रविवार, 28 अगस्त 2016

कृपया धीरे चलें,भ्रष्टाचार प्रगति पर है

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आपने जहाँ कहीं भी सड़क-पुल-नाली का काम चल रहा होगा कृपया धीरे चलें,कार्य प्रगति पर है लिखा हुआ बोर्ड जरूर देखा होगा। आपने कभी सोंचा है कि जहाँ पर ये सुनहरे अक्षर लिखे होते हैं क्या वहाँ सचमुच कार्य प्रगति पर होता है या कार्य ही प्रगति पर होता है?
मित्रों,हाजीपुर को ही लीजिए। यहाँ की गलियों में पिछले तीन-चार सालों से नाली-निर्माण का कार्य चल रहा था। तब जगह-जगह आपको ये शब्द पढ़ने को मिल जाते। लेकिन अब न तो नालियों का कहीं अता-पता है और न ही इन अतिप्रचलित शब्दों का। 80 करोड़ की नाली-निर्माण योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है। इसी बीच नगर-परिषद में नए चेयरमैन का आगमन हुआ। कुछ दिनों तक अखबारों में मोटे-मोटे अक्षरों में छपा कि नगर पार्षदों की बैठक में ठेकेदार कंपनी को डाँट सुनाई गई और चेतावनी के साथ काम जल्द-से-जल्द पूरा करने को कहा गया लेकिन जैसा कि शुरू से ही सरसरी निगाह से देखने से ही पता चल रहा था कि यह नाली कतई सफल नहीं होनेवाली है और नाली निर्माण के नाम पर पैसे नाली में बहाए जा रहे हैं आज कहीं भी पूरे हाजीपुर में उक्त निर्माण कंपनी द्वारा बनाई गई नालियों का कहीं नामो-निशान तक नहीं है।
मित्रों,इसी तरह से हाजीपुर में इन दिनों उसी तरह से लगातार सड़क बनते रहते हैं जैसे कि भारत की राजधानी दिल्ली में बनते रहते हैं। अंतर बस इतना है कि दिल्ली में दुरूस्त सड़कों को फिर से दुरूस्त किया जाता है जबकि हाजीपुर की सड़कें चूँकि पानी में घुलनशील होती हैं इसलिए हर साल बरसात के बाद विलुप्त हो जाती हैं। फिर से टेंडर,फिर से निर्माण और फिर से तख्ते पर वही ईबारत।
मित्रों,सवाल उठता है कि आखिर कब तक हम यूँ ही धीरे चलते रहेंगे प्रगति की प्रतीक्षा में? कब वास्तव में हमारा देश-प्रदेश प्रगति पर होगा? नहीं समझे क्या? मित्र,वास्तव में जब कार्य प्रगति पर होता है तो कार्य प्रगति पर होता ही नहीं है बल्कि भ्रष्टाचार प्रगति पर होता है। एक उदाहरण और ले लीजिए। अभी वैशाली जिले में बाढ़ आई हुई है। जिले के देसरी प्रखंड के भिखनपुरा पंचायत में राखी के आसपास की रात में बांध में रिसाव होने लगा। शायद चूहों की कारस्तानी थी। रात में कोई कहाँ जाता सरकार को ढूंढ़ने सो गाँव के लोगों ने खुद ही रातभर जगकर मिट्टी भर दिया। दिन निकलने के बाद गंडक प्रोजेक्ट के जूनियर इंजीनियर आए 80 हजार रुपये लेकर और अपने एक चहेते दलाल को बाँटने के लिए देकर चले गए। दलाल तो ठहरा दलाल और फिर पैसे के भी तो पाँव होते हैं सो पैसे लेकर रफूचक्कर हो गया। हालाँकि वहाँ किसी ने इस बात का बोर्ड नहीं लगाया था कि कार्य प्रगति पर है लेकिन फिर भी भ्रष्टाचार प्रगति पर था।
मित्रों,हमारे देश में हम जगे रहें या सोये,दिन हो या रात। हर समय भ्रष्टाचार प्रगति पर होता है क्योंकि हर समय कहीं-न-कहीं रोड-पुल-नाली-बांध-स्कूल-अन्य सरकारी भवन आदि बनता रहता है। वैसे भ्रष्टाचार तो हमारे भारत के नस-नस में है लेकिन पैसों का गबन यदि किसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा होता है तो वो है यही आधारभूत संरचना का क्षेत्र। आपके राज्य में क्या हालत है पता नहीं लेकिन हमारे बिहार में तो इस क्षेत्र में सालोंभर मार्च लूट मची रहती है। कहने को तो बिहार में हर साल मई-जून तक भारी मात्रा में सड़कें-पुल बनाकर राज्य की जीडीपी में भारी वृद्धि कर दी जाती है। दावे किए जाते हैं कि बिहार प्रदेश नंबर वन बन गया है लेकिन जुलाई-अगस्त में वह जीडीपी बरसात के पानी में बह जाती है।
मित्रों,मेरी चुनौती है कि सब्सिडी-नरेगा-इंदिरा आवास का पैसा सीधे लाभान्वितों के खाते में डाल कर मोदी सरकार ने इन क्षेत्रों में तो भ्रष्टाचार को रोक दिया लेकिन अगर वो आधारभूत संरचना में लूट को रोक सके तो जानें। वैसे भी रोड-पुल-नाली-बांध-स्कूल-अन्य सरकारी भवनों का निर्माण राज्यों के अधिकार-क्षेत्र में आते हैं। वैसे जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है वहाँ की वास्तविकता भी यही है कि भाजपा-शासित अधिकतर राज्यों में भ्रष्टाचार ही प्रगति पर है। हाँ,केद्र सरकार द्वारा हो रहे निर्माण-कार्यों में स्थिति जरूर अपेक्षाकृत अच्छी है।

सोमवार, 22 अगस्त 2016

कानून का डंडा या डंडे का कानून?

