बल्कि देश पर अधिकांश समय राज भी किया है.

मित्रों, आतंकी सिर्फ वही नहीं होता जो फसाद करता है और निर्दोषों की हत्या करता है बल्कि वो भी आतंकी है जो उनको आर्थिक या नैतिक समर्थन देता है. हाफिज सईद अगर आतंकी है तो उससे सहानुभूति रखनेवाला हर व्यक्ति और हर संगठन आतंकी है. मौलाना मसूद अजहर अगर आतंकी है तो उसको लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ में वीटो करनेवाला चीन भी आतंकी है. चीन और पाकिस्तान तो फिर भी हमारे जानी दुश्मन है लेकिन यह समझ में नहीं आता कि स्वर्णिम इतिहास वाली कांग्रेस पार्टी कैसे भारतविरोधी आतंकियों से सहानुभूति रख सकती है. क्या उसको अब भारत में राजनीति नहीं करनी है? पाकिस्तान से चुनाव लड़ना है?

मित्रों, क्या कारण है जब भी किसी आतंकी का मुकदमा कोर्ट में जाता है तो कांग्रेसी वकीलों की फ़ौज उनके बचाव में खड़ी हो जाती है? कपिल सिब्बल का सोनिया और राहुल गाँधी के लिए वकालत करना तो समझ में आता है लेकिन सिमी, याकूब मेनन , कन्हैया, ख़ालिद उमर के लिए उनका व अन्य कांग्रसियों का कोर्ट में पैरवी करना समझ में नहीं आता. यहाँ तक कि तीन तलाक और राम मंदिर के मुद्दे पर भी सिब्बल कट्टरपंथी मुस्लिमों के पक्ष में खड़े होने से नहीं चूकते। यहाँ तक कि जब पाकिस्तान की अदालत हाफिज सईद को रिहा करती है तो कांग्रेस के होनेवाले महाराज राहुल गाँधी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता. वे इसके लिए पाकिस्तान की आलोचना करने और भारत सरकार के साथ मिलकर एकजुटता दिखाने के बदले उसका मजाक उड़ाने लगते हैं वो भी निहायत फूहड़ शब्दों में कि मोदी जी आपको ट्रम्प से और गले मिलना होगा हाफिज बाहर आ गया है. हद तो यह है कि कश्मीर में कांग्रेस का साझीदार फारूख अब्दुल्ला इन दिनों लगातार भारत के खिलाफ बोल रहा है फिर भी कांग्रेस चुप लगाए हुए है जैसे वो उसके ही मन की बात बोल रहा हो. सैयद अली शाह गिलानी के साथ कांग्रेसी नेताओं के कितने मधुर सम्बन्ध हैं यह हमलोग कई बार समाचार चैनलों पर देख चुके हैं.

मित्रों, कांग्रेस इतने पर ही रूक जाती तो फिर भी गनीमत थी जब चीन और भारत की सेना डोकलाम में आमने-सामने थी तब राहुल जा पहुंचे चीनी दूतावास में चीन के राजदूत से गले मिलने और कदाचित उनको यह बताने कि चढ़ बैठो भारत पर मैं तुम्हारे साथ हूँ. सिर्फ ऊपर के नेताओं तक बात थम जाती तो फिर भी गनीमत थी आज स्थिति इतनी बुरी हो गई है कि कांग्रेस के जिला और प्रखंड स्तर के कार्यकर्त्ता लश्कर के आतंकी निकल रहे हैं. जिस नोटबंदी के चलते कश्मीर में आतंकवाद में कमी आई है कांग्रेस अभी भी उसकी आलोचना किए जा रही है. समझ में नहीं आता कि अगर कश्मीर में आतंकवाद में कमी आती है तो इससे कांग्रेस को कैसी हानि हो रही है? क्या आपने कभी कांग्रेस को कश्मीर में होनेवाली किसी आतंकी घटना की निंदा करते हुए देखा है? आपको यह जानकर घोर आश्चर्य होगा कि हिज्बुल चीफ सैयद सलाऊद्दीन १९८७ में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुका है. आपको यह जानकर भी आश्चर्य होगा कि जब केंद्र में मनमोहन और कश्मीर में छोटे अब्दुल्ला की सरकार थी तब सीआरपीएफ़ के जवानों को कश्मीर में बिना हथियार के ड्यूटी करने के लिए बाध्य किया गया था. इतना ही नहीं आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने पर सेना के अधिकारियों को जेल जाना पड़ता था और कई तो अभी भी जेल में हैं.

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

कांग्रेसी कसमें और वादे बातें हैं बातों का क्या

मित्रों, क्या आपने कभी सब्जियों के दरख्तों का बगीचा देखा है? नहीं, क्या बात करते हैं? लगता है कि आपने चुनाव-दर-चुनाव कभी कांग्रेस पार्टी का घोषणा-पत्र नहीं पढ़ा है या फिर आपकी याददाश्त कमजोर है भारत की उस जनता की तरह जो ३ साल में ही भूल जाती है कि कांग्रेस ने केंद्र में यूपीए सरकार के समय कैसे-२ और कौन-२ से घोटाले किए थे. क्या कहा आपने कि आप उस पार्टी को झूठी व ठग पार्टी मानते हैं इसलिए आप उसका घोषणापत्र पढ़ते ही नहीं. वाह फिर तो आप बहुत समझदार हैं लेकिन तभी जब आप उसको वोट भी नहीं दें.

मित्रों, अब देखिए और सोंचिए न कि कांग्रेस पार्टी अपने घोषणापत्र में जो वादे लेकर आई है उसमें दूरदर्शिता क्या है? क्या इसमें कहीं यह बताया गया है कि वो राज्य के विकास के लिए क्या करेगी,राज्य के लोगों का जीवन-स्तर सुधारने के लिए क्या करेगी? बल्कि वो तो कहती है कि गुजरात के लोगों को पता है कि खुद का विकास कैसे करना है। अच्छा फिर आपकी जरुरत ही क्या है? वो यह भी भरमाते हैं कि विकास की अंधी दौड़ नहीं होनी चाहिए, विकास का मतलब खुश रहना होता है।

मित्रों, केंद्र में जब यूपीए की सरकार थी तो इसने सबको क्या मस्त खुश किया था? ए राजा खुश मतलब जनता खुश, एयर चीफ मार्शल त्यागी खुश जनता खुश, माल्या खुश पूरा देश खुश हाथ में किंगफिशर की बोतल पकड़कर. मतलब कि इन मतलबी लोगों का तो नारा ही यही है कि स्वयं जेब फाड़कर खाऊँगा और सबको पेट फाड़कर खाने दूंगा. खुद खुश रहूंगा और सारे घोटालेबाजों को खुश रखूंगा. जनता को चाटने के लिए लोल्लीपॉप थमा दूंगा. वैसे भी राहुल बाबा के अनुसार सुख और कुछ तो है नहीं मन की एक अवस्था मात्र है.

मित्रों, स्वतंत्र भारत के चुनावी इतिहास पर जब हम नजर डालते हैं तो घनघोर आश्चर्य होता है कि कांग्रेस पार्टी बार-२ काठ की हांडी में चुनावी खिचड़ी कैसे पका ले रही है और जनता कैसे उनके हाथों ख़ुशी-२ ठगी जाती है. कैसे जनता हो पता ही नहीं होता कि उसको ठगा गया है.

मित्रों, हमारे प्रधान सेवक जी को भी इन दिनों जो कहना चाहिए नहीं कह रहे हैं हालाँकि कर तो वही रहे हैं जो उनको करना चाहिए. हम जानते हैं कि भारत के कुछेक लोगों के लिए अभी भी नेशन फर्स्ट नहीं है लेकिन प्रधान सेवक जी को इसके लिए आह्वान करने से किसने रोका है? जब उनके मन में कोई खोट या छल नहीं है तो फिर देश की जनता से खुलकर और साफ़-२ बात करनी चाहिए कि हम जो भी अलोकप्रिय कदम उठा रहे हैं आपके लिए उठा रहे हैं, हम जो कुछ भी कर रहे हैं वो आपके लिए और आपके देश के लिए कर रहे हैं इसलिए कष्ट के खेद है और उसके बाद उनको बोलना चाहिए कि कांग्रेस के कैरेक्टर सर्टिफिकेट में छेद ही छेद है. ठीक उसी तरह से निर्भय होकर जनता से बात करनी चाहिए जैसे वो २०१४ में करते थे.

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

पढ़े फारसी बेचे तेल

मित्रों, जबसे १९९१ में भारत में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई तभी से देश में रोजगाररहित विकास के आरोप लगते रहे हैं हालाँकि इस दौरान देश की जीडीपी में तीव्र और अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिली है. २०१४ में जब नरेन्द्र मोदी की सरकार सत्ता पर काबिज हुई तो इस वादे के साथ कि वो हर साल १ करोड़ लोगों को रोजगार देगी. लेकिन अब तक इस दिशा में जो काम हुआ है वो कहीं से भी सराहनीय या संतोषजनक नहीं कहा जा सकता. तथापि अगर प्रति वर्ष १ करोड़ रोजगारों का सृजन कर भी लिया जाता है तो भी बेरोजगारी बढ़ेगी ही क्योंकि खुद केंद्र सरकार के आकंडे बताते हैं कि तेज जनसंख्या-वृद्धि के चलते देश में हर साल १२ मिलियन यानि १ करोड़ २० लाख नए श्रमिक जुड़ रहे हैं.

