गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

राक्षस धर्म और संस्कृति

मित्रों,हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं कि लम्बे समय तक धरती पर देवों और दानवों में युद्ध होता रहा. दानवों यानि राक्षसों की अपनी संस्कृति थी.वे परपीड़क थे और परपीड़कता ही उनका धर्म था.वे सर्वभक्षी थे यहाँ तक कि नरभक्षी भी थे.वे दुनिया पर जबरदस्ती अपनी संस्कृति थोपना चाहते थे.वैदिक यज्ञों और पूजा-पाठ में बाधा डालते थे और ऋषि-मुनियों की हत्या कर देते थे.परस्त्रियों को अपहृत कर जबरन उनको अपनी पत्नी बना लेते थे.हरिभक्तों को जेलों में बंद कर असीम यातनाएं देते थे.यहाँ तक कि हिरन्यकश्यप ने अपने हरिभक्त बेटे को भी मारने की कोशिश की.हिरन्यकश्यप ने घोषणा कर दी कि वही भगवान है इसलिए केवल उसकी ही पूजा की जाए.अन्य देवी-देवताओं को पूजनेवाले कठोर दंड के भागी होंगे क्योंकि ऐसा करना उसकी नजर में पापकर्म होगा.
मित्रों,वेद-पुराण बताते हैं कि फिर कई उतार-चढाव के बाद अंत में राक्षसों की हार होती है और देव-संस्कृति की स्थापना होती है.हम यह नहीं कहते कि ऐसा होते ही अचानक हमारा सनातन धर्म पूरी तरह से अवगुणरहित हो गया.लेकिन सत्य यह भी है कि हमने बदलते समय के साथ खुद को बदला है.हमने खुले दिल से माना कि हममें कमियां हैं और उनको दूर भी किया और आज भी कर रहे हैं.हमने ऐसा कभी नहीं कहा कि हम तो सिर्फ वही मानेंगे या करेंगे जो इस आसमानी पुस्तक-विशेष में लिखा हुआ है.बल्कि इसके उलट हमने कहा कि एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति और कहा ब्रह्मास्मि तत त्वमसि.उसी तरह ऋग्वेद से लेकर पुरानों और स्मृतियों तक में विभिन्न पशु-पक्षियों को पूज्य कहा गया है.और चूंकि हम मानते हैं कि हर जीव में ईश्वर का वास है या हर जीव ईश्वर का अंश है इसलिए जीवहत्या को भयंकर पाप भी मानते है.हालांकि आज भी कुछ हिन्दू पशुओं की बलि देते हैं लेकिन यह गलत है.हमारा कोई भी शास्त्र इसकी अनुमति नहीं देता और तामसी भोजन को हर दृष्टिकोण से त्याज्य माना जाता है.
मित्रों,यह हमारा दुर्भाग्य है कि समकालीन विश्व में कई ऐसे संप्रदाय मौजूद हैं जिनमें वेद-पुरानों में वर्णित राक्षस-संस्कृति के लक्षण आसानी से देखे जा सकते हैं.वे कुछ भी भक्षण कर जाते हैं.हालाँकि उनमें से ज्यादातर इंसानों पर अत्याचार नहीं करते और अपनी ही दुनिया में मगन रहते हैं.परन्तु एक पंथ ऐसा भी है जिनके चलते पूरी दुनिया में अशांति है और फिर भी वे अपने कथित धर्म को शांति का धर्म बताते हैं.कुरान पढने के बाद मेरी समझ में जो आया है वो यह है कि मोहम्मद साहब मुसलमानों के आपसी झगड़ों से काफी परेशान थे.इसलिए उन्होंने आतंरिक शांति के लिए नए नियमों की घोषणा की और पंथ का नाम इस्लाम यानि शांति रखा.इसका यह मतलब कतई नहीं है कि उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा कि दूसरे पंथों का आदर करो और सबके साथ मिलजुलकर रहो.(९.५ फिर जब हराम महीने बीत जाएँ तो बहुदेववादियों की हत्या करो जहाँ पाओ,९.१४ उनसे युद्ध करो अल्लाह तुम्हारे हाथों उनको दंड देगा.४.८९ तुम उनमें से किसी को भी मित्र या सहायक न बनाओ,जहाँ कहीं उनको पाओ उनकी हत्या करो) बल्कि कहा कि उनके अनुसार ईश्वर अतिकठोर ह्रदयवाला है और जो लोग कुरान में विश्वास नहीं रखते या कुरान में दिए गए आदेशों को नहीं मानते उनको खुद या अपने बन्दों के माध्यम से दण्डित करता है.(४७.४ तो अवज्ञाकारियों से तुम्हारी मुठभेड़ हो तो उनकी गर्दन पर मारो.८.४८ मैं अल्लाह से डरता हूँ और अल्लाह कठोर दंड देनेवाला है. ८.५० और यदि तुम देखते जबकि फ़रिश्ते अवज्ञाकारियों के प्राण निकालते हैं,मारते हुए उनके चेहरों और उनकी पीठों पर और यह कहते हुए कि अब जलने की यातना चखो). अल्लाह इतना क्रूर है कि निरीह पशुओं पर भी कृपा नहीं करता.(८.२२ निश्चय ही उसके निकट सबसे बुरे पशु हैं और जो बहरे,गूंगे हैं और बुद्धि से काम नहीं लेते.२.६७ जब मूसा ने अपनी कौम से कहा कि अल्लाह तुमको आदेश देता है कि तुम गाय जबह करो) और हम हिन्दू हैं कि हजार साल से उम्मीद लगाए बैठे हैं कि एक दिन मुसलमान हमारी भावनाओं का आदर करते हुए गाए-बैल खाना बंद कर देंगे.अगर वे ऐसा करेंगे तो कुरान की अवमानना के दोषी नहीं हो जाएंगे और इसके लिए उनका शक्तिशाली और कठोर अल्लाह उनको नरक की आग में नहीं जलाएगा? पता नहीं वह नरक कहाँ है? (5.3 तुम्हारे लिए अवैध किया गया मुर्दा और खून और सूअर का मांस बाँकी सारे पशु-पक्षी-जलजीव तुम्हारे लिए सूथर और हलाल हैं).