मित्रों,आपने रॉलेट एक्ट का नाम जरूर सुना होगा। 1919 ई. में ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट कमेटी की रिपोर्ट को क़ानून का रूप दे दिया। इस विधेयक में सरकार को राजनीतिक दृष्टि से संदेहास्पद व्यक्तियों को बिना वारंट के बन्दी बनाने, देश से निष्कासित करने, प्रेस पर नियन्त्रण रखने तथा राजनीतिक अपराधियों के विवादों की सुनवाई हेतु बिना जूरी के विशेष न्यायालयों को स्थापित करने का अधिकार प्रदान किया गया था। केन्द्रीय विधान परिषद के सभी सदस्यों द्वारा विरोध करने के बावजूद अंग्रेज़ सरकार ने रॉलेट एक्ट पारित कर दिया। इस अधिनियम से सरकार वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार को स्थगित कर सकती थी। वैयक्तिक स्वतंत्रता का अधिकार ब्रिटेन में नागरिक अधिकारों का मूलभूत आधार था। रॉलेट एक्ट एक झंझावत की तरह आया। युद्ध के दौरान भारतीय लोगों को जनतंत्र के विस्तार का सपना दिखाया गया था। उन्हें ब्रिटिश सरकार का यह क़दम एक क्रूर मज़ाक सा लगा।
मित्रों,पिछले दिनों भारत में दो ऐसे कानून आए हैं जिनकी तुलना बेझिझक रॉलेट एक्ट से की जा सकती है हालाँकि ये कानून बनाए हैं भारतीयों द्वारा निर्वाचित लोगों की व्यवस्थापिका ने। पहला कानून है निर्भया कानून जिसमें प्रावधान किया गया है कि अगर कोई पुरूष किसी महिला को 14 सेकेंड से ज्यादा एकटक देखता है उसको इसके लिए दंडित किया जा सकता है। कितना बड़ा मजाक और हास्यास्पद है ऐसा प्रावधान करना!
मित्रों,ठीक इसी तरह बिना खोपड़ी का इस्तेमाल किए बिहार की विधायिका ने कुछ ही दिनों पहले शराबबंदी से संबंधित एक अधिनियम को पारित किया है। इसके अनुसार अगर आपके घर में शराब की बोतल मिलती है तो आपके परिवार के सभी बालिग सदस्यों को जेल भेज दिया जाएगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस अतार्तिक प्रावधान के पहले शिकार बने हैं पूर्णिया के वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार। किसी ने शरारतपूर्ण तरीके से उनके घर में शराब की बोतल रख दी और पुलिस को खबर कर दिया। बेचारे हाथ-पाँव जोड़ते रहे लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई जैसा कि रॉलेट एक्ट में होता था। क्या अजब कानून बनाया है बिहार विधानमंडल ने कि पीते हुए पकड़े जाओ तो सपरिवार जेल जाओ और पीकर मर जाओ तो परिजनों को पैसे मिलेंगे। आप सभी जानते हैं कि मैंने कभी कोई नशा नहीं किया लेकिन आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर कल मुझे भी मेरे घर से शराब बरामद करवाकर सपरिवार जेल भेज दिया जाए।
मित्रों,सवाल उठता है कि क्या हमारे माननीय कानून बनाते समय होश में नहीं रहते हैं? क्या कानून के डंडे के बल पर लोकरूचि और लोकव्यवहार को जबर्दस्ती बदला जा सकता है? सवाल उठता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में कानून का डंडा चलेगा या डंडे का कानून?

क्या इस तरह आएंगे खेलों में भारत के अच्छे दिन?