मित्रों, सीआईआई के अनुसार, वित्त वर्ष 2012 से 2016 के बीच भारत में रोजगार के 1.46 करोड़ मौके बने थे. यानी हर साल 36.5 लाख अवसर. साल 2016 की श्रम मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, बावजूद इसके पिछले सात सालों में टेक्सटाइल्स और आॅटोमोबाइल सहित आठ सेक्टर में रोजगार सृजन सबसे धीमा रहा है। 

मित्रों, प्रौद्योगिकी में उभरती तकनीकी के चलते भी नौकरियों में गिरावट देखने को मिली है।  मैककिंसे एंड कंपनी की एक रिसर्च आर्म्स ने 46 देशों में 800 से अधिक व्यवसायों को रिकवर किया, जिसके अनुसार 2030 तक दुनियाभर के कुल 800 मिलियन श्रमिक रोबोट और आॅटोमेटेड तकनीक के चलते अपनी नौकरियां खो सकते हैं। यह संख्या पूरी दुनिया के मजदूरों का पांचवा हिस्सा है. देश की सबसे बड़ी भर्ती कंपनी टीमलीज सर्विसेज लिमिटेड के मुताबिक रोबोटिक्स के चलते पिछले साल की तुलना भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के जॉब्स में 30 से 40 फीसदी की कमी देखी जा सकती है। साथ ही नोटबंदी और जीएसटी के चलते भी बहुत-से लघु और माध्यम उद्योग बंद हो गए हैं. उदाहरण के लिए सूरत के साड़ी और हीरा उद्योग, कानपुर के चमड़ा उद्योग, भदोही के कालीन उद्योग, लुधियाना के रेडीमेड-वस्त्र उद्योग, मुरादाबाद के पीतल उद्योग, फिरोजाबाद के चूड़ी उद्योग और अलीगढ के ताला उद्योग से जुड़ी कई फैक्ट्रियों पर ताले लग चुके हैं. यहाँ मैं आपको बता दूं कि लघु और माध्यम उद्योग कृषि के बाद भारत में सबसे ज्यादा रोजगार देनेवाला क्षेत्र है और इसमें लगभग ४५ करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है. साथ ही भारत के सकल घरेलू उत्पाद में इसकी हिस्सेदारी भी ४५ प्रतिशत की है.

मित्रों, अगस्त महीने में, औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग द्वारा जारी एक परिपत्र में कहा गया है कि भारत को भविष्य के लिए एक नई औद्योगिक नीति बनाने की जरूरत है, ताकि देश में प्रतिवर्ष कम से कम 100 अरब डॉलर की एफडीआई आकर्षित की जा सके। इस परिपत्र में यह दर्शाया गया है कि भारत में रोजगार सृजन ग्रोथ बिल्कुल धीमी है। इस नई औद्योगिक नीति के लिए केंद्र सरकार ने एक टास्क फ़ोर्स गठित किया है।

मित्रों, आर्थिक वृद्धि के साथ रोजगार के मौके बनने की रफ्तार बढ़ाने के लिए नीति आयोग ने भी तीन साल का एक ऐक्शन प्लान पेश किया है, जिसमें विभिन्न सेक्टरों में रोजगार सृजित करने की बात की गई है.

मित्रों, देखना यह है कि सरकार २०१९ तक सिर्फ योजनाएं और टास्क फ़ोर्स ही बनाती रहती है या फिर इस दिशा में धरातल पर कुछ काम भी होता है? वास्तव में संघ सरकार की असली परीक्षा इसी मोर्चे पर होनेवाली है. कल की तिमाही रिपोर्ट में जीडीपी भले ही उड़ान भर रही हो लेकिन इस समय पूरे भारत में रोजगार के क्षेत्र में मंदी है क्योंकि जिन क्षेत्रों में वृद्धि के चलते जीडीपी ने गति पकड़ी है उनमें रोजगार-सृजन न के बराबर है.

मित्रों, पढ़े फारसी बेचे तेलवाली कहावत यक़ीनन आपने भी सुनी होगी. हम पर तो यह बखूबी चरितार्थ भी हो रही है. आज ही मैंने हाजीपुर में ५००० रूपये मासिक पर नौकरी पकड़ी है बैठे से बेगारी भला. वैसे अगर भाजपा यूपी निकाय चुनाव जीतने के बाद इस मुगालते में है कि नोटबंदी और जीएसटी के बावजूद जैसे उसने यह चुनाव जीत लिया वैसे ही लोकसभा चुनाव भी आसानी से और प्रचंड बहुमत-से जीत जाएगी भले ही बेरोजगारी कम होने के बदले पहले से भी ज्यादा हो जाए तो निश्चित रूप से वो गलत है और इस दिशा में उसे परिणामात्मक कार्य करके दिखाना ही होगा वो भी २०२२ नहीं बल्कि २०१९ तक.

सोमवार, 13 नवंबर 2017

आसां नहीं है आदमी का मोदी होना

मित्रों, मिर्जा ग़ालिब ने कहा था कि बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना. कितने दूरदर्शी थे ग़ालिब जो यूरोप-अमेरिका से काफी पहले ही दो पंक्तियों में पूरे-के-पूरे अस्तित्ववादी दर्शन को कह डाला था.
मित्रों, अस्तित्ववाद कहता है कि हम जीवनभर अप्रामाणिक जीवन जीते हैं. हम बनना कुछ और चाहते हैं लेकिन बनते कुछ और हैं,हम करना कुछ और चाहते हैं लेकिन करते कुछ और हैं. मसलन मुकेश दिल्ली से मुंबई नायक बनने जाते हैं लेकिन परिस्थितिवश गायक बन जाते हैं. वैसे आरक्षण भी इन दिनों पढ़े फारसी बेचे तेल को चरितार्थ करने में अपना महती योगदान दे रहा है. अस्तित्ववाद तो यहाँ तक कहता है कि अगर हम प्रामाणिक जीवन नहीं जी सकते तो जिए ही क्यों?
मित्रों, सौभाग्यवश हमारा भारतीय दर्शन इस मामले में भी अतिवादी नहीं है. गीता में श्रीकृष्ण ने साफ शब्दों में हजारों साल पहले ही कहा था कि तेरे वश में परिणाम है ही नहीं बस कर्म है यद्यपि परिणाम वैसे ही होते हैं जैसे हमारे कर्म होते हैं.
मित्रों, तो हम बात कर रहे थे ग़ालिब की और आदमी के चाहकर भी इंसां नहीं हो पाने की मजबूरी की. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो मजबूरियों के आगे मजबूर नहीं होते बल्कि उत्तरोत्तर मजबूत होते जाते हैं. ऐसी ही एक शख्सियत का नाम है नरेन्द्र दामोदरदास मोदी. घनघोर गरीबी में उनका बचपन गुजरा लेकिन गरीबी उनके मनोबल को तोड़ न सकी और उसका बालमन सपना देखने लगा गरिबीविहीन भारत का. गृहस्थजीवन के छोटे-से दायरे में सिमटना उसने स्वीकार नहीं किया और पत्नी की रजामंदी से गृह त्याग दिया.
मित्रों, विवेकानंद की तरह हर क्षण भारत के लिए चिंतित रहनेवाला वो युवक पूरी जवानी भारत की खाक छानता रहा और भारत को समझने का प्रयास करता रहा. फिर अचानक उसके जीवन में गुजरात के भूकंप के रूप में भूकंप आया और उसने खुद को तबाह गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में पाया. पहले से कोई राजनैतिक अनुभव नहीं. कभी विधायक भी नहीं रहा था लेकिन वो घबराया नहीं और कुछ ही महीनों में गुजरात को फिर से खड़ा कर दिया और खड़ा भी कहाँ किया-चीन के आगे ले जाकर.
मित्रों, फिर ट्रेन में आग लगाकर आततायी मुसलमानों ने जिनमें से कई कांग्रेस पार्टी से जुड़े थे कई दर्जन निर्दोष हिन्दुओं को जिंदा जलाकर मार डाला और भड़क उठी दंगे की आग. जिन लोगों ने ट्रेन में यात्रियों को जलाकर दंगों की शुरुआत की उनको बचाने और मोदी को फंसाने की साजिश प्रधानमंत्री निवास और १० जनपथ में रची जाने लगी क्योंकि तब तक दिल्ली में सोनिया-मनमोहन की सरकार बन चुकी थी. वे लोग भूल गए कि हिन्दू कभी दंगों की शुरुआत नहीं करते. मोदी को रोजाना दरिंदा, खूनी, खूंखार आदि कहा जाने लगा. मानो उस समय केंद्रीय सत्ता के पाम दो ही काम रह गए थे-एक घोटाला करना और दूसरा योजना बनाना कि मोदी को कैसे जेल में डाला जाए और गुजरात से उखाड़ फेंका जाए. लेकिन मोदी डरे नहीं, घबराए नहीं, लडखडाए भी नहीं और ६ करोड़ गुजरातियों के विश्वास के बल पर सारी साजिशों को नाकाम कर दिया.
मित्रों, मोदी जब भारत के प्रधानमंत्री बने तब उनके माथे पर उम्मीदों का भारी बोझ नहीं पहाड़ था. जीडीपी को गति देनी थी, भ्रष्टाचार को कम करना था, बेरोजगारी दूर करनी थी, दुनिया में भारत के मान को पुनर्स्थापित करना था आदि. कुछ मोर्चों पर काम हुआ है तो कुछ पर अभी बहुत-कुछ होना है.
मित्रों, मोदी से इस दौरान कुछ गलतियाँ भी हुई हैं फिर भी हम ऐसा नहीं कह सकते कि मोदी की नीयत में खोट है यद्यपि उनसे नीतिगत भूल हुई है. मोदी का सीना कल भी भारत के लिए धड़कता था और आज भी केवल भारत के लिए ही धड़कता है. वाजपेयी की तरह ही आगे नाथ न पीछे पगहा. आज भी भारत की जनता ही मोदी का परिवार है, भारत के लोगों का प्यार ही मोदी की संपत्ति है.
मित्रों, इस बीच कुछ नेता मोदी की नक़ल करके खुद को मोदी साबित करने में जुट गए हैं. मोदी मंदिर जाते हैं इसलिए वे भी मंदिर जाते हैं जबकि वे न तो जन्मना और न ही कर्मना हिन्दू हैं. वे लोग जो इन दिनों अपने आपको विशुद्ध हिन्दू साबित करने में लगे हैं कुछ समय पहले ही सभी हिन्दुओं को आतंकवादी सिद्ध करने में जीजान से लगे थे और कहते थे कि लोग मंदिरों में पूजा करने नहीं लड़कियों के साथ छेड़खानी करने जाते हैं. जाहिर है कि रावन साधू बनकर सीतारुपी जनता को ठगने के लिए फिर से आया हुआ है और हर दरवाजे को खटखटाता फिर रहा है. शायद इस रावन को पता नहीं है कि नक़ल करके कोई मोदी नहीं बन सकता बल्कि ५६ ईंच का सीना लेकर जियाले माँ के पेट से पैदा होते हैं.
मित्रों, हो सकता है कि भविष्य में मोदी के लिए भी आज का मोदी बने रह पाना संभव न रह जाए. सब जनता के विश्वास पर निर्भर करेगा कि आगे मोदी और मजबूत होंगे या फिर खूँटी में टंगे अपने झोले को उठाकर फिर से देशाटन पर चल देंगे जैसा कि वे पहले कह भी चुके हैं. यद्यपि अगर ऐसा होता है तो यही समझा जाएगा कि भारत की जनता मोदी जैसे महान राष्ट्रभक्त के नेतृत्व के लायक है ही नहीं उसे तो लल्लू-पंजू चोर-बेईमान-लुटेरा-राष्ट्रद्रोही नेतृत्व ही चाहिए.