मित्रों,कुरान को पढ़कर हमने जाना है कि इस्लाम धर्म नहीं है, सेना है; लुटेरों की सेना जिसको कथित अवज्ञाकारियों से लड़ने के लिए हमेशा तत्पर रहना है (८.६०).तभी तो आठवें अध्याय में विस्तार से अनफ़ाल यानि युद्ध में लूट के माल के बंटवारे की विस्तार से चर्चा की गयी है.(८.४१ और जान लो कि जो कुछ माल-गनीमत तुम्हे प्राप्त हुआ है उसका ५वां भाग अल्लाह और उसके संदेष्टा के लिए है.
६१.११ ऐ ईमानवालों तुम अल्लाह के मार्ग में अपनी संपत्ति और अपनी जान से युद्ध करो).जीत गए तो अल्लाह की जीत और हार गए तो अल्लाह की ईच्छा.जीवित रहते हुए शराब नहीं पीओ लेकिन मरने के बाद तुमको स्वर्ग में शराब की नदियाँ अता की जाएंगी (३७.४५). इसी तरह स्त्रियों को पुरुषों की खेती कहा गया है और विस्तार से निकाह,तलाक और हलाला की चर्चा की गयी है.रक्तसम्बंधियों से विवाह को मान्यता दी गयी है और मेहर अदा करने को कहा गया है जो एक तरह से औरतों की कीमत है.
मित्रों,यहूदी धर्म और ईसाई धर्म भी तो इस्लाम की तरह यहूदी धर्म से ही निकले हैं फिर वे क्यों मेलमिलाप और प्रेम की बात करते हैं.कुरान में कहीं भी प्रेम का जिक्र तक क्यों नहीं है?उत्तर पाने के लिए हमें रामकृष्ण परमहंस के जाना होगा. भक्तप्रवर रामकृष्ण परमहंस ने कहा है कि हम जैसे देवता या भगवान को पूजते हैं खुद भी वैसे ही हो जाते हैं या फिर हम जैसे होते हैं हमारा आराध्य भी वैसा ही होता है.मोहम्मद साहब ने जो व्यवस्था दी वह तत्कालीन अरब की परिस्थितियों के अनुरूप थी.उन्होंने जो देखा,सुना और भोगा वैसा ही अल्लाह गढ़ लिया.कोइ भी किताब आसमानी नहीं हो सकती.कुरान की सीमा और कमियां अल्लाह की सीमा या कमी नहीं है बल्कि मोहम्मद साहब की सीमा या कमी है.अगर कुरान आसमानी होती तो अल्लाह को पता होता कि धरती गोल है न कि चटाई की तरह चपटी,आसमान शून्य है और उसमें कोइ सतह नहीं है,पहाड़ लम्बी भूगर्भीय प्रक्रिया से बने हैं और पूरी दुनिया २ या ४ दिन में नहीं बनी है.कुरान अगर अल्लाहरचित होता तो अल्लाह को पता होता कि आत्मा क्या है और चन्द्रमा का आकार कैसे बढ़ता-घटता है.ग्रहण क्यों लगता है और सूरज धरती का चक्कर नहीं लगाता बल्कि धरती सूरज के चक्कर लगाती है.
मित्रों,मैंने आलेख के शुरू में राक्षसी संस्कृति का जिक्र किया था.क्या इस्लाम और राक्षसी संस्कृति में अद्भुत  समानता नहीं है? सवाल उठता है कि क्या इस्लाम को बदला जा सकता है? स्वयं कुरान की मानें तो कदापि नहीं (१०.३७).मगर सवाल उठता है कि लम्बे संघर्ष के बाद इसाई धर्म में बदलाव आ सकता है तो इस्लाम में सुधार क्यों नहीं हो सकता?क्या कारन है कि तुर्की,ईराक,सीरिया,ईरान,अफगानिस्तान,लेबनान,मालदीव आदि देशों में या तो कट्टरपंथी इस्लामिक क्रांति या तो घटित हो चुकी या अभी प्रक्रिया में है?पूरी दुनिया जबकि आगे जा रही है तो मुसलमान पीछे क्यों जा रहे?आखिर १४०० साल पहले दी गयी व्यवस्था को आज कैसे लागू किया जा सकता है?परिवर्तन तो संसार का नियम है फिर इस्लाम को क्यों नहीं बदलना चाहिए?क्या इसी तरह से धरती अल्लाह के नाम पर निर्दोष इंसानों और पशुओं के खून से लाल होती रहेगी और काल्पनिक स्वर्ग के लिए वास्तविक स्वर्ग धरती को नरक बना दिया जाएगा.क्या इसी तरह स्त्रियों को हलाला जैसी वेश्यावृत्ति और पर्दा प्रथा को भोगते रहना पड़ेगा.सवाल यह भी उठता है कि जिस तरह का व्यवहार मुसलमान अन्य धर्मावलम्बियों के साथ अपने अल्लाह के नाम पर सीरिया और इराक सहित पूरी दुनिया में कर रहे हैं अगर हम भी उनके साथ अपने भगवान के नाम पर वैसा ही करें तो क्या उनको पसंद आएगा? 