मित्रों,पता नहीं आपकी नजर में अच्छे दिनों की क्या परिभाषा है? मैं यह भी नहीं जानता कि वर्तमान केंद्र सरकार की अच्छे दिनों की परिभाषा क्या है लेकिन मैं इतना जरूर जानता हूँ कि जब तक सुखद परिणाम नंगी आँखों से दृष्टिगोचर न होने लगे हम यह नहीं कह सकते कि अच्छे दिन आ गए हैं। दुर्भाग्यवश कई क्षेत्रों में जिनमें से खेल भी एक है संघ सरकार ने अब तक ऐसी कोई पहल ही नहीं की है जिससे कि हम सीना ठोंककर कह सकें कि भले ही वर्तमान परिदृश्य निराशाजनक हो भविष्य उज्ज्वल होने जा रहा है।
मित्रों,मुझे तो तभी रियो ओलंपिक में भारत के घटिया प्रदर्शन का आभास हो गया था जब नरसिंह यादव प्रकरण सामने आया। आश्चर्य है कि जिस खिलाड़ी से देश को सबसे ज्यादा उम्मीद थी उसी के खिलाफ देश में ही,प्रशिक्षण केंद्र में ही साजिश रच दी गई। सरकार को चाहिए कि वो पता लगाए कि नरसिंह यादव के भोजन में प्रतिबंधित दवा मिलाने के पीछे किन-किन बड़े-छोटे लोगों का हाथ था और उनको दंडित करे। और न केवल दंडित करे बल्कि उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाए।
मित्रों,मैं पहले भी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से निवेदन कर चुका हूँ कि सरकार चलाना वन मैन वर्क नहीं है बल्कि टीम वर्क है। फिर भी वे न जाने क्यों हमारी बातें सुन ही नहीं रहे हैं। उन्होंने न जाने क्या सोंचकर अपने मंत्रिमंडल में ऐसे नमूनों को थोक में इकट्ठा कर रखा है जो मंत्री तो क्या संतरी बनने के लायक भी नहीं हैं। अब अपने खेल मंत्री विजय गोयल जी को ही ले लीजिए। श्रीमान् का विवादों से जन्मजात का नाता रहा है। श्रीमान् 40 अधिकारियों की भारी-भरकम टीम लेकर रियो पहुँचे थे। क्या अंतर है सुरेश कलमाडी और विजय गोयल में? कलमाडी भी चमचों के काफिले के साथ जाते थे गोयल भी गए। उस पर तुर्रा यह कि गोयल साब ने वहाँ भी आयोजकों से झगड़ा कर विवाद खड़ा कर दिया ठीक उसी तरह से जैसे कुछ साल पहले शाहरूख खान ने आईपीएल में किया था। श्रीमान् जी खिलाड़ियों का हौंसला बढ़ाने गए थे कि आयोजकों पर अपना रोबदाब दिखाने? आश्चर्य तो इस बात का भी है कि श्रीमान् जी को विश्वप्रसिद्ध भारतीय खिलाड़ियों के नाम भी पता नहीं हैं। शायद उनके लिए खिलाड़ी उसी तरह से सब्जेक्ट मात्र हैं जिस तरह से मुन्ना भाई एमबीबीएस में डॉक्टरों और प्रोफेसरों के लिए मरीज थे। तो क्या गोयल सचमुच करेंगे खेलों में भारत की कायापलट?
मित्रों,मुझे कभी-कभी लगता है कि मोदी सरकार भी वोटबैंक की सस्ती व टुच्ची राजनीति पर उतर आई है। एक मंत्री इस जाति से ले लिया तो एक उससे। वो भी बिना यह देखे कि व्यक्ति मंत्री पद के योग्य है या नहीं। बिना विचार किए कि मंत्री स्थिति को बिगाड़ेगा या संवारेगा। मोदी जी को भले ही भ्रम हो लेकिन मुझे तो कभी इस बात को लेकर भ्रम नहीं रहा कि श्रीमान् विजय गोयल जी खेलमंत्री बनने लायक बिल्कुल भी नहीं हैं।
मित्रों,भारत का खेल मंत्री तो ऐसा होना चाहिए जो पारंपरिक तरीके से सोंचे ही नहीं। खिलाड़ियों को चयनित कर तैयार करने का काम चीन-रूस-अमेरिका की तरह बचपन में ही शुरू हो जाना चाहिए। खिलाड़ियों को हर कदम पर पर्याप्त सरकारी सहायता और सहयोग मिलना चाहिए। जिस दिन हमें यह सुनने को नहीं मिलेगा कि कोई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी ठेला खींच रहा है या कुली का काम कर रहा है उसी दिन हम समझेंगे कि भारत में खेलों के अच्छे दिन आ गए हैं। तब भारत का नाम पदक तालिका में खुर्दबीन लेकर खोजना नहीं पड़ेगा बल्कि दूर से ही सबसे ऊपर दिखाई देगा। इसके लिए पर्याप्त धन खर्च करना पड़ेगा और सही तरीके से व सही जगह पर खर्च करना पड़ेगा। सरकारें जितनी रकम जीतने के बाद खिलाड़ियों को देती हैं उतनी पहले खर्च कर दे तो स्वर्ण पदक क्या खिलाड़ी सोने की खान ले आएंगे। परंपरागत सोंच वाले किसी विजय गोयल से यह काम एक तो क्या सात जन्मों में भी नहीं होने वाला।