रविवार, 12 नवंबर 2017

राहुल गाँधी को ज्ञान प्राप्ति

मित्रों, सारी दुनिया जानती है कि आज से ढाई हजार साल पहले सिद्धार्थ गौतम को भारी तपस्या के बाद बोधगया के बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. सारी दुनिया यह भी जानती है कि गौतम अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल अर्थात बाधा को घर पर छोड़ कर रात्रि के समय गृहस्थ जीवन से पलायन कर गए थे.
मित्रों, बुद्ध के ढाई हजार साल बाद एक और राहुल भारतभूमि पर अवतरित हुए हैं और इनको भी ज्ञानप्राप्ति की तलाश है. लेकिन इसके लिए ये जंगल नहीं जा रहे बल्कि बार-बार थाईलैंड और यूरोप के चक्कर काट रहे हैं. यहाँ तक कि विदेशी बिगडैल महिलाओं के साथ होटल में कमरा भी साझा करते हैं. ऐसा लगता कि इनको रजनीश के दिए सम्भोग से समाधि के सिद्धांत पर कुछ ज्यादा ही यकीन है. 
मित्रों, यह मेरा व्यक्तिगत मत कदापि नहीं है कि इस अबोध बालक के उलटे क्रियाकलाप में इसका किंचित भी दोष नहीं है. दोषी तो इसके लिए आलेख और भाषण लिखनेवाले अथवा इसको सलाह देनेवाले हैं क्योंकि ये बेचारा तो आज से ३०-३५ साल पहले भी सादा स्लेट था और आज भी है. अब आज से कुछ दिन पहले ८ नवम्बर को अख़बारों में प्रकाशित इस चिरबालक के नाम से प्रकाशित आलेख को ही लें जिसमें सिवाय झूठ के और कुछ है ही नहीं. आलेख कहता है मोदी सरकार ने काफी तेज गति से आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्था का बंटाधार कर दिया है.
मित्रों, जबकि वास्तविक आंकड़े तो यही बता रहे हैं कि जब अर्थव्यवस्था अर्थशास्त्र के डॉक्टर मनमोहन सिंह के हाथों में थी तब उसकी हालत २०१० के बाद से ही दिन-ब-दिन ख़राब होती जा रही थी. देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर 2012-13 के दौरान तो 4.5 फ़ीसदी रही थी जो कि पिछले एक दशक की सबसे कम थी. इससे पहले विकास दर वर्ष २०१० में ८.९, २०११ में ६.७ प्रतिशत थी. सोनिया-मनमोहन सरकार के अंतिम वर्ष २०१३ में विकास दर हांफती हुई ४.७ प्रतिशत रही थी.
मित्रों, मोदी सरकार के शुभागमन के बाद वित्‍त वर्ष 2014-15 में देश की विकास दर लम्बी छलांग लगाती हुई 7.2 फीसदी पर पहुँच गयी. फिर 2015-16 में भारतीय अर्थव्यवस्था में 7.6 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई और वास्तविक प्रति व्यक्ति आय भी 6.2 फीसदी बढ़कर 77,435 रुपए हो गई। २०१६-१७ में विकास दर में हल्की सी गिरावट आई और यह ७.१ प्रतिशत पर रही. मगर ऐसा होना किसी भी प्रकार से अप्रत्याशित नहीं था क्योंकि अर्थव्यवस्था के शुद्धिकरण के लिए की गई नोटबंदी के बाद ऐसा होना अपेक्षित ही था.
मित्रों, अब आप ही बताईए कि राहुल के आलेख में सच का लेश भी है? अर्थव्यवस्था की हालत तो घोटालों के चहुमुखी विकास के चलते उनकी सरकार के समय ही ज्यादा ख़राब थी और मृत्युगामी थी. आश्चर्यजनक तरीके से बाद में और ८ नवम्बर से पहले गुजरात में दिए गए अपने कई भाषणों में भी राहुल ने मोदी सरकार को तेज गति से आगे बढती अर्थव्यवस्था का बंटाधार कर देने का आरोप लगाया.
मित्रों, चूंकि हम उनको आज भी अबोध बालक समझते हैं इसलिए हमें उनसे कोई गिला-शिकवा नहीं है बल्कि हम तो उस व्यक्ति के परम पवित्र चरणों को ढूंढ रहे हैं जो उनके लिए भाषण और आलेख तैयार करता है. वैसे सोनिया ताई हमारे जैसे अकुलीन की सुननेवाली नहीं हैं फिर भी हम उनसे अनुरोध करना चाहते हैं कि ताई उधार के ज्ञान से न तो कोई बुद्धत्व की प्राप्ति कर पाया है और न ही भविष्य में कर पाएगा बैशाख पूर्णिमा तो हर साल आता है और चला जाता है. फिर काहे उपले में घी लपेट रही हो इस उम्मीद में कि एक दिन उपला रोटी बन जाएगा? हो सकता है कि राहुल गुजरात चुनाव जीत भी जाएं लेकिन इसके लिए उसकी बौद्धिक योग्यता नहीं बल्कि सीधे तौर पर बुद्धिमान गुजरातियों की मूर्खता जिम्मेदार होगी.

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

गुजरात चुनाव,चीन और पाकिस्तान

मित्रों, एक बार फिर से दो राज्यों के चुनाव सर पर हैं. इसमें भी गुजरात चुनाव को लेकर उत्सुकता कुछ ज्यादा ही है. ऐसा लग रहा है जैसे चक्रव्यूह में अभिमन्यु को फंसाने की तैयारी चल रही हो. इस युद्ध में एक तरफ तो गुजरात और भारत के गौरव मोदी हैं वहीँ दूसरी तरफ विपक्ष ही नहीं बल्कि सीधे चीन और पाकिस्तान भी हैं. सवाल उठता है कि क्या गुजरात के लोग विशेषकर हिन्दू गुजरात के गौरव को हराकर चीन-पाकिस्तान को जिताएंगे?

मित्रों, हमने चीन और पाकिस्तान का नाम इसलिए लिया क्योंकि डोकलाम विवाद के समय चीन ने भारत सरकार को इसका परिणाम भुगतने की धमकी दी थी. फिर डोकलाम विवाद के समय राहुल चीनी दूतावास में कोई रिश्ते की बात तो करने गए नहीं थे. जहाँ तक पाक का सवाल है तो उसके नापाक मंसूबे किसी से छुपे हुए नहीं हैं. पाकिस्तान कभी नहीं चाहेगा कि भारत में देशहित को सर्वोपरि माननेवाली सरकार हो. पाकिस्तानी पत्रकार टीवी बहसों में खुलेआम कहते रहे हैं कि अगर मोदी तदनुसार हिन्दू राष्ट्रवाद को कमजोर करना है तो हिन्दुओं में फूट डालनी होगी.  पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई ने हार्दिक को प्लांट किया, आरक्षण आन्दोलन खड़ा करवाया और जानबूझकर हिंसा करवाई गयी.

मित्रों, इस युद्ध में एक पक्ष मीडिया भी है. बिहार चुनावों की तरह एक बार फिर से मीडिया माहौल को जातिवादी बना रही है. आपको याद होगा कि एबीपी पर जहानाबाद की हालत को इस तरह से बयां किया जा रहा था मानों वहां की हालत कश्मीर से भी ख़राब हो. इसी तरह से एनडीटीवी के रवीश कुमार बिहार में लोगों से उनकी जाति पूछते फिर रहे थे.

मित्रों, जिस तरह राम-रावण युद्ध में दुनिया के सारे राक्षस एकजुट हो गए थे वैसे ही गुजरात में भी इस समय एकजुट हो गए हैं. गुजरात चुनाव सिर्फ एक चुनाव नहीं है यह एक प्रयोग है जिसको आईएसआई आजमाने जा रही है. सवाल उठता है कि क्या हम आईएसआई के इस प्रयोग को सफल हो जाने देंगे? प्रश्न उठता है कि बिहार में भाजपा को हरा दिया गया था मगर परिणाम क्या हुआ? बिहार का विकास पूरी तरह से ठप्प हो गया और नीतीश कुमार को मन मार कर फिर से भाजपा के साथ जाना पड़ा.

मित्रों, हम मानते हैं कि कुछ गलतियाँ भाजपा से भी हुई हैं. सेक्स सीडी मामले में एकतरफा कार्रवाई करते हुए पत्रकार को भीतर कर दिया लेकिन मंत्री पर कार्रवाई नहीं की गई. साथ ही मुकुल राय को पार्टी में शामिल करना तो गलत है ही इसकी टाइमिंग भी गलत है. पार्टी को बताना चाहिए कि शारदा मामले में आरोपी मुकुल अब कैसे भ्रष्ट नहीं रहे. साथ ही व्यवसाय प्रधान राज्य होने के कारण कुछ असर तो जीएसटी का भी पड़ेगा.