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

कल्पवृक्ष हैं नरेन्द्र मोदी

मित्रों,आपको याद होगा कि पिछली केंद्र सरकार के समय देश की स्थिति कैसी थी. भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद जिस तरह से पाकपरस्त बयान दे रहे थे उससे कई बार संदेह होता था कि वे भारत के विदेश मंत्री हैं या पाकिस्तान के. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भारत के प्रधानमंत्री को गंवार झगडालू महिला का ख़िताब अता फरमा रहे थे. तब हमें २४ फरवरी २०११ को अपने ब्लॉग ब्रज की दुनिया पर महाकवि गोपाल सिंह नेपाली की लम्बी कविता ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से के माध्यम से याद दिलाते हुए लिखना पड़ा था कि
ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से
चरखा चलता है हाथों से,शासन चलता तलवार से
यह रामकृष्ण की जन्मभूमि,पावन धरती सीताओं की  
फिर कमी रही कब भारत में,सभ्यता-शांति सद्भावों की
पर नए पडोसी कुछ ऐसे,पागल हो रहे सिवाने पर
इस पार चराते गौएँ हम,गोली चलती उस पार से
ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से ..............
मित्रों,तब सीआरपीएफ के जवानों को कांग्रेस-अब्दुल्ला की साझा सरकार ने कश्मीर में निहत्थी ड्यूटी करने के लिए बाध्य किया था. जब १३ मार्च,२०१३ को हमारे ५ सीआरपीएफ जवानों को आतंकियों ने मार डाला था तब हमें क्रोधित स्वर में अपने उसी ब्लॉग पर लिखना पड़ा  था कि आज खुश तो बहुत होंगे उमर अब्दुल्ला. क्या आपने कहीं सुना है कि सेना बिना हथियार के लडती है?
मित्रों,इसी प्रकार से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने  १५ अगस्त,२००४ को लाल किले के प्राचीर से अपना पहला भाषण देते हुए घोषणा की थी कि 'देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों' का है और हिन्दुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की गहरी साजिश के संकेत दिए थे. फिर जब तक उनकी सरकार दिल्ली में रही हिन्दुओं के खिलाफ लगातार साजिश रचती रही. मानों उनके और देश के सबसे बड़े दुश्मन पाकिस्तान और चीन नहीं हों हिन्दू हों. यहाँ तक कि पूरी दुनिया को काल्पनिक जन्नत की चाह में जहन्नुम बना देनेवाले जेहादी आतंकवाद के जवाब में हिन्दू आतंकवाद की कल्पना तक कर ली गयी और नए हिन्दू-विरोधी दंगा कानून को प्रस्तावित किया गया. तब हमें  10 फ़रवरी 2011 को अपने आलेख क्या भारत में हिन्दू होना अपराध नहीं है? और  6 अप्रैल 2014 को अल्पसंख्यकवाद,आरक्षण और छद्म धर्मनिरपेक्षता के माध्यम से कड़ा प्रतिकार करना पड़ा था.
मित्रों,जब २जी घोटाला हुआ और ए. राजा घोटालेबाजों के राजा बन गए थे तब हमें बाध्य होकर 13 नवंबर 2010 को लिखना पड़ा था कि राजा तुम कब जाओगे.
मित्रों,कुल मिलाकर जब भारत की आत्मा आहत थी, हिन्दू मन हताश था, योजना आयोग ऑंखें बंद कर रेवड़ी बाँट रहा था, घोटालों की लाईन लगा दी गयी थी और तर्क दिया जा रहा था कि ये घोटाले देशहित में किए जा रहे हैं (सोमवार, 27 अगस्त 2012 देशहित में किए जा रहे हैं घोटाले), कानून के राज के प्रति विश्वास क्षीण हो रहा था, भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा न्यूनतम विन्दु पर थी, राजनैतिक दल चंदे का हिसाब देने से कतरा रहे थे, वेश्यावृत्ति और समलैंगिकता को कानूनी मान्यता देने की तैयारी हो रही थी, सीबीआई सरकारी तोता बनकर रह गयी थी, मुंबई, हैदराबाद, बंगलौर में रोजाना आतंकी हमले हो रहे थे, रोज कोई-न-कोई नौसैनिक जहाज और पनडुब्बी डूब रहे थे, अन्ना और केजरीवाल से जनता का मोहभंग होने लगा था ऐसे अति निराशाजनक माहौल