मित्रों,मैं समझता हूँ कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को वोटबैंक की राजनीति का पूरी तरह से परित्याग कर अमेरिका की तरह सिर्फ विभिन्न क्षेत्रों के योग्य लोगों को मंत्री बनाना चाहिए। और न केवल बनाना चाहिए बल्कि उनको काम करने की छूट भी देनी चाहिए। मगध में भले ही विचारों की कमी थी वर्तमान भारत में न तो विचारों की कमी है न ही विचारकों की। विश्व के सबसे महान लोकतंत्र अमेरिका की तरह सोंचने से ही भारत अमेरिका की तरह बन पाएगा और सचमुच में सवा सौ करोड़ भारतीयों और भारत के अच्छे दिन आएंगे। न केवल खेल में बल्कि प्रत्येक क्षेत्र में।  अब केवल अपने मन की बात करने से काम नहीं चलेगा श्रीमान् प्रधानमंत्री जी बल्कि आपको जनता के मन की बात भी सुननी होगी। अभी नहीं सुनिएगा तो 2019 में तो सुनिएगा ही। तब तो सुनना पड़ेगा ही। जनता अंधी नहीं है कि आपकी आकाशवाणी पर कही गई बात को सचमुच की आकाशवाणी मान लेगी और मान लेगी कि ओलंपिक में भले ही देश ने पिछली बार से खराब प्रदर्शन किया हो भारत के अच्छे दिन आ गए हैं। मान लेगी कि रोजगार,शिक्षा,सार्वजनिक स्वास्थ्य,कृषि आदि-आदि के क्षेत्र में भले ही स्थिति पहले से और भी ज्यादा खराब हो गई हो लेकिन अच्छे दिन तो आ ही गए हैं। इस तरह से अच्छे दिन उत्तरी कोरिया में आ सकते हैं भारत में तो कदापि नहीं।

बुधवार, 17 अगस्त 2016

सलमान खुर्शीद पाकिस्तान क्यों नहीं चले जाते?

मित्रों,मैंने पहले भी मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता अंधेरे में से संदर्भ लेते हुए कहा है कि रात के अंधेरे में वे चेहरे भी बेनकाब हो गए हैं जो दिन के उजाले में छिपे हुए थे। कुछ ऐसी ही स्थिति इन दिनों देशद्रोहियों की है। मोदी सरकार के आने के बाद से ही उनके खौफनाफ उद्देश्यों और चेहरों का अनावृत्त होना अनवरत जारी है। इनमें से कुछेक को राष्ट्रवादी सरकार के समय देश में असहिष्णुता दिखाई देने लगती है तो कुछेक तो खुलकर हमारे चिरशत्रु पाकिस्तान के पाले में हो लिए हैं। कुछेक ऐसे भी हैं जिनको राक्षसी संस्कृति के उन्नायक आईएसआईएस का परोक्ष समर्थन करते हुए साफ-साफ देखा जा सकता है।
मित्रों,महाभारत में आपने भी पढ़ा होगा कि जब पांडव वनवास पर थे तब उनको नीचा दिखाने के इरादे से दुर्योधन सदल-बल वनभोज के लिए गया और जानबूझकर पांडवों के आवास के आसपास ही शिविर लगाया। इसी दौरान उसका किरातों के साथ झगड़ा हो जाता है और किरात उसे बंदी बना लेते हैं। जब यह सूचना एक सैनिक धर्मराज युधिष्ठिर को देता है तब धर्मराज अपने अनुजद्वय भीम और अर्जुन को आदेश देते हैं कि जाकर दुर्योधन को मुक्त करवाओ। भीम और अर्जुन जब इसका विरोध करते हैं तो धर्मराज कहते हैं कि हमारे बीच जो आपसी विवाद हो लेकिन दुर्योधन हमारे परिवार का हिस्सा है। इसलिए जब भी बाहरी लोगों से संघर्ष की स्थिति बनती है हमें दुर्योधन का साथ देना चाहिए।
मित्रों,हम नहीं समझते कि जो लोग मोदी-विरोध के नाम पर भारत-विरोध पर उतारू हैं और देश के हितों को गंभीर क्षति पहुँचाने का महापाप कर रहे हैं वे महाभारत के इस प्रसंग से सर्वथा अनभिज्ञ होंगे। इसके उलट वे लोग कुछ ज्यादा ही पढ़े-लिखे हैं और उनमें से कई तो विदेशों में पढ़े हैं।
मित्रों,जो पाकिस्तान पत्थर फेंकने के लिए प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति 500 रुपये खर्च कर सकता है वो क्या लगातार आत्मघाती गोल दाग रहे इन महाविद्वान देशद्रोहियों के ऊपर लाखों रुपये खर्च नहीं कर रहा होगा? हम तो सिर्फ इसके बारे में अनुमान ही लगा सकते हैं यद्यपि सुरक्षा व खुफिया एजेंसियाँ चाहें तो जाँच कर सकती हैं और जाँच होनी भी चाहिए,जाँच होनी ही चाहिए। भारत कोई निर्बला-अबला स्त्री नहीं कि कोई भी राहगीर-उठाईगीर-भाड़े का टट्टू छेड़कर चला जाए। नरेंद्र मोदी की सरकार को इन देशद्रोहियों के खिलाफ प्रभावी कदम उठाकर यह साबित कर देना चाहिए उनके सबल-सशक्त नेतृत्व में भारत एक सबल और मजबूत राष्ट्र है जिसको क्षति पहुँचाना तो दूर की रही कोई जयचंद या गोरी उसकी तरफ आँख उठाकर भी नहीं देख सकता।
मित्रों,हमें यह स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं है कि जब गिरिराज सिंह ने कहा था कि जो लोग नरेंद्र मोदी को पसंद नहीं करते उनको स्वयं पाकिस्तान चले जाना चाहिए तो हमें भी नाराजगी हुई थी। लेकिन अब लगता है कि उनका कथन पूरी तरह से तो नहीं लेकिन आंशिक तौर पर सही था। सारे मोदी विरोधियों को तो नहीं सलमान खुर्शीद,मणिशंकर अय्यर जैसे लोगों को जो मोदी-विरोध और भारत-विरोध के बीच का फर्क नहीं जानते-समझते या जानना-समझना नहीं चाहते सचमुच पाकिस्तान चले जाना चाहिए। हिंदुस्तान में रहकर कोई हिंदुस्तान को ही नुकसान पहुँचानेवाली राजनीति करे और मलाई चाभे यह आज के हिंदुस्तानी कदापि सहन नहीं करनेवाले हैं। गया वो जमाना जब हिंदुस्तान में गदहे भी जलेबी खाते थे।