मित्रों, फिर भी अंत में मैं गुजरातियों से पूछना चाहूँगा कि उनको विकसित भारत और गुजरात चाहिए या आरक्षण के नाम पर बर्बादी चाहिए. हम जब बचपन में क्रिकेट खेलते थे तब टॉस के समय सिक्का उछालने के समय हमेशा भारत को ही चुनते थे भले ही हर बार टॉस हार जाएं. जिस तरह से हमने २०११  और २०१६ में पश्चिम बंगाल, २०१२ में यूपी, २०१५ में बिहार की जनता को सचेत किया था उसी तरह से गुजरात की जनता को चेताना चाहेंगे कि अगर वो आरक्षण के चक्कर में पड़ेंगे तो गुजरात का भी विकास रूक जाना निश्चित है. आरक्षण की राजनीति ने पिछले २५-३० सालों में बिहार को कहाँ-से-कहाँ पहुंचा दिया जगजाहिर है. बिहार को आरक्षण ने लालू जैसा लम्पट दिया फिर गुजरात का हार्दिक तो इस मामले में लालू के बेटे से भी ज्यादा तेजस्वी है. जिस तरह लालू कभी बिहार का भला नहीं कर सकते वैसे ही हार्दिक भी गुजरात का भला नहीं कर सकता बस लालू की तरह आपको उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा करता रहेगा. ये तो अभी से ही होटल से थैली और अटैची भर-भर के रूपया ले जाने लगा है.

बुधवार, 25 अक्तूबर 2017

नीतीश जी आप ऐसे तो न थे

मित्रों, आपको याद होगा कि जब नीतीश कुमार जी २००५ में बिहार के मुख्यमंत्री बनाए गए थे तब बिहार की सडकों की क्या स्थिति थी. स्टेट हाईवे तो स्टेट हाईवे राज्य के नेशनल हाईवे की स्थिति भी इतनी बुरी थी कि पता ही नहीं चलता था कि गड्ढे में सड़क है या सड़क में गड्ढा. तब नीतीश जी ने दरियादिली दिखाते हुए न सिर्फ स्टेट हाईवे बल्कि नेशनल हाईवे की भी मरम्मत राज्य सरकार के खजाने से करवाई थी जबकि ऐसा करना उनकी जिम्मेदारियों में शामिल नहीं था. तब उनकी सोंच महान थी कि पैसा कहीं से भी व्यय हो राज्य का भला होना चाहिए.
मित्रों, अभी कुछ दिनों पहले जब हमने उन्हीं नीतीश कुमार जी को बिहार के विश्वविद्यालयों के बारे में मीडिया से बात करते हुए देखा तो सहसा न तो आखों को और न ही कानों को ही यकीन हुआ. श्रीमान फरमा रहे थे कि विश्वविद्यालय उनकी जिम्मेदारी नहीं हैं क्योंकि उनके कुलाधिपति तो राज्यपाल होते है.
मित्रों, बात दरअसल यह है कि बिहार राज्य के विवि शिक्षकों और कर्मचारियों को प्रत्येक महीने वेतन और पेंशन नहीं मिलता है. कभी-कभी तो ४-चार महीने की देरी राज्य सरकार की ओर से की जाती है. इस बीच उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कितनी खस्ता हो चुकी होती है का आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं. इस साल सितम्बर का वेतन-पेंशन अभी तक नहीं आया है जबकि सारे खर्चीले हिन्दू त्योहार इसी दौरान आते हैं. इस बीच जब कुछ दिन पहले पत्रकारों ने नीतीश जी से विवि के वेतन-पेंशन के बारे में पूछ लिया तो नीतीश जी ने मामले से पूरी तरह से अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा कि यह उनकी जिम्मेदारियों में आता ही नहीं है.
मित्रों, आप सहज ही अनुमान लगा सकते है कि जब राज्य का मुखिया ही अपनी जिम्मेदारियों के प्रति इस कदर उदासीन होगा तो राज्य में शिक्षा या सम्पूर्ण शासन-प्रशासन की स्थिति कैसे सुधर सकती है? क्या राज्य के विवि में दूसरे राज्य के लोग नौकरी करते हैं या उनमें दूसरे राज्यों के बच्चे पढ़ते हैं? अगर विश्वविद्यालय राज्य सरकार की जिम्मेदारी नहीं हैं तो हैं किसकी जिम्मेदारी? विश्वविद्यालय अधिनियम क्या अमेरिका की विधानसभा में पारित हुए थे या राज्यपाल को कुलाधिपति कहाँ की विधानसभा ने बनाया है? राज्य सरकार में सारे काम तो राज्यपाल के नाम पर ही होते हैं तो क्या मुख्यमंत्री की कहीं कोई जिम्मेदारी है ही नहीं? पता नहीं नीतीश जी को यह पल्ला झाड़ने की बीमारी कहाँ से लगी? कहीं केजरीवाल जी से तो नहीं जो लम्बे समय तक दिल्ली के विभागविहीन मुख्यमंत्री रह चुके हैं?
मित्रों, कदाचित बिहार के दिहाड़ी मजदूर भी नीतीश जी की जिम्मेदारियोंवाली सूची में नहीं आते हैं. तभी तो उनकी सरकार ने पिछले कई महीनों में राज्य में बालू के खनन पर रोक लगा रखी है जिससे राज्य में भवन-निर्माण का काम पूरी तरह से ठप है. अब अगर इन लाखों मजदूरों या विवि शिक्षकों-कर्मचारियों के परिवार में कोई भुखमरी से मर जाता है तो सरकारी डॉक्टर तो यही कहेंगे कि इसकी मौत भुखमरी से नहीं हुई है बल्कि मलेरिया का मच्छर काटने से किडनी में हार्ट अटैक हो गया था?

शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

निरंकुश न्यायपालिका के खतरे

मित्रों, हम सभी जानते हैं कि हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान में न तो कार्यपालिका, न ही संसद और न न्यायपालिका को ही बल्कि संविधान को ही सर्वोच्च कहा है. संविधान के अनुसार कानून बनाना संसद का काम होगा और संविधान की रक्षा करना न्यायपालिका का. यद्यपि तीनों के बीच अधिकारों का बंटवारा करते समय चेक एंड बैलेंस अर्थात नियंत्रण और संतुलन को प्राथमिकता दी गई तथापि उन्होंने इंग्लैंड की तरह संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया जिसके अनुसार राष्ट्रपति नाम मात्र का शासनाध्यक्ष होगा और उसको अपना शासन मंत्रिमंडल के परामर्श से चलाना होगा और वह परामर्श राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होगा.

मित्रों, यह परामर्श शब्द एक जगह और भी संविधान में आया है. संविधान का अनुच्छेद १२४ कहता है कि राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करता है जिन्हें वह इस कार्य के लिए आवश्यक समझता है. यह अनुच्छेद मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति को मुख्य न्यायाधीश से परामर्श लेना अनिवार्य बनाता है.
इसी प्रकार अनुच्छेद २१७ में प्रावधान किया गया है कि किसी उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, सम्बंधित राज्य के राज्यपाल एवं उस राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श लेना अनिवार्य है. परन्तु संविधान में परामर्श शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है कि यह परामर्श बाध्यकारी होगा अथवा नहीं. इसलिए यह पूर्णतः स्पष्ट नहीं है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में किसे प्रधानता होगी राष्ट्रपति को या न्यायाधीशों को.

मित्रों, न्यायपालिका की स्वतंत्रता बहुत संवेदनशील मुद्दा है क्योंकि प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कार्यकाल में उस पर कई गंभीर आघात किए गए थे. उसी समय “प्रतिबद्ध न्यायपालिका” का नारा दिया गया था और वरिष्ठतम जज की उपेक्षा करके उससे जूनियर जज को भारत का प्रधान न्यायाधीश बना दिया गया था. जिसके चलते इमरजेंसी के दौरान न्यायपालिका की भूमिका गौरवपूर्ण नहीं रही. इसीलिए उसके बाद पूरी कोशिश की गई कि न्यायपालिका को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त किया जाए और जजों की नियुक्ति में सरकारी भूमिका को कम किया जाए. 

मित्रों, कुछ इस तरह के माहौल में उपरोक्त अनुच्छेदों  में परामर्श शब्द को परिभाषित करने हेतु सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तीन निर्णय दिए गए जिन्हें ३ न्यायाधीशवाद की संज्ञा दी गई. प्रथम न्यायाधीशवाद में ७ न्यायाधीशों की पीठ ने 4:3 के बहुमत से १९८१ में निर्णय दिया कि अनु. १२४ एवं २१७ में परामर्श का अर्थ भारत के मुख्य न्यायाधीश की सहमति नहीं है. यदि राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश के मध्य मतभिन्नता आती है तो राष्ट्रपति की राय प्रभावी होगी. लेकिन वर्ष १९९३ में द्वितीय न्यायाधीशवाद में ९ न्यायाधीशों की पीठ ने ७:2 के बहुमत से वर्ष १९९३ में निर्णय को उलट दिया. इस निर्णय में परामर्श को सहमति माना गया और विवाद की स्थिति में मुख्य न्यायाधीश की राय को प्रभावी बताया गया. इसी निर्णय के आधार पर कोलेजियम प्रणाली अस्तित्व में आई.

मित्रों, इस प्रणाली में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश एवं २ अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीशों की राय से सरकार को अवगत करा दी जाने की व्यवस्था बनाई, जो कि राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी थी. अपवादस्वरुप सरकार मजबूत एवं ठोस तर्कों से अनुशंसित नियुक्ति को अस्वीकार कर सकती थी किन्तु निर्णय में व्यवस्था थी कि यदि पुनः अनुशंसा करनेवाले न्यायाधीश एकमत से सरकार के तर्कों को दरकिनार करके अनुशंसित नियुक्ति की पुनः अनुशंसा करते हैं तो सरकार यह नियुक्ति करने के लिए बाध्य होगी. इसके बाद वर्ष १९९८ में तृतीय न्यायाधीशवाद में कोलेजियम के आकार को बढाकर सर्वोच्च न्यायालय के ४ वरिष्ठतम जजों को भी शामिल कर लिया गया.