में २० दिसंबर,२०१२ को गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के साथ ही केंद्रीय राजनीति में उदय हुआ नरेन्द्र मोदी का. उस दिन उनको सुना तो लगा जैसे सिंह गर्जना कर रहा हो. हमने उसी दिन उनका राजतिलक करते हुए आलेख लिखा कि नरेन्द्र मोदी भारत के अगले प्रधानमंत्री होंगे. फिर आया २७ अक्तूबर,२०१३ का दिन. पटना के गाँधी मैदान में बम धमाकों के बीच मोदी जी में भाषण दिया. ८ बम फटे, ५ लोग मारे गए लेकिन न तो जनता विचलित हुई और न ही नरेन्द्र मोदी का विश्वास डगमगाया. (ब्रज की दुनिया, रविवार, 27 अक्तूबर 2013,धमाकों के बीज गूंजी शेर की दहाड़ ). फिर आया १६ मई,२०१४ नए सूरज के साथ. भारत में रक्तहीन क्रांति घटित हो चुकी थी. तब हमने एक भारतीय आत्मा के उछाहों को स्वर देते हुए लिखा कि छोडो कल की बातें कल की बात पुरानी.
मित्रों,नई सरकार ने ताबड़तोड़ फैसले लेते हुए कैबिनेट की पहली बैठक में कालाधन के खिलाफ एसआईटी का गठन किया.भूमि अधिग्रहण अध्यादेश जैसे उसके कुछ फैसले गलत भी साबित हुए और उसको यूटर्न भी लेना पड़ा लेकिन सरकार की नीयत में खोट नहीं थी. जब मोदी जी ने देश की सक्षम जनता से गरीब परिवारों के पक्ष में रसोई गैस की सब्सिडी त्यागने की अपील की तब कई लोगों ने कहा कि जब लोकसभा कैंटीन की सब्सिडी बंद होगी तभी वे ऐसा करेंगे और मोदी जी ने कहा तथास्तु. लोकसभा कैंटीन की सब्सिडी समाप्त कर दी गयी. इसी तरह हमने ७ अप्रैल,२०११ को एक आलेख कैसे बांधे बिल्ली खुद अपने ही गले में घंटी के माध्यम से और बाद में भी कई आलेखों के द्वारा मांग की कि राजनैतिक दलों को भी चंदे का ब्यौरा देना चाहिए. हमने शनिवार, 4 फ़रवरी 2017 को शुभस्य शीघ्रम मोदी जीआलेख द्वारा सवाल उठाया कि जब सामान्य लेन-देन को कैशलेस किया जा रहा है तो राजनैतिक दलों को मिलनेवाले चंदे को क्यों नहीं कैशलेस कर दिया जाए और मोदी जी ने कहा तथास्तु. पहले हम अपने गाँव में बिजली नहीं होने की समस्या उठाते थे (सोमवार, 17 फ़रवरी 2014, एक गांव सुशासन ने जिसकी रोशनी छीन ली) मोदी जी ने एक बारगी भारत के सभी बिजलीविहीन गांवों को बिजलीयुक्त कर दिया. आज भारत चीन सहित पूरी दुनिया के सामने गर्व से सिर उठाकर न सिर्फ खड़ा है बल्कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता पाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. देश और विदेश-स्थित कालेधन के खिलाफ जंग छेड़ दी गयी है. वन रैंक वन पेंशन लागू कर दिया गया है, रेल विकास प्राधिकरण प्रणाली को स्वीकृति दे दी गयी है, बुलेट ट्रेन का सपना सच होने जा रहे है, पुलिस को जवाबदेह बनाने के लिए विधेयक आने जा रहा है, न्यायपालिका, पुलिस और जेल को नई तकनीक द्वारा जोड़ा जा रहा है, अवैध गोवधशालाओं को बंद करवाया जा रहा है, मनचलों पर कार्रवाई हो रही है, शशिकला जेल में है, हमारी सेना का मनोबल आठवें आसमान पर है, पूँजी निवेश में भारत नंबर एक बन चुका है,मेक ईन इंडिया द्वारा भारत को सोने की चिड़िया के बजाए सोने का शेर बनाया जा रहा है, कभी चुनाव नहीं लड़नेवाले राजनैतिक दलों की मान्यता समाप्त कर दी गयी है. हालाँकि अभी भी गायों के नर शिशुओं के रक्षण, कृषि, गंगा, रोजगार-सृजन, शिक्षा, मनमोहन,सोनिया,लालू,मुलायम,मायावती को जेल, मंत्रिमंडल पुनर्गठन, राजनैतिक दलों के लिए आय के साथ-साथ व्यय की जानकारी देना अनिवार्य करना आदि ऐसे कई क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें मोदी जी से तथास्तु कहवाना बांकी है. हमारे साथ-साथ आप भी विश्वास रखिए कि एक-न-एक दिन ऐसा जरूर होगा क्योंकि मोदी सरकार में देर है लेकिन अंधेर नहीं है.