सोमवार, 15 अगस्त 2016

जश्ने आजादी विथ डिफरेंस की शुभकामनाएँ

मित्रों,आज भारत अपना 70वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहा है जबकि कल पाकिस्तान अपना जन्मदिन मना चुका है। एक लंबे समय के बाद भारत में राष्ट्रवादी सरकार सत्ता में है। वैसे तो मोदी सरकार के कार्यकाल में यह तीसरा स्वाधीनता दिवस है लेकिन इस बार यह दिन अलग-सा है। यह जश्ने आजादी विथ डिफरेंस इसलिए नहीं है क्योंकि अभी केंद्र में खुद को पार्टी विथ डिफरेंस कहनेवाली पार्टी की सरकार है बल्कि इस बार सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की फिजाँ बदली-बदली सी है।
मित्रों,शायद यह भारत के इतिहास की पहली जश्ने आजादी है जब पाकिस्तान हम पर हावी नहीं है बल्कि हम उस पर हावी हैं। यह भारत के इतिहास की पहली जश्ने आजादी है जब एकसाथ पाकिस्तान के कई भागों में हिंदुस्तान जिंदाबाद, पाकिस्तान मुर्दाबाद और मोदी-मोदी के नारे लगाए जा रहे हैं। शायद यह हमारी पहली जश्ने आजादी है जब भारत का गृह मंत्री कह रहा है कि हम पाकिस्तान से बातचीत तो करेंगे लेकिन सिर्फ पीओके पर। शायद ऐसा पहली बार हुआ है जब भारत का प्रधानमंत्री कह रहा है कि हम पाकिस्तान से पीओके प्राप्त करेंगे और साथ ही पाकिस्तान को बलुचिस्तान पर भी जवाब देना होगा। शायद ऐसा पहली बार हुआ है जब पाकिस्तान का झंडा लहरानेवालों और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगानेवाले गद्दारों को मस्जिदों में घुस-घुसकर कूटा जा रहा है। शायद भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी भारतीय सरकार की कूटनीति से चीन सकते में है और किंकर्त्तव्यविमूढ़ दिख रहा है। शायद भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब समान नागरिक संहिता को लागू करने की दिशा में केंद्र सरकार ने पहल की है। शायद भारत में ऐसा पहली बार हुआ है जब अरहर की दाल चने की दाल से सस्ती है। शायद भारत में ऐसा पहली बार हुआ है जब पीएम खुलेआम कालाधन रखनेवालों को चेतावनी दे रहा हो। शायद भारत में ऐसा पहली बार हुआ है जब सब्सिडी का पैसा सीधे लाभुकों के खाते में जा रहा है। आज सऊदी अरब भारत के आग्रह को घमंड में आकर अनसुना नहीं करता बल्कि अपने पास से पैसे देकर अन्याय के शिकार भारतीय मजदूरों की मदद करता है। यह भी पहली बार हुआ है जब अमेरिका के राष्ट्रपतीय चुनावों में भारत का प्रधानमंत्री मुद्दा बना हुआ है जबकि एक समय था जब भारत के पीएम के अमेरिका दौरे को अमेरिकी अखबार पहले पृष्ठ पर जगह तक नहीं देते थे। निश्चित रूप से आज भारत इतिहास में पहली बार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और जीडीपी विकास दर में दुनिया का शिरमौर है।
मित्रों,जाहिर है कि मात्र दो सालों में मोदी सरकार ने भारत के मान को वैश्विक स्तर पर नई ऊँचाइयाँ दी है। आज विदेशों को भारतीय होना शर्म का नहीं बल्कि गर्व का विषय है। परन्तु कुछ मामलों में आज भी चिराग तले अंधेरा की स्थिति बनी हुई है। हमारी शिक्षा-व्यवस्था ध्वस्त होकर परीक्षा-व्यवस्था में तब्दील हो चुकी है,स्वास्थ्य-व्यवस्था खुद बीमार है,राजधानी दिल्ली तक में कानून-व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक है,रेलवे पटरी से उतर चुकी है और आज की ट्रेनें कल आ रही हैं,विदेशों से कालाधन वापस लाने की रफ्तार काफी धीमी है,न्याय पाना आज भी दुश्वार है,किसान के हाथ आज भी खाली हैं और वो आज भी आत्महत्या कर रहा है। दुर्भाग्यवश आज भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में ज्यादातर मंत्री नाकारा हैं। जहाँ यूपीए की सरकार का मूल मंत्र दाग अच्छे हैं था वहीं इस सरकार का मूल मंत्र नालायक लायक हैं बन गया है। अच्छा है कि योग्य मगर वयोवृद्ध नेताओं को ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया है लेकिन सवाल उठता है कि आखिर स्मृति ईरानी ने शिक्षा मंत्री के रूप में ऐसे कौन-से झंडे गाड़ दिए कि उनको प्रोन्नति देकर कपड़ा मंत्रालय दे दिया गया? जिन प्रकाश जावड़ेकर को खराब प्रदर्शन के कारण मंत्रिमंडल से हटाने की बात हो रही थी उनको कैसे शिक्षा मंत्री बना दिया गया? कदाचित हमारे प्रधानमंत्री अभी तक यह समझ ही नहीं पाए हैं कि सरकार चलाना टीम वर्क होता है और सिर्फ कप्तान अकेले किसी भी टीम को जीत नहीं दिला सकता। शायद वे अभी तक यह भी नहीं समझ पाए हैं कि जनता की उनसे कितनी अपेक्षाएँ हैं और अगर इसी तरह उनकी सरकार उपर्लिखित विषयों में समय रहते कोई काम नहीं करती है तो फिर अगले चुनावों में जीत के लिए उनको अंतिम गेंद पर छक्का नहीं मारना होगा बल्कि एक ही गेंद पर शतक मारना होगा जो क्रिकेट की दुनिया के साथ-साथ राजनीति की दुनिया में भी कदापि संभव नहीं।