मित्रों, फिर तो माननीय न्यायमूर्तियों ने न्यायाधीश के पद की ऐसी अन्यायपूर्ण बंदरबांट की कि एनजेएसी पर सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान दिए गए आंकड़ों के अनुसार देश के 13 हाईकोर्ट में 52 फीसदी या करीब 99 जज बड़े वकीलों और जजों के रिश्तेदार हैं। आरोपों के अनुसार जजों की नियुक्ति प्रणाली में 200 अभिजात्य रसूखदार परिवारों का वर्चस्व है। सुप्रीम कोर्ट के जज कुरियन जोसफ ने कोलेजियम व्यवस्था में खामी पर सहमति जताते हुए सुधार के लिए खुलेपन की जरूरत जताई थी। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट अपने स्तर पर कोलेजियम व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए न्यायिक आदेश पारित करने में विफल रहा। उसने केंद्र सरकार को ही मेमोरेंडम ऑफ प्रोसिजर (एमओपी) में बदलाव करने का निर्देश दे दिया।

मित्रों, उसके बाद केंद्र सरकार ने बार-बार न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन के प्रयास किए. अंततः वर्ष २०१४ में वर्तमान केंद्र सरकार ने १२१वां संविधान संशोधन विधेयक २०१४ एवं राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक को दोनों सदनों से १४ अगस्त,२०१४ को पारित करवाया. तत्पश्चात राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को १३ अप्रैल, २०१५ को भारत सरकार के राजपत्र में अधिसूचित कर दिया गया. इस जन्म से पहले मार दिए गए राष्ट्रीय नियुक्ति आयोग में ६ सदस्य होने थे जिनमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय के ही २ वरिष्ठतम न्यायाधीश, केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री और दो प्रतिष्ठित व्यक्ति जो ३ सदस्यीय समिति जिसमें प्रधानमंत्री, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता शामिल होंगे द्वारा चयनित होंगे शामिल होने थे. परन्तु १६ अक्टूबर २०१५ को सर्वोच्च न्यायलय ने न्यायमूर्ति जे.एस. खेहर की अध्यक्षता में ५ न्यायाधीशों की पीठ ने ४:1 बहुमत से संविधान संशोधन को असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया और पुराने कोलेजियम प्रणाली को ही जारी रखने का निर्णय देते हुए इसकी खामियों में सुधार हेतु सुझाव मांगे. संविधान संशोधन और आयोग के गठन वाला कानून संसद के दोनों सदनों ने बिना किसी विरोध के पारित किया था और उसे 20 विधानसभाओं का भी अनुमोदन प्राप्त था. इसलिए यह कहा जा सकता है कि ये जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करते थे. इतना ही नहीं न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना विधि आयोग और प्रशासनिक सुधार आयोग जैसी संस्थाओं के व्यापक अध्ययन और सिफारिश के बाद की गई थी।

मित्रों, अब जबकि सुप्रीम कोर्ट एमओपी में बड़े बदलाव के लिए राजी नहीं है और उसके बगैर नए जजों की नियुक्ति लटकी है. चीफ जस्टिस के अनुसार विभिन्न हाईकोर्ट में 43 फीसदी पद रिक्त होने से 38 लाख मुकदमे लंबित हैं, लेकिन तथ्य यह भी है कि उच्च न्यायालयों के अलावा अन्य अदालतों में 3.5 करोड़ मुकदमे लंबित हैं। सवाल है कि ये मुकदमे क्यों लंबित हैं? इन अदालतों में तो जजों की नियुक्ति पर कोई गतिरोध नहीं है। न्यायिक सुधारों और जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव के बगैर केवल जजों की संख्या बढ़ाने से आम जनता को जल्दी न्याय कैसे मिलेगा? देश में 1940 और 1950 के दशक के मुकदमे अभी भी लंबित हैं। दूसरी ओर बड़े वकीलों की उपस्थिति से जयललिता और सलमान खान जैसे रसूखदारों के मुकदमों में तुरंत फैसला हो जाता है। पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण ने जजों के भ्रष्टाचार को दर्शाते हुए एक हलफनामा दायर किया था। राजनीतिक भ्रष्टाचार पर सख्ती दिखाने वाला सुप्रीम कोर्ट जजों की अनियमितताओं के मामलों में सख्त कारवाई करने में विफल रहा। दिलचस्प है कि जजों को बर्खास्त करने के लिए संविधान में महाभियोग की प्रक्रिया निर्धारित की गई है, लेकिन यह प्रक्रिया इतनी कठिन है कि उसके इस्तेमाल से आज तक कोई भी जज हटाया नहीं जा सका है।

मित्रों, आखिर हमारी अदालतें 19वीं शताब्दी के कानून और 20वीं सदी की मानसिकता से लैस होकर 21वीं सदी की समस्याओं को सिर्फ जजों की संख्या बढ़ा कर कैसे सुलझा सकती हैं? जब सीनियर एडवोकेट्स की नियुक्ति हेतु सभी जजों की सहमति चाहिए होती है तो फिर जजों की नियुक्ति हेतु पांच जजों की बजाय सभी जजों की सहमति क्यों नहीं ली जाती? जब लोकतंत्र के सभी हिस्से सूचना अधिकार कानून के दायरे में हैं तो फिर जज उसके दायरे में आने से परहेज क्यों करते है? जब संसद की कार्यवाही का सीधा टीवी प्रसारण हो सकता है तो फिर अदालतों की कार्यवाही का सीधा प्रसारण या रिकार्डिंग को क्यों रोका जा रहा है? अगर जजों के बच्चे या रिश्तेदार हाईकोर्ट में वकालत कर रहे हैं तो फिर ऐसे जज अपना तबादला खुद कराकर नैतिक मिसाल क्यों नहीं पेश कर पा रहे हैं? सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार तीन महीने से ज्यादा कोई आर्डर रिजर्व नहीं रखा जा सकता। इसके बावजूद तमाम मामलों में सालों साल बाद आदेश पारित हो रहे हैं।

मित्रों, सुप्रीम कोर्ट द्वारा एडीआर मामले मे दिए गए फैसले के बाद सांसद और विधायक का चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को व्यक्तिगत विवरण का हलफनामा जरूरी हो गया है। यदि जज भी सत्ता केंद्रों के साथ अपने संबंधों का हलफनामा दें तो उनकी नियुक्ति पारदर्शी हो जाएगी। इस तरह का हलफनामा देने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट की खामोशी चिंताजनक है। नेम और शेम के तहत हलफनामे में विवरण के अनुसार रिश्तेदारों को चयन प्रक्रिया से बाहर होना ही पड़ेगा। इससे समाज के वंचित वर्ग के योग्य लोगों को जज बनने का मौका मिलेगा। हलफनामे में गलत तथ्य होने पर जजों को बगैर महाभियोग के हटाने में आसानी होगी।

मित्रों, सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अपनी जगह है, लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि कॉलेजियम प्रणाली बहुत सुचारु ढंग से काम नहीं कर रही है. इसमें सुधार-संबंधी सुझावों पर विचार करने की बात कहकर खुद सुप्रीम कोर्ट ने प्रकारांतर से यह स्वीकार किया है कि प्रणाली में खामियां हैं. पिछले कई वर्षों के दौरान हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई जजों के भ्रष्टाचार के बारे में सवाल उठे हैं. देश के शीर्षस्थ कानूनविदों में से एक फाली एस. नरीमन ने हालांकि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का विरोध किया था, लेकिन उनका भी यह कहना था कि कॉलेजियम प्रणाली बिलकुल भी पारदर्शी नहीं है और इसे बदलने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि वह आयोग का इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि छह सदस्यों वाले इस आयोग में तीन ऐसे सदस्यों की नियुक्ति का प्रावधान है जिनमें कानून मंत्री भी शामिल होंगे और शेष दो सदस्य ऐसे होंगे जिनका कानून से कोई वास्ता ही नहीं होगा. इस तरह जजों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश पैदा हो जाएगी.

मित्रों, दरअसल सबसे बड़ी समस्या यह है कि एक बार जज बन जाने के बाद उस व्यक्ति पर चाहे कितना भी गंभीर आरोप क्यों न लग जाए, उसे उसके पद से हटाने की प्रक्रिया इतनी कठिन और लंबी है कि हटाना लगभग असंभाव ही है. इसके कारण यह सवाल पैदा होता है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बरकरार रखते हुए उसे जवाबदेह कैसे बनाया जाए. इस समय किसी को भी यह नहीं पता है कि जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया क्या है और उन्हें किन कसौटियों पर कसने के बाद नियुक्त किया जाता है, यानी उनकी नियुक्ति के लिए क्या मानक तय किए गए हैं. इसलिए यह राय बल पकड़ती जा रही है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बचाने के नाम पर न्यायपालिका ने खुद को निरंकुश बना लिया है. यह अपने अधिकारों का दुरुपयोग तो है ही साथ ही लोकतंत्र में उसका कोई भी स्तंभ निरंकुश नहीं हो सकता.

मित्रों,कहाँ तो हमने सोंचा था कि वर्तमान केंद्र सरकार पूरी-की-पूरी न्याय व्यवस्था में ही आमूल-चूल परिवर्तन करेगी जिससे डिजिटलाईजेशन के इस युग में न्याय पाना चुटकी बजाने जितना आसान होगा और कहाँ अभी तक उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति को लेकर जारी गतिरोध ही दूर नहीं हो सका है. सवाल उठता है कि न्यायपालिका में बांकी के सुधार भी क्या स्वयं न्यायपालिका ही करेगी या संसद को बेधड़क होकर करने देगी जो संसद का संवैधानिक अधिकार भी है? फिर भी मैं मानता हूँ कि सरकार और संसद को इस दिशा में अपना काम तेजी से जारी रखना चाहिए जिससे हमारी न्याय व्यवस्था २१वीं सदी के साथ त्वरित गति से कदम-से-कदम मिलाकर चल सके. अगर आगे भी सर्वोच्च न्यायालय इस पवित्र कार्य में बाधा डालता है तब भी जनता के समक्ष यह तो साबित हो ही जाएगा वर्तमान सरकार की मंशा में कोई खोट नहीं है.