गुरुवार, 30 मार्च 2017

बुझी हुई मोमबत्ती के मोम हैं नीतीश


मित्रों,कुछ दिन पहले आए सीएजी की रिपोर्ट ने बिहार में मुख्यमंत्री के सात निश्चय योजना पर सवाल खड़ा किया है. बिहार विधान सभा के पटल पर रखे गये इस रिपोर्ट में कई वित्तीय अनियमितताओं के साथ ये खुलासा किया गया है कि 2015-16 के बजट की लगभग 35 प्रतिशत राशि बिहार में खर्च ही नहीं की गयी.
मित्रों,सीएम नीतीश कुमार के सात निश्चयों में से एक निश्चय हर घर जल का नल योजना का सीएजी के एक वर्ष का सर्वे कराया जिसमें पाया गया कि योजना के एक वर्ष बीत जाने के बाद भी कार्य प्रारंभ भी नहीं कराया जा सका है. महालेखा परीक्षक धर्मेन्द्र कुमार ने सीएजी रिपोर्ट को लेकर पत्रकारों को संबोधित किया. 
रिपोर्ट के कुछ मुख्य तथ्यों पर एक नजर ड़ालते हैं ....
1. बिहार राज्य जल विद्युत् निगम लिमिटेड के वित्तीय कुप्रबंधन के कारण 2011 -16 के बीच 147.66 करोड़ की हानि.
2.साउथ बिहार पॉवर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी की त्रुटिपूर्ण आतंरिक नियंत्रण प्रणाली की वजह से 3.20 करोड़ के राजस्व की हानि.
3.नार्थ बिहार पॉवर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी द्वारा उपभोक्ताओं के अनुचित वर्गीकरण के कारण 5.55 करोड़ के राजस्व की हानि.
4.बिहार राज्य पथ विकास निगम ने अनुबंध के प्रावधानों का उल्लंघन कर संवेदकों को छूट देने से 1.66 करोड़ राजस्व की हानि
5. पटना में वाहन प्रदूषण में भारी वृद्धि. पटना विश्व का छठा सबसे प्रदूषित शहर.
6. पाइप जलापूर्ति योजना बिहार में बुरी तरह फेल. राज्य के केवल 6 प्रतिशत जनसंख्या को ही पाइप जलापूर्ति उपलब्ध.
7. मध्याह्न भोजन योजना की बड़ी विफलता उजागर 33 से 57 प्रतिशत नामांकित बच्चे मध्याह्न भोजन से वंचित रहे.
8. बिहार सरकार के कार्यालयों के व्यक्तिगत जमा खातो में 4126.37 करोड़ की राशि पड़ी रही.
सीएजी की रिपोर्ट की एक जो अहम बात है वो ये है कि 2015- 16 के बजट का लगभग 35 प्रतिशत राशि सरकार खर्च करने में नाकाम रही है. बजट का 35 हजार 13 करोड रुपया खर्च ही नहीं हुआ है जबकि 25 हजार करोड रुपया सरेंडर हुआ है. 
मित्रों,जब २०१५ में महागठबंधन सरकार के गठन के बाद राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ७ निश्चयों की घोषणा की थी तब हमने अपने ब्लॉग ब्रज की दुनिया पर उनको चुनौती देते हुए कहा था कि नीतीश सिर्फ एक निश्चय हर घर नल का जल को पूरा करके दिखा दें. ऐसा हमने इसलिए कहा था क्योंकि हमें पता था कि न तो नीतीश और न ही उनकी सरकार के पास वो कुव्वत है कि वे इस एक निश्चय को भी पूरा कर सकें बाँकी की तो बात ही छोडिये.
मित्रों,हमने तब यह भी कहा था कि २००५ से २०१३ तक बिहार में काम सिर्फ उन्हीं विभागों में हुआ है जिनकी बागडोर भाजपा के पास थी. जदयू नेताओं की बात कि राजद और कांग्रेस के मंत्रियों के ठीक से काम नहीं करने के चलते ७ निश्चयों का कबाड़ा हुआ है अगर हम मान भी लें तो जो विभाग जदयू के पास हैं उनमें चार चांद क्यों नहीं लग गए? क्यों दिनदहाड़े श्रीनूज एंड कंपनी से रंगदारी मांगकर उसे बंद करवाने वाले बिहार के श्रम मंत्री जेल से बाहर हैं और मंत्रिमंडल से बाहर नहीं हैं? क्या नीतीश कुमार बिहार के गृह मंत्री नहीं हैं? क्या मुख्यमंत्री का पद भी राजद के पास है?
मित्रों,आपको याद होगा कि नीतीश पहले जनता दरबार लगाया करते थे. बाद में इसे बंद कर दिया गया और दिनांक 05 जून 2016 से बिहार लोक शिकायत  निवारण अधिकार अधिनियम लागू किया गया.
इसके लिए एक वेबसाईट बनाया गया जिस पर कोई भी परिवाद दर्ज करवा सकता है. परिवाद दर्ज करने से पहले आपसे आपका मोबाईल नंबर माँगा जाता है OTP भेजने के लिए मगर OTP भेजा ही नहीं जाता. मतलब कि पहले जनता दरबार द्वारा और अब जनशिकायत अधिनियम के माध्यम से बिहार की जनता की आँखों में धूल झोंका जा रहा है.
मित्रों,कारण चाहे राष्ट्रपति चुनाव हो या कुछ और नीतीश को एनडीए में लाना है तो लाया जाए लेकिन उनको बिहार का मुख्यमंत्री हरगिज न बनाए रखा जाए. किसी नए ऊर्जावान-स्वप्नदर्शी और उद्दाम देशभक्त को बिहार का सीएम बनाया जाए. पिछले ५-सात सालों में यह साबित हो चुका है कि नीतीश आग नहीं हैं बुझी हुई राख हैं, अँधेरे घर की रौशनी नहीं हैं बल्कि बुझी हुई मोमबत्ती के मोम हैं, वे अच्छा रायता बना नहीं सकते सिर्फ फैला सकते हैं. उनके लिए कुर्सी नाम परमेश्वर (राम) है राज्य या देश के विकास से उनका कुछ भी लेना-देना नहीं है. वे कभी भी फिर से भाजपा को धोखा दे सकते हैं क्योंकि वे नफादार हैं वफादार नहीं, चोखेलाल नहीं धोखेलाल हैं, सेवालाल नहीं मेवालाल हैं, सच्चा नहीं बच्चा यादव हैं, जयप्रकाश नारायण नहीं विजय प्रकाश यादव हैं, बिहार के लाल नहीं लालकेश्वर हैं, बिहार के माथे पर गौरव की बिंदी नहीं बिंदी यादव हैं, हर स्थिति में अटल रहने वाले रॉकी पर्वत नहीं बल्कि रॉकी यादव हैं, बिहार की शान नहीं झूठ,फरेब और ढोंग की खान हैं, चन्दन-वृक्ष नहीं विषबेल हैं जो सहारा देनेवाले वृक्ष को ही ठूंठ बना देता है.