बुधवार, 10 अगस्त 2016

राईटर्स मीट में उपलब्धि-वर्णन कम मजबूरियों का रोना ज्यादा

मित्रों,मेरे लिए वह क्षण घोर आश्चर्य का पल था जब मुझे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन की ओर से आयोजित होनेवाली राईटर्स मीट में भाग लेने के लिए बुलाया गया। मुझे उम्मीद थी कि मीट में भाग लेने के लिए मुझ जैसे अति गरीब को जो अपनी जेब से किसी तरह से इंटरनेट का खर्च उठाकर पिछले 9 सालों से देशहित में लेखन कर रहा है दोनों तरफ का टिकट उपलब्ध कराया जाएगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। फिर भी चूँकि मुझ जैसे अकिंचन को पहली बार इस तरह कार्यक्रम में भाग लेने के लिए बुलाया गया था इसलिए अपने पास से पैसे लगाकर मैंने भाग लेने का फैसला किया।
मित्रों,चूँकि संघीय सरकार ने दो साल पूरे किए थे इसलिए मुझे उम्मीद थी कि जो भी वक्ता आनेवाले हैं वे सरकार की दो सालों की उपलब्धियों का बखान करेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। ज्यादातर वक्ताओं का जोर इस बात पर था कि केंद्र सरकार के हाथ बंधे हुए हैं और शिक्षा,भूमि,पुलिस,स्वास्थ्य जैसी जनकल्याण से जुड़ी सारी चीजें संविधान-निर्माताओं ने राज्य सरकारों के हवाले कर दिया है। लगभग सारे वक्ता ले-देकर जन-धन योजना और डीबीटीएल का ही जिक्र कर रहे थे।
मित्रों,हमने भी भारत का संविधान पढ़ा है,साथ ही भारत का इतिहास भी पढ़ा है और हम पहले से ही जानते हैं कि 1919 के अधिनियम के अनुसार भारत में द्वैध-शासन लागू किया गया था। संविधान-निर्माताओं ने सातवीं अनुसूची में जनकल्याण से संबद्ध लगभग सारे विषयों को फिर से राज्य-सरकार के जिम्मे कर दिया। बाद में जब 1993 में स्थानीय स्वशासन लागू किया गया तब लोककल्याण से संबद्ध कई कामों को स्थानीय निकायों के हवाले कर दिया गया। सवाल उठता है कि जिन राज्यों में भाजपा का सीधा या गठबंधन के अंतर्गत शासन है क्या वहाँ सचमुच में रामराज्य आ गया है? सवाल यह भी उठता है कि क्या केंद्र सरकार राज्य-सूची के विषयों में कोई संशोधन कर ही नहीं सकती है या फिर राज्य-सूची से संबद्ध विषयों पर कोई कानून बना ही नहीं सकती है? सवाल उठता है कि केजरीवाल की तरह रोना रोकर केंद्र सरकार के नीति-नियंताओं को क्या हासिल हो जानेवाला है? आखिर जनता ने उनको रोने के लिए नहीं बल्कि आंसू पोछने के लिए वोट दिया है। नीयत साफ हो,विश्वास में दृढ़ता हो,नीतियों के बारे में स्पष्टता हो तो ऐसी कौन-सी उपलब्धि है जो यह सरकार हासिल नहीं कर सकती?
मित्रों,विवेक ओबेराय जो महान अर्थशास्त्री हैं और नीति आयोग के सदस्य भी हैं का कहना था कि विधि-निर्माण समय बर्बाद करनेवाली प्रक्रिया है। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि विकल्प क्या है? जबकि भारत में विधि का शासन है तो विधि तो बनानी ही पड़ेगी और कोई उपाय है भी तो नहीं। आखिर कब तक अध्यादेश जारी करके काम चलाया जाएगा? संसद के समवेत होने के 6 सप्ताह के भीतर अध्यादेश को संसद से पारित तो करवाना पड़ेगा ही। इस संबंध में श्री ओबेराय ने भू-अर्जन अधिनियम,2013 का विस्तार से जिक्र भी किया।  श्री ओबेराय के अनुसार सरकार के पास सीमित राजकोषीय स्रोत हैं इसलिए जनाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए निजीकरण के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है।
मित्रों,राज्यसभा सदस्य और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री विनय सहस्रबुद्धे का जोर सुशासन की स्थापना पर रहा। उनका मानना था कि सिर्फ कागजों पर शिक्षा,स्वास्थ्य,सूचना आदि का अधिकार दे देने से जनता को कोई लाभ मिलनेवाला नहीं है। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि क्या जनता को जब मुस्कुराने का अधिकार दिया जाएगा तभी वे हँसेंगे? फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री ने समस्या-प्रधान फिल्मों के निर्माण पर जोर दिया। साथ ही मीडिया से छोटे शहरों के गायब होने पर चिंता जताई। उनका मानना था कि अगर भारत को फिर से विश्वगुरू बनाना है कि इसे दुनिया का इनोवेशन हब बनाना होगा। उनका कहना था कि विविधता में एकता का नारा अच्छा तो है लेकिन विविधता से देश के समक्ष कठिनाई भी पैदा होती है।
मित्रों,भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बेलाग तरीके से साफ-साफ कहा कि विचारधारा के बिना राजनीति करना असंभव है। ऐसा होने पर राजनीति की हालत वही होगी जो प्राण के बिना शरीर की होती है। उनका कहना था कि भारत में इस समय चार वैचारिक खेमे हैं-कांग्रेस,जनसंघ,कम्युनिस्ट और समाजवादी। इसी प्रकार भारत में तीन तरह की विचारधाराएँ प्रचलन में हैं-धर्मनिरपेक्ष समाजवादी,राष्ट्रवादी और साम्यवादी। इसमें से समाजवादी विचारधारा अब परिवारवाद में बदल गई है। कांग्रेस की विचारधारा में उसकी स्थापना के समय से ही मिट्टी की सुगंध और भारतीयता का अभाव है। उनका कहना था कि कांग्रेस की सोंच नवनिर्माण की थी। यहाँ तक कि उनलोगों ने संस्कृति के नवनिर्माण की दिशा में भी प्रयास किया। जबकि पूर्ववर्ती जनसंघ और वर्तमान की भाजपा नवनिर्माण में नहीं पुनर्निर्माण में यकीन रखती है। भाजपा एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसने देशहित में आंदोलन किए व्यक्ति-विशेष के महिमामंडन के लिए कोई आंदोलन नहीं किया। उन्होंने कहा कि मोदी या मोदी सरकार देश में परिवर्तन नहीं ला सकती विचारधारा ही परिवर्तन ला सकती है। श्री शाह ने कहा कि केंद्र सरकार पहली बार सजीव जीडीपी के लिए प्रयास कर रही है। हर 15 दिन पर प्रधानमंत्री सरकार के कामकाज की कठोर समीक्षा करते हैं। उन्होंने बताया कि भारत सरकार चाहती है कि 2025 तक भारत की सेना दुनिया की सबसे आधुनिक सेना हो और 21वीं सदी भारत की सदी कहलाये।