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

जारी है अरेस्ट वारंट, फिर भी थमा दी महिला थाना की कमान

मित्रों, एक कहावत तो आपने सुनी होगी कि भगवान के घर देर है लेकिन अंधेर नहीं. लेकिन बिहार में तो देर भी लगती है और अंधेर भी ख़त्म नहीं होता. हाजीपुर में पुलिस डिपार्टमेंट का एक अजीब कारनामा सामने आया है. मामला है वारंटी एसएचओ को थाने की कमान देने का. दरअसल मुजफ्फरपुर कोर्ट की वारंटी लेडिज पुलिस सब इंसपेक्टर पूनम वैशाली के हाजीपुर महिला थाना की थानेदार हैं. कोर्ट के आदेश की परवाह नहीं है. संबंधित कोर्ट से लेकर डिस्ट्रिक्ट जज, उच्च न्यायालय में उनकी अग्रिम जमानत अर्जी खारिज हो चुकी है. लोकायुक्त पटना तक मामला पहुंच चुका है.कानून की अवहेलना का मामला संज्ञान में लाए जाने के बाद लोकायुक्त भी हैरान हैं. वैशाली एसपी को जीएससीसीए रूल का हवाला देते हुए पूछा गया है जिस पुलिस पदाधिकारी को निलंबित करते हुए उनके विरुद्ध विभागीय स्तर पर कार्रवाई होनी चाहिए थी वे अपने पद पर कैसे बनी हुई हैं. कैसे वे थानेदारी कर रही है?

लोकायुक्त पटना ने इस मामले को गंभीरता से लिया है. मामले की सुनवाई की तिथि 25 जुलाई 2017 निर्धारित करते हुए आरोपी को हाजिर कराने के संबंध में एसपी को लिखा गया था. वहीं हाजीपुर महिला थाना की एसएचओ पूनम कुमारी के खिलाफ आरोपों की जांच कर तीन माह के भीतर रिपोर्ट देने को कहा गया है.

मामले में आरोपित की गईं एसआई पूनम ने अग्रिम जमानत के लिए कोर्ट में आवेदन दिया था. 14 दिसंबर 1999 को कोर्ट ने वेल पीटिशन खारिज कर 10 दिनों के भीतर कोर्ट में समर्पण करने का आदेश दिया था.

 इसके बाद वे डिस्ट्रिक्ट जज की कोर्ट में एंटी सेपरेटरी बेल के लिए 234/99 पीटिशन दिया वह भी मामले की गंभीरता देखते हुए खारिज कर दिया गया. संबंधित कोर्ट ने बार-बार अहियापुर थाना जहां वे पोस्टेड थीं उसे रिमांइडर देकर आरोपी दाराेगा को कोर्ट में सदेह हाजिर कराने का आदेश दिया.

वैशाली जिला में योगदान दे रही एसआई पूनम कुमारी फिलवक्त हाजीपुर महिला थाने की थानेदार हैं. पूनम कुमारी इससे पहले मुजफ्फरपुर में पोस्टेड थीं. मुजफ्फरपुर के अहियापुर थाना में 17 वर्ष पूर्व उनके खिलाफ कांड संख्या 99/99 के तहत आपराधिक मामला दर्ज हुआ था.

इतना ही नहीं वैशाली महिला थाना की थानाध्यक्ष का काम सँभालने के दौरान भी पूनम कुमारी के विरुद्ध जाति सूचक गाली देकर मारपीट करने के कई मुकदमें दर्ज हो चुके हैं. नगर थाना क्षेत्र के मीनापुर मधुवन मोहल्ला की रामपरी देवी द्वारा अक्टूबर २०१६ में दायर किए गए मामले में तो उनका वेल पेटीशन भी रद्द हो चुका है. आरोप है कि जब पीड़िता अपने पुत्र एवं बहू द्वारा की जा रही मारपीट की शिकायत करने थाना पर गई तो थाना प्रभारी पूनम कुमारी ने अनुसूचित जाति की इस बुजुर्ग महिला को जाति सूचक गालियां देते हुए थप्पड़ मारकर गिरा दिया।

इसी तरह २५ मार्च २०१७ को महिला थानाध्यक्ष पूनम कुमारी समेत छह लोगों के विरुद्ध मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के न्यायालय में एक आपराधिक मामला दायर किया गया। उक्त मामला बरांटी ओपी क्षेत्र में बरुआ बहुआरा गांव के नागेंद्र सिंह ने दायर किया है।

दायर मामले में महिला थानाध्यक्ष पूनम कुमारी के अलावे अवर निरीक्षक अर्चना कुमारी, सहायक अवर निरीक्षक प्रदीप राय, चौकीदार विनोद पासवान, राजापाकर थाना क्षेत्र के दयालपुर गांव के विभा देवी तथा अजय कुमार सिंह को नामजद आरोपी बनाया गया है। भादवि की धारा 323, 379, 384 406 तथा 409 अंतर्गत दायर इस मामले को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी जयराम प्रसाद ने जांच एवं साक्ष्य हेतु अपनी निजी संचिका में रख लिया है।

मित्रों, जब मैंने खुद थाना पर जाकर थानाध्यक्ष से इन मामलों पर बात करने की कोशिश की तो उन्होंने यह कहते हुए कि यहाँ मिडिया का प्रवेश प्रतिबंधित है सीधे हम पर ही गालियों की बौछार कर दी. मैं नहीं समझता हूँ कि जब तक पूनम कुमारी महिला थाने की थानेदार है किसी भी महिला को यहाँ से न्याय मिल भी सकता है. वे सिर्फ पैसा पहचानती है. यहाँ तक कि थाना परिसर में ही रहनेवाले नाका न. २ के कर्मियों से भी पानी देने के बदले एक-एक हजार रूपये मांग रही है. मैं समझता हूँ कि उसने और बांकी से थाना स्टाफ ने व्यापक पैमाने पर भ्रष्टाचार करके काफी ज्यादा कालाधन और बेनामी संपत्ति भी अर्जित की है जिसकी भी जाँच होनी चाहिए. साथ ही इस बात की भी जाँच होनी चाहिए कि उसको किन-किन लोगों का वरदहस्त प्राप्त है जिसके बल पर वो जेल में होने के बजाए आज की तारीख तक थानेदार बनी हुई है.

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

पागल कौन विकास या राहुल?