सोमवार, 27 मार्च 2017

मोदी मोदी योगी योगी

मित्रों,पता नहीं किन परिस्थितियों में अतिस्पष्टवादी योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाए गए. जितने मुंह उतनी कहानियां. लेकिन अन्दरखाने चाहे जो कुछ भी हुआ हो परिणाम बहुत अच्छा हुआ. यह उन लोगों के मुंह पर करारा तमाचा है जो अब तक ऐसा मानते थे कि नरेन्द्र मोदी अपने समक्ष किसी और को उभरने नहीं देना चाहते. हालाँकि मोदी मंत्रिमंडल में आज भी परिवर्तन वांछनीय है क्योंकि अभी भी उसमें कई अपात्र-कुपात्र बने हुए हैं. माना कि कप्तान हरफनमौला है लेकिन कम-से-कम फील्डिंग के लिए और बैटिंग-बौलिंग में साथ देने के लिए तो अच्छी टीम चाहिए ही. जिस तरह से मनोहर पर्रीकर को वापस गोवा भेजना पड़ा है उससे यह तो साबित हो ही गया है कि एक अकेले नेता के नाम पर भारत के सभी २८ राज्यों और २ केन्द्रशासित प्रदेशों में चुनाव नहीं जीते जा सकते.दिल्ली में मनोज तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखना भी समझ से परे है.
मित्रों,योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने के बाद पहली बार ऐसा लग रहा है कि किसी राज्य की गाड़ी में जब दो-दो शक्तिशाली ईंजन लग जाते हैं तो क्या होता है. योगी जी हर गेंद पर छक्का मार रहे हैं मानो वे पहले ओवर में ही मैच समाप्त कर देना चाहते हैं. यह सही है कि गाय हिन्दुओं के लिए पूज्या है लेकिन गाय सहित सभी जानवरों को मारने के बारे में कई साल पहले ही एनजीटी दिशा-निर्देश जारी कर चुकी है. यह अलग बात है कि अखिलेश सरकार ने उन्हें लागू तो नहीं ही करवाया बल्कि मूक पशुओं के प्रति पशुता को और बढ़ावा दिया. जहाँ तक एंटी रोमियो स्क्वायड के गठन का सवाल है तो ऐसा यूपी सरकार को तभी करना चाहिए था जब मुलायम सिंह बच्चों से गलती हो जाने की वकालत कर रहे थे. स्वच्छता में तो हर युग में ईश्वर का वास रहा है फिर चाहे वो गाँधी युग हो या आज का समय.
मित्रों,योगी के यूपी के सीएम बनने के बाद से कुछ लोगों को ऐसा लगने लगा है कि अब लोकप्रियता में योगी जी मोदी जी से आगे निकल जाएँगे. हो भी सकता है लेकिन इससे नए भारत के निर्माण और भारत के वैश्विक-उभार पर कोई फर्क नहीं पड़नेवाला है क्योंकि दोनों ही देश और देशहित के प्रति समान रूप से समर्पित हैं. दोनों ही संन्यासी हैं और दोनों के पास ही खोने के लिए अपना कुछ भी नहीं है.

रविवार, 12 मार्च 2017

यूपी की जीत के सबक

मित्रों,बहुत पुरानी कहावत है कि जो जीता वही सिकंदर.

अर्थात सफलता सारे अवगुणों को छिपा देती है.यह कहावत अपनी जगह सही है लेकिन एक और कहावत है जिसे हम सीख का नाम भी दे सकते हैं कि फूलो मत भूलो मत. मतलब कि सुख में फूलो मत और दुःख के दिनों को भूलो मत.वैसे बुद्धिमान लोग जीत से भी सबक लेते हैं और मूर्ख हार से भी नहीं लेते.
मित्रों,हम जानते हैं कि अभी भारतीय जनता पार्टी फूले नहीं समा रही है.उसने उत्तर प्रदेश में अद्भूत, अविश्वसनीय, अभूतपूर्व और अकल्पनीय जीत दर्ज की है.भविष्य में कोई दल या गठबंधन यूपी में ऐसी जीत दर्ज कराएगा या नहीं यह तो भविष्य में ही पता चलेगा लेकिन भूतकाल में तो निश्चित रूप से ऐसा नहीं हुआ था.दुनिया के अधिकतर देशों से ज्यादा जनसंख्या को धारण करनेवाले उत्तर प्रदेश में बहुमत प्राप्त करना ही बड़ी उपलब्धि होती है फिर इस तरह की एकतरफ़ा जीत!!!निश्चित रूप से भाजपा बधाई की पात्र है.जीत का जश्न मनाने में कुछ भी गलत नहीं लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ४ अन्य राज्यों में भी चुनाव हुए थे और उनमें से २ में भाजपा सत्ता में थी.उनमें से एक पंजाब में पार्टी की करारी हार भी हुई है.गोवा में भी पार्टी हारी है फिर भी ईज्ज़त बचा ले गयी है.इन पाँचों राज्यों के चुनाव-परिणामों का अगर हम विश्लेषण करें तो आसानी से देख सकते हैं कि इन राज्यों में कहीं-न-कहीं सत्ता-विरोधी लहर चल रही थी और इसलिए चल रही थी क्योंकि जनता से किए गए वादों में से शतांश को भी पूरा नहीं किया गया था.
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि इन चुनावों से सबक लेते हुए भाजपा को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड समेत उन सभी राज्यों में वादों पर खरा उतरना पड़ेगा जहाँ उसकी पहले से सरकार है या अब जहाँ बनने जा रही है.यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार खुद शराब बेचने की फ़िराक में है जबकि उसके १3 सालों के शासन के बावजूद राज्य के एक बड़े हिस्से पर नक्सलियों का आतंक कायम है.कल एक तरफ भाजपा जीत के जश्न मना रही थी तो वहीं दूसरी ओर कल ही भाजपा-शासित छत्तीसगढ़ में हमारे १७ जवानों को मौत के घाट उतार दिया गया.
मित्रों,राजनैतिक दांव-पेंच अपनी जगह हैं और उनका भी अपना महत्व है लेकिन देशहित सर्वोपरि है.सौभाग्यवश मोदी जी ने नेशन फर्स्ट को अपना ध्येय वाक्य घोषित भी कर रखा है.भ्रष्टाचार की समाप्ति की दिशा में जब मोदी सरकार को नोटबंदी जैसा छोटा कदम उठाने पर इतना विराट जनसमर्थन मिल सकता है तो सोंचिए कि तब क्या होगा जब सरकार बड़े कदम उठाएगी.
मित्रों,तुलसी बाबा कहते हैं कि प्रभुता पाई कोऊ मद नाहीं.अभी तक जिस तरह मोदी सरकार काम कर रही है उससे ऐसा तो लगता नहीं कि उसमें सत्ता का मद घर कर पाया है.फिर अभी तो भारत-निर्माण शुरू ही हुआ है.अभी देश और सरकार को बहुत-बहुत-बहुत लम्बा रास्ता इस दिशा में तय करना बांकी है.काम बहुत कठिन है और समय बहुत कम क्योंकि ६७ साल के मोदी जी अनंतकाल तक न तो जवान ही रहनेवाले हैं और न ही जीवित.जनता के धैर्य का तो कहना ही क्या? निस्संदेह रफ़्तार बढ़ानी होगी.