मित्रों,वरिष्ठ पत्रकार और भारत सरकार में मंत्री एमजे अकबर ने अपने भाषण में रोटी की समानता पर जोर दिया। उनका कहना था कि भूख की न तो कोई जाति होती है और न ही कोई धर्म ही होता है। उन्होंने कहा कि इस्लाम सांप्रदायिक भाईचारे की बात करता है राष्ट्रवाद की बात नहीं करता। उन्होंने जोर देकर कहा कि जबसे भारत है तबसे भारत में समानता का अधिकार स्वतःस्फूर्त तरीके से प्रचलन में है। उन्होंने कहा कि तकनीक ने आज समय के अर्थ को बदल दिया है। श्री अकबर ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए बताया कि यद्यपि लार्ड कार्नवालिस अमेरिकी संग्राम में हार गया था फिर भी उसको प्रोन्नति देकर भारत भेज दिया गया वो भी यह कहकर कि अमेरिका से मुट्ठीभर कर प्राप्त कर लेने से ब्रिटेन को कुछ ज्यादा हासिल नहीं होनेवाला है जबकि जो भी देश या जाति भारत पर राज करेगी उसका पूरी दुनिया पर शासन होगा। राजीव श्रीनिवासन ने कहा कि चीन एक विकसित राष्ट्र तो है लेकिन आधुनिक राष्ट्र नहीं है क्योंकि वहाँ लोकतंत्र नहीं है। संविधान में सिद्धांतों का वर्णन हो सकता है नीतियों का नहीं। श्री श्रीनिवासन ने यह भी कहा कि दुनिया में तीन तरह की धर्मनिरपेक्षता प्रचलन में है-1.फ्रांस की,2.कम्युनिस्टों की और 3.भारत की। इनमें से सिर्फ भारत की धर्मनिरपेक्षता ही सर्वधर्मसमभाव और सहअस्तित्व की बात करती है। उनका यह भी कहना था कि इस्लाम में धर्मनिरपेक्षता के लिए कोई स्थान नहीं है।
मित्रों,राष्ट्रवादी दलित चिंतक अरविंद नीलकंठन ने उदाहरण देकर अंबेदकर को हिंदू राष्ट्रवादी साबित करने की सफल कोशिश की। उन्होंने बताया कि अंबेदकर की नजर में आर्य जाति नहीं था बल्कि श्रेष्ठता का प्रतीक था। उन्होंने बताया कि अंबेदकर की चिंता भारत में हिंदुओं की रक्षा करने की थी। अंबेदकर मुसलमानों या मुसलमानों की बहुलतावाले किसी भी इलाके को भारत में रखना नहीं चाहते थे क्योंकि वे समझते थे कि इससे भविष्य में हिंदुओं और भारत की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि पंचशील समझौते के समय अंबेदकर ने नेहरू को पत्र लिखा था कि चीन धर्मविरोधी राज्य है इसलिए उसके मन में पंचशील के प्रति आदर हो ही नहीं सकता। श्री अंबेदकर ने समान सिविल संहिता को लागू करने का जमकर समर्थन किया था और स्पष्ट रूप से कहा था कि भारत को अनिवार्य तौर पर एक हिंदू राज्य होना चाहिए। अंबेदकर का साफ तौर पर कहना था कि हिंदू से बौद्ध बनना घर के एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने के समान है वहीं हिंदू से मुसलमान या इसाई बनने की तुलना एक घर से दूसरे घर में जाने से की जा सकती है। श्री नीलकंठन ने कहा कि स्वामी विवेकानंद और अंबेदकर के विचार एक जैसे हैं। अंबेदकर का साफ तौर पर मानना था कि अल्पसंख्यक समुदाय का निर्णय संप्रदाय के आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक रूप से वंचित होने के आधार पर होना चाहिए। कश्मीर के बारे में अंबेदकर ने कहा कि कश्मीर में अपने लोगों की रक्षा की जानी चाहिए। यहाँ अपने लोगों से उनका मतलब हिंदुओं और सिक्खों से था।
मित्रों,अमेरिका से पधारे प्रो. जुलुरी ने क्या कहा यह अंग्रेजी में हाथ तंग होने के चलते मैं समझ ही नहीं पाया। महान लेखक व सांसद स्वप्न दासगुप्ता ने अमर्त्य सेन के इस कथन से कि अकबर भारत का पहला सम्राट था जिसने अल्पसंख्यकों के अधिकारों को मान्यता दी से असहमति जताई और कहा कि प्राचीन युग से ही भारत में अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक जैसी कोई समस्या रही ही नहीं है। बल्कि हमारे यहाँ तो सर्वे भवंतु सुखिनः और तु वसुधैव कुटुंबकम जीवन-पद्धित के हिस्सा रहे हैं। साथ ही हमें यह समझना चाहिए कि हिंदू हमेशा भारत में बहुसंख्यक थे और आज भी बहुसंख्यक हैं। उनका कहना था कि संविधान ही सबकुछ नहीं हो सकता बल्कि भारतीयता संविधान से भी ऊपर है। भारत का संविधान भले ही 26 जनवरी,1950 को लागू हुआ लेकिन भारत की या भारत में प्रजातंत्र की शुरुआत किसी 26 जनवरी या 15 अगस्त से नहीं हुई। बल्कि बहुलवाद और प्रजातंत्र भारत की संस्कृति में समाहित है। मीट के अंतिम वक्ता आरएसएस के सर कार्यवाह कृष्ण गोपाल ने आरएसएस और राष्ट्रवाद की विचारधारा के योगदान और महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि किस प्रकार से आरएसएस के सदस्यों में से कईयों ने देशहित में परिवार तक नहीं बनाया और उनका तर्पण करनेवाला भी कोई नहीं है।
मित्रों,हालाँकि सम्मेलन में भारत-सरकार की उपलब्धियों पर कम ही चर्चा हुई फिर भी मैं यह नहीं कह सकता कि इससे मुझे कोई लाभ नहीं हुआ। मैंने कई नए मुहावरों को सीखा,कई नए तर्कों से वाकिफ हुआ,कई नए विचारों से सन्नद्ध हुआ। फिर भोजन-नाश्ता और चाय का भी उत्तम प्रबंध किया गया था। एक और बात जिसने मुझे खासा परेशान किया वह थी मीट में अमित शाह और कृष्ण गोपाल जी को छोड़कर सारे वक्ताओं ने अंग्रेजी में अपना व्याख्यान दिया। राष्ट्रवादी संगठन होने के चलते कम-से-कम संघ परिवार से जुड़ी संस्था से तो हिंदी की उपेक्षा की उम्मीद नहीं ही की जानी चाहिए।