मित्रों, उन दिनों मैं हाई स्कूल में पढता था. इसी दौरान मुझे आरा जाने का अवसर मिला. वहां रेलवे स्टेशन पर मैंने एक पागल को देखा जो लगातार बडबडा रहा था कि पागल मैं नहीं हूँ पूरी दुनिया पागल है. मैं आश्चर्यचकित था कि इसको खुद के शरीर तक की सुध तो है नहीं और ये पूरी दुनिया को पागल बता रहा है? बाद में कई पागलों के व्यवहारों का जब मैंने सूक्ष्म विश्लेषण किया तो यही समझ में आया कि पागलपन की बीमारी का यह सामान्य लक्षण है कि हर पागल दूसरों को ही पागल समझता है.
मित्रों, मुझे पता नहीं है कि राहुल गाँधी कहाँ तक मानसिक रूप से स्वस्थ हैं लेकिन उनका व्यवहार जबसे वे सार्वजानिक जीवन में आए हैं हमेशा असामान्य रहा है. कभी विधेयक की कॉपी फाड़ने लगते हैं तो कभी लेडिज टॉयलेट में घुस जाते हैं. कभी आलू की फैक्ट्री लगाने की बात करने लगते हैं. कभी भारत-चीन के बीच भारी तनाव के समय चीनी दूतावास में गुप्त मंत्रणा करने चले जाते हैं तो कभी कहते हैं कि लोग मंदिर लुच्चागिरी करने जाते हैं. इतना ही नहीं कभी यह भी कह देते हैं कि भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा कथित भगवा आतंकवाद है जबकि पूरी दुनिया जानती है कि आतंकवाद का रंग हरा होता है भगवा तो हरगिज नहीं. कभी अचानक थाईलैंड की गुप्त यात्रा पर निकल जाते हैं. खुद साल के ६ महीने विदेश में क्यों रहते हैं नहीं बताते लेकिन प्रधानमंत्री की आधिकारिक विदेश यात्रा पर ऊंगली उठाते हैं. इतना ही नहीं प्रेम भी करते हैं तो किसी सामान्य लड़की से नहीं बल्कि पोर्न अभिनेत्री के साथ. कभी भारत की नाकामी के प्रतीक मनरेगा को रोजगार देनेवाली महान योजना बताते हैं तो कभी कहते हैं कि कांग्रेस घमंडी हो गई थी इसलिए हार गयी. कभी कहते हैं कि हम तो रोजगार नहीं ही दे पाए मोदी भी नहीं दे पा रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि भारत इन दिनों एफडीआई में दुनिया में शीर्ष पर है इसलिए भारी मात्रा में रोजगार का आना तय है.
मित्रों, जब प्रधानमंत्री बनना उनके लिए जमीन पर गिरे हुए सिक्के को उठाने से भी ज्यादा आसान होता है तब एक पुतले को पीएम बनाकर अनंत घोटालों का आनंद लेते हैं और जब चुनाव हार जाते हैं तो कहते फिरते हैं कि मैं प्रधानमंत्री बनने को तैयार हूँ. मैं ६ महीने में देश की कायापलट कर दूंगा मानों उनको भी भगवान बुद्ध की तरह अचानक ज्ञान की प्राप्ति हो गई हो. आश्चर्य है राहुल बाबा को आज तक पता ही नहीं है कि एनआरआई किसको कहते हैं! उनको यह भी पता नहीं है कि वे भारत में पैदा हुए हैं या इटली में इसलिए वे भारत की महिलाओं से शोर्ट और निक्कर पहनने की आशा रखते हैं. खुद के हाथों में जब शासन की बागडोर होती है तो देश को भ्रष्टाचार और अराजकता की आग में जान-बूझकर झोंक देते हैं और चीन-पाकिस्तान के हाथों का खिलौना बन जाते हैं और जब अगली सरकार भ्रष्टाचार,आतंकवाद और माओवाद को जड़ से ही समाप्त करने का माद्दा दिखाती है और देश के विकास की गाड़ी को फिर से पटरी पर लाना चाहती है तो चीन से तुलना कर-करके कहते हैं कि विकास पागल हो गया है, विकास को पागलखाने से वापस लाना होगा इत्यादि.
मित्रों, अब आप ही बताइए कि इन दिनों पागल कौन है विकास या स्वयं राहुल गाँधी? विकास अगर पागल था भी तो सोनिया-मनमोहन के समय था. जब एक साथ तीनों लोकों में घोटाले किए जा रहे थे तब विकास पागल था, जब हिंदूविरोधी सांप्रदायिक दंगा विधेयक लाया जा रहा था तब विकास पागल था, जब लालू,मुलायम,मायावती मुकदमों से बरी हो रहे थे तब विकास पागल था, जब भगवा आतंकवाद की झूठी कहानी रची जा रही थी तब विकास पागल था, जब लाल किले से घोषणा की जा रही थी कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ कथित अल्पसंख्यकों का है तब विकास पागल था. अब तो विकास के पागलपन को दूर किया जा रहा है राहुल बाबा.
मित्रों, मैं समझता हूँ कि मोदी सरकार को तो अपनी उपलब्धियों को गिनाने की आवश्यकता ही नहीं है. केरल-कश्मीर से लेकर डोकलाम तक प्रत्येक क्षेत्र में स्वयं उसका काम बोलता है और रोज ही बोलता है. अब राहुल बाबा को दिखाई और सुनाई नहीं दे रहा है तो इसमें हम क्या कर सकते हैं या मोदी सरकार क्या कर सकती है? पेट्रोल के दाम ७-आठ रूपये बढे थे अब कम भी हो रहे हैं. जीएसटी को लेकर भी व्यापारियों को जो समस्याएँ थीं दूर कर दी गई हैं. आश्चर्य है कि राहुल गाँधी को नोट और कागज में कोई फर्क क्यों नजर नहीं आ रहा है? वे क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था का शुद्धिकरण हुआ है? आतंकियों और नक्सलियों की गतिविधियों में कमी आई है. बेनामी संपत्ति की जब्ती से अर्थव्यवस्था पूरी तरह से शुद्ध और पवित्र हो जाएगी. क्या उनसे हम उनकी क्षमता से बहुत ज्यादा की उम्मीद कर रहे हैं? क्या उनके दोनों कानों के बीच का स्थान रिक्त है? क्या उन्होंने विदेश जाकर ऐय्याशी करने के अलावे और कुछ सीखा ही नहीं है या सीख ही नहीं सकते ?
मित्रों, ये तो हद की भी हद हो गयी. जो खुद शुरुआत से ही पागलों सरीखा व्यवहार करता आ रहा है एक भ्रष्टाचार मुक्त शासन देनेवाली और सच्चे मन से भारत को फिर से विश्वगुरु बनाने की दिशा में काम करनेवाली सरकार को ही पागल बता रहा है? ये सब क्या है राहुल बाबा? कब तक बचपना करते रहिएगा? अब तो ४७ साल के हो चुके हैं आप, अब तो अपना ईलाज सही पागलखाने के सही डॉक्टर से करवाईए. बांकी आपकी और आपकी माँ की मर्जी. हम तो सर्वे भवन्तु सुखिनः में विश्वास रखते हैं इसलिए आपकी बीमारी देखकर हमसे चुप नहीं रहा गया.

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

क्या यशवंत सिन्हा सचमुच भीष्म हैं?

मित्रों, पता नहीं क्यों हम अपने संस्कृत और तदनुसार अपनी संस्कृति से कटते जा रहे हैं. कदाचित इसी का परिणाम होता है कि हम कई बार अपने शास्त्रों से गलत उदाहरण दे जाते हैं. हो सकता है कि भारत के पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा अंग्रेजी के विद्वान हों लेकिन भारतीय वांग्मय के बारे में उनकी जानकारी शून्य है यह उन्होंने अपने बारे में गलतफहमीयुक्त उदाहरण देकर साबित कर दिया है.
मित्रों, आप सभी जानते हैं कि यशवंत सिन्हा जी ने पिछले दिनों खुद को भीष्म पितामह घोषित किया है. तो पहले बात कर लेते हैं इसी बात पर कि भीष्म थे कौन और उन्होंने क्या-क्या किया था. भीष्म हस्तिनापुर के राजा शांतनु के पुत्र थे जिनका जीवन महान त्यागों से भरा पड़ा है. किशोरावस्था में उन्होंने पिता की ख़ुशी के लिए आजीवन ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा की और सिंहासन का परित्याग कर आजीवन हस्तिनापुर की राजगद्दी की सेवा करने का व्रत लिया.
मित्रों, बाद में उनको अपनी प्रतिज्ञाओं के कारण भारी मानसिक क्लेश झेलने पड़े, यहाँ तक कि पुत्रवधू का चीरहरण तक देखना पड़ा लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी. महाभारत की लडाई में भीष्म को अधर्म के पक्ष में सेनापति बनकर युद्ध करना पड़ा. उनकी अपराजेयता से परेशान होकर पांडवों द्वारा पूछने पर धर्मविजय के निमित्त उन्होंने स्वयं अपनी पराजय का उपाय पांडवों को बता दिया. कल होकर उनका सबसे प्रिय पौत्र अर्जुन उनके समक्ष उपस्थित तो हुआ लेकिन अपने आगे शिखंडी को ढाल बनाकर.
मित्रों, शिखंडी के पीछे से वाण चलाकर अर्जुन ने उनके रोम-रोम को अपने पैने वाणों से छेद दिया लेकिन महात्मा भीष्म इस भीषण दर्द को चुपचाप सहते रहे उत्तर नहीं दिया. बाद में शरशैया पर भी तब तक जीवित रहकर ईच्छा मृत्यु के वरदान के बावजूद असह्य पीड़ा को सहते रहे जब तक हस्तिनापुर का सिंहासन चहुँओर से सुरक्षित न देख लिया.
मित्रों, तो ऐसे महात्मा भीष्म से अपनी तुलना करके मियां मिट्ठू बन रहे हैं वयोवृद्ध यशवंत सिन्हा. शायद उनको पता नहीं कि सिर्फ उम्रदराज हो जाने से ही कोई इतना महान नहीं हो जाता कि उस भीष्म पितामह से अपनी तुलना करने लगे जिनके आगे भगवान श्रीकृष्ण का सिर भी श्रद्धा से स्वतः झुक जाया करता था. आईएएस की नौकरी समय से पहले छोड़ने के सिवाय ऐसा कौन-सा त्याग किया है यशवंत बाबू ने और क्या ऐसा करनेवाले वे एकमात्र व्यक्ति हैं? ऐसा उन्होंने किया भी तो अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए किया न कि देशहित या देशसेवा की भावना से आप्लावित होकर. पहले चंद्रशेखर के साथ चिपके फिर भाजपा में आ गए.
मित्रों, आपको याद होगा कि जब यशवंत चंद्रशेखर सरकार में वित्त मंत्री थे तब उनकी महान आर्थिक नीतियों के चलते भारत के खजाने की हालत ऐसी हो गई थी कि भारत को ४७ टन सोना गिरवी तक रखना पड़ा था. वाजपेयी सरकार में जब वे वित्त मंत्री थे तब उन पर कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लगे. उन्होंने कथित तौर पर मारीशस के रास्ते भारी मात्रा में अपने कालेधन को सफ़ेद किया था. उनका कार्यकाल बहुत जल्द इतना विवादित हो गया था कि उनको वित्त मंत्री के पद से हटाना पड़ा. फिर भी भाजपा ने उनका मान रखा और मंत्रिमंडल में बनाए रखा. विदेश मंत्री के रूप में उनकी उपलब्धि क्या रही शायद वे ही बेहतर जानते होंगे.
मित्रों, बाद में वे कई बार हजारीबाग से सांसद बने लेकिन अपने बल पर नहीं पार्टी के नाम पर? क्योंकि सांसद बनकर भी वे ठसकवाले आईएएस ही ज्यादा रहे और जनता से आयरन कर्टन सरीखी दूरी बनाए रखी. पिछली बार अपनी जगह बेटे को खड़ा किया जो इन दिनों संघ सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री हैं. श्री सिन्हा का आरोप है कि इन दिनों भारतीय अर्थव्यवस्था का चीरहरण हो रहा है और वे इसे चुपचाप नहीं देख सकते. सिन्हा जी भारत के इतिहास में पहली बार तो भारत की अर्थव्यवस्था को महान और भ्रष्टाचारमुक्त बनाने की निःस्वार्थ कोशिश हो रही है और आप राग विलाप आलाप रहे हैं? जीडीपी की वृद्धि-दर इस तिमाही में घटी है तो अगली में बढ़ जाएगी इसके लिए उपाय किए जा रहे हैं. रोजगार भी बढ़ेगा बस थोडा-सा धैर्य रखिए ये अभूतपूर्व एफडीआई जो आ रही है कोई अंचार डालने के लिए नहीं आ रही . सिन्हा जी या तो आपको अर्थव्यवस्था की बुनियादी समझ ही नहीं है या फिर आप भी उस शत्रु-मंडली का हिस्सा बन गए हैं जो देश में भ्रष्टाचार की जड़ों को बचाने और चीन-पाकिस्तान के साथ मिलकर देश और मोदी सरकार को कमजोर करने की इन दिनों जी-तोड़ कोशिश कर रही है.
मित्रों, दूसरी बात की सम्भावना ही ज्यादा है कि यशवंत सिन्हा जी जानबूझकर उस कांग्रेस की गोद में जा बैठे हैं जो स्वयं को भ्रष्टाचार का पर्याय बना चुकी है. पता नहीं उनकी ऐसी क्या मजबूरी है कि जीवन की सांध्य-बेला में कौरव-पक्ष और उसका अनाचार उनको ज्यादा प्रिय लगने लगा है?
मित्रों, देश की जनता एक लम्बे समय से राजनेताओं की अवकाशप्राप्ति की उम्र निर्धारित करने की मांग कर रही है जो उचित भी है. यूपीए सरकार के समय रक्षा मंत्री एंटोनी सेना की सलामी के दौरान ही बेहोश हो गए थे. इसी तरह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लाल किले पर झंडे की रस्सी ही नहीं खींच पाए थे. अगर मोदी जी ने राजनेताओं की अवकाशप्राप्ति की आयु अघोषित रूप से निर्धारित कर दी तो क्या गलत किया? नौकरीवाले रिटायर होते है तो नेता क्यों नहीं हों? फिर यह प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार होता है कि वो किसको मंत्री रखेगा और किसको नहीं और किस मंत्रालय में रखेगा. क्या सिन्हा जी जबरदस्ती मंत्री बनना चाहते हैं? पता नहीं सच क्या है लेकिन इतना तो तय है कि सिन्हा जी को अपनी तुलना प्रातःस्मरणीय भीष्म पितामह से नहीं करनी चाहिए थी. कहाँ तो उन्होंने कुर्सी का त्याग किया था और कहाँ ये कुर्सी के लिए हस्तिनापुर के राजसिंहासन के ही नहीं बल्कि हस्तिनापुर के शत्रुओं से जा मिले हैं.