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

लोकतंत्र की विडंबना हैं बिहार-उत्तर प्रदेश

मित्रों,इन दिनों उत्तर प्रदेश में चुनावी मौसम चल रहा है और कांग्रेस,सपा और आधुनिक मुद्राराक्षस पीके की तरफ से फिर से बिहार को दोहराने का प्रयास चल रहा है.कांग्रेस एक बार फिर से अपनी बर्बादी की कीमत पर प्रधानमंत्री को नीचा दिखाना चाहती है.आजकल कांग्रेस की बस इतनी ही रणनीति और ध्येय रह गया है.यह कांग्रेस न तो नेहरूवाली है और न ही इंदिरा-राजीव या नरसिंह राव वाली बल्कि यह इटलीवाली है जो जब १० साल तक सत्ता में थी तब भी देश को सिर्फ नुकसान पहुँचा रही थी और जब अब विपक्ष में है तब भी नुकसान पहुँचा रही है.वास्तविकता तो यह है कि यह सोनिया वाली इटालियन कांग्रेस भारतविरोधी ताकतों के हाथों का मोहरा बनकर रह गयी है.
मित्रों,आज एक समय में विश्व इतिहास और गणतंत्र का पालना रहे बिहार और उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र की क्या हालत है?कल जब बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की पुण्यतिथि पर पुष्पांजलि अर्पित कर रहे थे तब एक युवक जो पटना जिले का ही रहनेवाला था उनसे मिलने की कोशिश कर रहा था.बेचारे की बहन की ईज़्ज़त को दबंगों ने तार-तार कर दिया था और पुलिस केस दर्ज करने के लिए पैसे मांग रही थी.एक भाई जिसकी ज़िन्दगी को एक गाली बना दिया गया हो उसको मुकदमा दर्ज तक करवाने के लिए मुख्यमंत्री के यहाँ फरियाद लगानी पड़े इससे बड़ी विडंबना उस लोकतंत्र के लिए और क्या हो सकती है जिसको किताबों में जनता का,जनता द्वारा और जनता के लिए शासन बताया जाता है.
मित्रों,उत्तर प्रदेश की स्थिति तो और भी विचित्र है.वहाँ तो बलात्कार को मामूली ग़लती माना जाता है और ऐसी ग़लती मंत्री भी करते रहते है.हास्यस्पद तो यह है कि मंत्री का नाम प्रजापति है यानी प्रजा के रक्षक. वहाँ तो मंत्री के ऊपर केस दर्ज करवाने के लिए पीडिता को सर्वोच्च न्यायालय जाना पड़ता है.जाहिर है कि इन दिनों उत्तर प्रदेश में गुण्डों का,गुण्डों द्वारा और गुण्डों के लिए शासन है.
 मित्रों,पता नहीं आज कर्पूरी या लोहिया जीवित होते तो क्या प्रतिक्रिया करते लेकिन इतना तो तय है कि इस समय जो शासन बिहार और उत्तर प्रदेश में है वो किसी भी दृष्टि से लोकतंत्र नहीं है.बिहार में भ्रष्टतंत्र है और उत्तर प्रदेश में गुंडातंत्र.बिहार के लोग तो गलती कर चुके हैं मगर क्या उत्तर प्रदेश के लोग भी वही गलती करने की गलती करेंगे? इसी तरह से बिहार में भी बिहारी और बाहरी का वितण्डावाद खड़ा किया गया था लेकिन आज आम बिहारी कहाँ है और उसकी ईज़्ज़त कहाँ है?थाने के बाहर उसको नंगा करके खड़ा कर दिया गया है कथित सू शासन की उपलब्धि के रूप में. शायद अगली बार सुप्रीम कोर्ट में जाने के बाद भी कार्रवाई तो दूर एफआईआर तक दर्ज न हो.

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

पहले बीएसईबी, अब बीएसएससी, नेक्स्ट?



मित्रों,कई साल पहले २०११ की बात है.तब हमें बिहार सचिवालय सहायक परीक्षा जो बीएसएससी लेती थी देने बेगुसराय जाना था.एक दिन पहले ही हम बेगुसराय पहुँच गए.परीक्षा अच्छी जानी थी सो गयी.आखिर हम आईएएस के साक्षात्कार तक फेस किए अभ्यर्थी थे.उधर से वापस हाजीपुर आने में हमारी हालत ख़राब हो गयी.ट्रेन में इतनी भीड़ कि पेशाब करने तक जाना मुश्किल ही नहीं असंभव जैसा था.किसी तरह से हम हाजीपुर पहुंचे.
मित्रों,परीक्षा के कुछ ही दिन बाद हमारा एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से मिलने जाना हुआ.हमने जब उनसे बताया कि हमने ये परीक्षा दी है जो काफी अच्छी भी गयी है तो उन्होंने सीधे-सीधे कहा कि आप कतई पास नहीं होने जा रहे हैं क्योंकि सारी सीटें बेचीं जा चुकी हैं.जब रिजल्ट आया तो उनका कहा सच साबित हुआ.मैं क्या करता?हाथ में कलम थी मन में गुस्सा सो बिहार कर्मचारी आयोग है या बिहार कुर्मी चयन आयोग शीर्षक से एक आलेख ब्रज की दुनिया पर लिख डाला.
मित्रों,जाहिर था कि आयोग में सारा खेल सीएम की मर्जी से खेला जा रहा था इसलिए कोई प्रभाव नहीं हुआ.लेकिन वो कहते हैं न कि पाप का घड़ा एक-न-एक दिन भर जाता है सो एक दिन इंटर आर्ट्स की बिहार टॉपर का मामला मीडिया के सामने आ गया और सामने आ गयी सुशासन की मखमली कालीन के नीचे छिपी हुई सड़ांध.जाँच की आंच बोर्ड के अध्यक्ष लालकेश्वर तक पहुँच गयी और पता चला कि नीतीश के लाल सह दलाल लालकेश्वर के सर पर स्वयं सुशासन बाबू का हाथ था.धीरे-धीरे घोटाले में जेल गए सारे लोग सरकार की मिलीभगत से बाहर भी आने लगे हैं.लालकेश्वर भी आ जाएँगे और मीडिया चीखती-चिल्लाती रह जाएगी.
मित्रों,बीएसईबी के बाद पाप का घड़ा भरा बीएसएससी का.इंटरस्तरीय परीक्षा से पहले ही उत्तर सोशल मीडिया पर वाईरल हो गया.इस बार भी सचिव तक घोटाले के तार पहुँच चुके हैं और श्रीमान जेल भेजे जा चुके हैं लेकिन सवाल उठता है कि हर डाल पर उल्लुओं को बिठाया किसने है?पूर्व मुख्यमंत्री मांझीजी कई बार कह चुके हैं कि बिहार में धडल्ले से अध्यक्ष और सचिव की कुर्सियां बेचीं जाती हैं.कहते हैं कि अगलगी में कुत्ते नहीं जलते ठीक उसी तरह जब कोइ घोटाला उजागर होता है तो अध्यक्ष या सचिव को कुछ दिनों के लिए पकड कर अन्दर कर दिया जाता है और सुशासन बाबू का बाल भी बांका नहीं होता. पता नहीं अगली बार किस विभाग के पाप का घड़ा भरकर फूटनेवाला है? जस्ट वेट एंड वाच.

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

शुभस्य शीघ्रम मोदी जी.


मित्रों,दूरदर्शी सरकार का दूरंदेशी बजट आ चुका है.बजट में एक तर खेती-किसानी को फिर से लाभकारी व्यवसाय बनाने पर जोर दिया गया है तो वहीँ दूसरी ओर देश की आधारभूत संरचना के विकास के साथ-साथ रोजगार-सृजन पर भी पर्याप्त बल दिया गया है.लेकिन अगर आम बजट की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है तो वो एक खास प्रावधान के लिए जो इस सरकार को निश्चित रूप से पूर्ववर्ती सरकारों से अलग करता है और वह प्रावधान यह है कि अब देश के राजनैतिक दलों को २००० रु. से ज्यादा चंदा लेने पर उसका हिसाब देना होगा.यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूं कि अब तक यह सीमा २०००० रु. की थी और हमारे देश में राजनैतिक दलों को मिलनेवाले चंदे में से ८५ प्रतिशत २०००० रु. से कम होते हैं.यहाँ मैं आपको यह भी बता दूं कि बहुजन समाज पार्टी तो शत-प्रतिशत चंदा २०००० रु. से कम की राशि में प्राप्त करती है अर्थात हिसाब देने की जरुरत ही नहीं.
मित्रों,लेकिन सवाल उठता है कि राजनैतिक दलों को २००० रु. तक का चंदा नकद में और बिना हिसाब-किताब के लेने की छूट दी ही क्यों जाए जबकि सरकार पूरे आर्थिक कारोबार को यथासंभव कैशलेस बनाना चाहती है?रास्ता बतानेवाले को आगे तो चलना पड़ेगा.भ्रष्टाचार की गंगा को अगर सुखाना है तो पहले गंगोत्री को भ्रष्टाचारविहीन करना होगा और वह गंगोत्री हैं राजनैतिक दल.पहले ही केंद्र सरकार की सिफारिश पर चुनाव आयोग ऐसे सैंकड़ों पंजीकृत राजनैतिक दलों की मान्यता रद्द कर चुका है जिन्होंने कभी चुनाव ही नहीं लड़ा और जिनका धंधा ही चंदा लेकर कालेधन को सफ़ेद बनाना था.
मित्रों,अगर दिल पर हाथ रखकर कहें तो आज से चार-पांच साल पहले हम भ्रष्टाचार को लेकर पूरी तरह से निराश हो चुके थे और ऐसा मानने लगे थे कि चंदा प्राप्त करने के मामले में सारे राजनैतिक दल एक-से हैं.हमने मान लिया था कि इस मामले में कभी पारदर्शिता आ ही नहीं सकती क्योंकि ऐसा भी कहीं होता है कि बिल्ली खुद ही अपने गले में घंटी बांध ले.लेकिन सौभाग्यवश वर्तमान केंद्र सरकार ने इस दिशा में प्रचलित मान्यता को विखंडित करने का साहस किया है.लेकिन क्या २०००० की सीमा को २००० में बदल देना काफी होगा?क्या ऐसा कर देने से सारी पार्टियाँ ईमानदार हो जाएंगी? नहीं ऐसा लगता तो नहीं है.फिर क्यों नहीं राजनैतिक दलों के चंदों को पूरी तरह से कैशलेस कर दिया जाए?सौभाग्यवश कमोबेश बांकी के सारे दल भी इस मामले में सरकार का समर्थन कर रहे हैं.तो फिर देरी किस बात की है?शुभस्य शीघ्रम.पता नहीं फिर ऐसा अवसर आए न आए.
मित्रों,इतना ही नहीं सरकार को चाहिए कि राजनैतिक दलों के लिए न सिर्फ आय का शत-प्रतिशत ब्यौरा देना अनिवार्य कर दे बल्कि व्यय का हिसाब देना भी जरूरी कर दिया जाए.जनता को पता तो चले कि राजनैतिक दल चंदे में प्राप्त भारी-भरकम राशि का करते क्या हैं.