शनिवार, 30 सितंबर 2017

दुर्गा पूजा के नाम पर पापाचार

मित्रों, अगर मैं कहूं कि धर्म दुनिया का सबसे जटिल विषय है तो यह कदापि अतिशयोक्ति नहीं होगी. विडंबना यह है कि कई बार जब कोई धर्म अपने मूल स्वरुप में सर्वकल्याणकारी हो तो उसमें स्वार्थवश इतने अवांछित परिवर्तन कर दिए जाते हैं कि वह घृणित हो जाता है तो वहीँ दूसरी ओर कोई धर्म जब अपने मूल स्वरुप में ही राक्षसी होता है और उसमें देश, काल और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन आवश्यक हो जाता है तब उसके अनुयायी परिवर्तन को तैयार ही नहीं होते.
मित्रों, पहले प्रकार के धर्म का सर्वोत्तम उदाहरण बौद्ध धर्म है और दूसरे प्रकार के धर्म का इस्लाम. बुद्ध ने कहा कि ईश्वर होता ही नहीं है लेकिन उनके अनुयायियों ने परवर्ती काल में उनको ही ईश्वर बना दिया. फिर महायान-हीनयान-वज्रयान-तंत्रयान इतने यान आते गए कि बुद्ध द्वारा संसार को दिया गया मूल ज्ञान ही लुप्त हो गया. कुछ ऐसी ही स्थिति कबीर पंथ की हुई. कबीर ने कहा मैं तो कूता राम का मोतिया मेरा नाऊं, गले राम की जेवड़ी जित खींचे तित जाऊं. लेकिन कबीरपंथियों ने उनको इन्सान से सीधे उनके आराध्य राम से भी बड़ा पारब्रह्मपरमेश्वर बना दिया. राधे मां और राम रहीम सिंह ने तो एक कदम आगे बढ़ते हुए खुद को ही भगवान घोषित कर दिया. एक और बाबा थे पंजाब के जिनका जन्म बिहार में हुआ था नाम था आशुतोष महाराज. उनके अनुयायी यह कहकर पिछले ३-४ साल से उनका अंतिम संस्कार नहीं कर रहे हैं कि आशुतोष फिर से जीवित हो जाएंगे. मतलब कि चाहे धर्मगुरु हो या उनके अनुयायी वे धर्म, ईश्वर और नैतिकता की कई बार वैसी व्याख्या करते हैं जिससे उनका स्वार्थ सधता हो. 
मित्रों, दुर्भाग्यवश इस तरह की दुष्टता से जगत की जननी और पालक माँ दुर्गा भी नहीं बची हैं. यह सही है कि मार्कंडेय पुराण के अनुसार दुर्गा माता ने रक्तबीज का खून पीया था और राक्षसों की सेना को सीधे निगल गई थीं लेकिन ऐसा करना युद्धकाल की आवश्यकता थी. रक्तबीज खून के हर बूँद के भूमि पर गिरने से एक रक्तबीज पैदा हो जा रहा था. इसी प्रकार चंड-मुंड के संहार के समय उन्होंने रथ-हाथी-घोड़े और युद्धास्त्रों सहित सीधे-सीधे पूरी सेना को ही निगल लिया था लेकिन वह तो उनकी लीला थी. इसका मतलब यह नहीं कि हम उनको निर्दोष और मजबूर जानवरों की बलि देने लगें. माता ने राक्षसों का संहार किया था न कि निरीह और निर्दोष जानवरों का. इसी पुस्तक के अनुसार महिषासुर-वध से पहले उन्होंने मधुपान किया था जिससे उनके नेत्र लाल हो गए थे. हो सकता है कि यहाँ लेखक ने मदिरा को मधु कहा हो. मगर युद्ध की स्थिति विशेष होती है सामान्य नहीं. कई बार अग्रिम पर्वतीय मोर्चे पर तैनात सैनिकों को भारत सरकार स्वयं शराब उपलब्ध करवाती है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि सैनिक शराबी हो जाएँ और रिटायर्मेंट के बाद सामाजिक समस्या बन जाएँ.
मित्रों, अधिकांश इतिहासकारों का मानना है कि पुराणों की रचना गुप्त और परवर्ती गुप्त काल में हुई थी. इतिहास साक्षी है कि यह वही काल था जब बौद्ध और सनातन धर्म पर तांत्रिकों का कब्ज़ा हो चुका था इसलिए हो सकता है कि तांत्रिकों ने जानबूझकर श्री दुर्गा सप्तशती में इस तरह के वर्णन डाल दिए हों जिनमें माता को रक्त-मांसभक्षक और मद्यप बताया गया हो. समयानुसार ईश्वर का रूप कैसे बदलता है इसके बुद्ध के बाद सबसे बड़े प्रमाण हैं श्रीकृष्ण जो महाभारत काल में योगेश्वर होते हैं लेकिन रीतिकाल आते-आते अपने भक्तों द्वारा भोगेश्वर बना दिए जाते हैं.
मित्रों, कहने का तात्पर्य यह कि मां के नाम पर बलि देना, मांस खाना या शराब पीना न केवल गलत है बल्कि अपराध है इसलिए इस पर तुरंत रोक लगनी चाहिए. फिर गीता-प्रेस द्वारा प्रकाशित दुर्गा-सप्तशती में दुर्गा पूजा की जो विधि बताई गयी है उसमें तो कहीं भी इन राक्षसी या तांत्रिक विधियों की चर्चा नहीं है. यानि जब माँ को सात्विक विधि से भी प्रसन्न किया जा सकता है तो फिर राक्षसी कर्म करने की आवश्यकता ही क्या है?
मित्रों, माता क्या सिर्फ मानवों की माता हैं? क्या वो अन्य प्राणियों की माता नहीं हैं? या फिर अन्य प्राणियों में प्राणरूप में माता की मौजूदगी नहीं है? दुर्गा-सप्तशती तो कहती है कि देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोखिलस्य। प्रसीद विश्वेश्वरी पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य।। (अध्याय ११-३) सम्पूर्ण जगत की माता प्रसन्न होओ. विश्वेश्वरी विश्व की रक्षा करो. देवी तुम्ही चराचर जगत की अधीश्वरी हो. विद्याः समस्तास्तव देवी भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगस्तु. त्वयैकया पूरितम्बयैतत का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः. (अध्याय ११-६) देवी, सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरुप हैं. जगत में जितनी स्त्रियाँ हैं वे सब तुम्हारी ही मूर्तियां हैं. जगदम्ब एकमात्र तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है. तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? आदि-आदि.
मित्रों, मेरे कहने का मतलब यह है कि जिसको मांस-मदिरा का भक्षण करना है करें (यद्यपि मानव शरीर इसके हिसाब से नहीं बनाया गया है) लेकिन इसमें परम करुणामयी और परमपवित्र माता का नाम न घसीटें-खस्सी मार घरबैया खाए हत्या लेले पाहुन जाए क्यों? मेरी माँ तो करुणा की महासागर हैं, निरंतर अहैतुकी कृपा बरसाने वाली हैं वे कैसे किसी मूक-मजबूर का रक्तपान कर प्रसन्न हो सकती हैं? हाँ मेरी माँ दुष्टों का संहार करनेवाली जरूर हैं और तदनुसार दुष्टता का भी इसलिए माँ के साथ माँ का नाम लेकर कृपया छल करने की सोंचिएगा भी नहीं.
मित्रों, इसी प्रकार कई स्थानों पर दुर्गा पूजा के नाम पर किशोरियों को पुजारियों के साथ अधनंगे रखे जाने की परंपरा है. इस तरह की देवदासी प्रकार की हरेक लोकनिन्दित परंपरा भी तत्काल बंद होनी चाहिए क्योंकि स्वयं दुर्गा सप्तशती कहती है कि प्रत्येक स्त्री स्वयं दुर्गास्वरूप है इसलिए स्त्री की गरिमा और सम्मान के साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ करना सीधे-सीधे स्वयं दुर्गा माता की गरिमा और सम्मान के साथ खिलवाड़ करना होगा.