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

प्रभुजी,हमें रेलवे से बचाओ

मित्रों,अगर मैं यह कहूँ कि भारतीय रेल भारत का प्राण और प्रतीक है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। भारत का कोई ऐसा इंसान नहीं होगा जिसकी यादें रेलवे से जुड़ी हुई नहीं हों। रेलयात्रा का मतलब लोग आमतौर पर सुखद और आरामदेह यात्रा से लगाते हैं। लेकिन जब यही यात्रा हिटलर की यातना-शिविर की तरह दुःखद,थकाऊ और पकाऊ बन जाए तो? जब ट्रेनें जाने का समय पर आने लगे और अगले दिन आने के समय पर जाने लगे तो? जब यात्रियों व यात्रियों के समय का कोई मूल्य ही नहीं रह जाए तो?

मित्रों,इन दिनों  दिल्ली से बिहार आने-जानेवाली ट्रेनों का कुछ ऐसा ही हाल है। मैं पिछले हफ्ते 28 जुलाई को मगध एक्सप्रेस से दिल्ली गया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी फाउंडेशन के राईटर्स मीट @WritersMeet में भाग लेने जो 30-31 जुलाई को दिल्ली में आयोजित थी। ट्रेन पटना जंक्शन से 18:10 में खुलनेवाली थी लेकिन खुली 22:30 में। स्टेशन पर बैठे-2 मैंने देखा कि अपनी रफ्तार के लिए जानी जानेवाली संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस जो सुबह 7 बजे  दिल्ली से पटना जंक्शन आती है रात 8 बजे आई। यहाँ हम आपको बता दें कि यह वही संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस है जो जिसके पटना से दिल्ली के बीच में मात्र 3 स्टॉपेज हैं और जो मात्र 14 घंटे में निर्धारित समय से भी पहले पटना से दिल्ली पहुँचाती थी। तो ऐसा क्या हो गया कि वही ट्रेन अब 12-12 घंटे की देरी से चल रही है? अभी तो ठंड का मौसम भी नहीं है इसलिए कुहासा भी नहीं है फिर दिल्ली से बिहार आने-जानेवाली सारी ट्रेनों की यही दशा क्यूँ है?
मित्रों,फिर मैं खुद को संपूर्ण क्रांति के यात्रियों के मुकाबले ज्यादा खुशनसीब समझते हुए मगध से दिल्ली के लिए रवाना हुआ। लेकिन यह क्या,ट्रेन तो रफ्तार पकड़ ही नहीं रही थी। दस मिनट चलती थी और एक घंटे के लिए रूक जाती थी। अंततः ट्रेन रात के पौने नौ बजे दिल्ली के शिवाजी ब्रिज स्टेशन पर पहुँची। मेरे पास अब इतना धैर्य था नहीं कि मैं उस ट्रेन को और झेलता और उसके नई दिल्ली स्टेशन पहुँचने तक इंतजार करता सो वहीं पर मैंने ट्रेन को छोड़ दिया। यहाँ हम आपको यह बता दें कि ट्रेन को नई दिल्ली दोपहर के 11:50 में ही पहुँचना था। यानि ट्रेन अभी नई दिल्ली आई भी नहीं थी और साढ़े नौ घंटे लेट हो चुकी थी।
मित्रों,परंतु मेरे धैर्य की असली परीक्षा तो अभी बाँकी ही थी। @WritersMeet में भाग लेने के बाद मेरी हाजीपुर वापसी स्वतंत्रता सेनानी सुपर फास्ट एक्सप्रेस से 2 अगस्त को निर्धारित थी। शाम में इंटरनेट से सर्च करने पर पता चला कि ट्रेन रात के 8:30 बजे के बदले 10:30 बजे खुलेगी। परंतु स्टेशन आने पर रेलवे के फ्री वाई फाई के सौजन्य से पता चला कि ट्रेन अब रात के 12:30 जाएगी। कुछ देर के बाद स्टेशन की उद्घोषणा में बताया गया कि ट्रेन अब रात के 1:30 में रवाना होगी। लेकिन 1:30 बजे उद्घोषणा में कहा गया कि यात्रीगण धैर्य रखें ट्रेन शीघ्र प्लेटफार्म संख्या 13 पर लाई जाएगी। ट्रेन आई 2 बजे और सवा दो बजे उसने प्रस्थान किया। एक तो नीम खुद ही कड़वा और ऊपर से करेला। इस ट्रेन ने तो बैलगाड़ी को भी रफ्तार में मात दे दी भले ही उसके नाम में सुपर फास्ट जुड़ा हुआ था। चलती कम रूकती ज्यादा थी। दस मिनट चलती थी और 1 घंटा रूकती थी। यहाँ तक कि उसको रोककर माल गाड़ी और पैसेंजर ट्रेन को भी आगे जाने दिया जा रहा था। उस पर यात्रियों ने ट्रेन के शौचालय को इतना गंदा कर दिया कि साक्षात रौरव नरक का दृश्य उत्पन्न हो गया और सीट पर बैठना-लेटना भी मुश्किल हो गया। उससे भी दुःखद स्थिति यह थी कि हजार किलोमीटर के सफर में एक बार भी शौचालयों को साफ नहीं किया गया। सो रास्ते भर गैस रिलीज करते हुए मैं ठीक से खा-पी भी नहीं पाया। इस डर से कि अगर दीर्घशंका लगेगी तो करूंगा क्या? पहली नजर में मुझे रेलवे की मल-मूत्र शुद्धिकरण की नई व बहुचर्चित प्रणाली भी फेल लगी।
मित्रों,बार-बार मैं एस-थ्री बोगी की 56 नंबर अपर साईड सीट पर चढ़ता और उतरता। आखिर कितना सोता या कितना लेटता? मेरा पूरा शरीर दर्द करने लगा जैसे कि तेज बुखार में होता है। अंतत: ट्रेन 3 तारीख के दोपहर के 14:15 के बजाए 4 तारीख की सुबह के 3:30 बजे हाजीपुर स्टेशन पहुँची।
मित्रों,मैं पहले भी दिल्ली गया हूँ अटल जी और मनमोहन सिंह के राज में लेकिन कभी ट्रेन इतनी लेट नहीं हुई थी। फिर अभी जाड़े का मौसम भी नहीं है। आजकल हर रेल टिकट पर छपा रहता है कि रेलवे आपसे सिर्फ 57 प्रतिशत भाड़ा ही ले रही है। लेकिन हमारे तो बाँकी के 43 प्रतिशत पैसे भी ट्रेन के अतिशय लेट से चलने के कारण रास्ते में खाने-पीने में चले गए। मैं आदरणीय रेल मंत्री सुरेश प्रभुजी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी से अनुरोध करता हूँ कि कृपया रेलवे को यातना-गृह बनने से बचाईए। दिल्ली-यात्रा के बाद मेरी तो हालत यह है कि अब मैं रेलवे से यात्रा करने से पहले लाख बार सोचूंगा। सिर्फ मेरा देश बदल रहा है आगे चल रहा है के शीर्षक वाले गीत गाने से न तो देश बदलेगा और न ही आगे-आगे चलेगा। अगर केंद्र-सरकार को टिकट का बाँकी का 43 प्रतिशत पैसा भी चाहिए तो ले लीजिए लेकिन ट्रेनों का संचालन समय पर करिए। रेलगाड़ी को सही मायने में रेल गाड़ी बनाईए न कि ठेलगाड़ी। तभी देश बदलेगा और आगे भी चलेगा क्योंकि मैं पहले ही अर्ज कर चुका हूँ कि रेलवे भारत का प्राण ही नहीं प्रतीक भी है।

शनिवार, 23 जुलाई 2016

क्या लालूजी बिहार को कश्मीर बनाना चाहते हैं?



मित्रों,हम आपको पहले भी बता चुके हैं हमारा बचपन ननिहाल में बीता है। जाहिर है कि मेरे मामा लोग मुझे चिढ़ाते थे कि तेरा बाप चोर है तो तेरा बाप मोची है आदि। मैं तब अबोध बालक था सो तुरंत पलटकर कह देता कि तेरा बाप भी चोर है या मोची है। मुझे तब पता नहीं था कि उनके पिता मेरे नाना होते हैं। तब का एक और संस्मरण याद आ रहा है। मेरे ननिहाल में एक घर था जिसे हम गिदड़बा अंगना या गीदड़ों का आंगन कहकर बुलाते थे। क्योंकि उस आंगन के एक व्यक्ति पर हाथ डालिए तो पूरा घर एकजुट होकर हुआँ-2 करने लगता था। उस घर की एक लड़की एक दलित के साथ भाग गई। गाँव के लोग उसके दरवाजे पर जमा हो गए। तभी लड़की की बड़ी बहन ने गजरते हुए कहा कि यहाँ कोई तमाशा हो रहा है क्या? मैं नहीं जानती हूँ क्या कि गाँव की कौन-कौन-सी लड़की ने छुप-छुप कर क्या-क्या गुल खिलाए हैं? अब कौन जाता उससे मुँह लगाने सो सारे गाँववाले तितर-बितर हो गए।
मित्रों,हम यह आप पर छोड़ते हैं कि इन दोनों में से आप महान बिहार के महान नेता लालू प्रसाद जी को किस श्रेणी में रखेंगे। बेचारे की अब काफी उम्र हो चुकी है। साठ भी पार कर चुके हैं सो उनको उनकी खुद की परिभाषानुसार यानि कि यादवों को 60 की उम्र में जाकर बुद्धि आती है अबोध तो कतई नहीं कहा जा सकता। तो क्या इसका सीधा मतलब यह नहीं निकालना चाहिए कि लालू जी उस भाग गई लड़की की बड़ी बहन की तरह थेथरई बतिया रहे हैं।
मित्रों,लालू के लाल यही काम तबसे ही कर रहे हैं जबसे बिहार के उपमुख्यमंत्री बने हैं। बिहार में कहीं कोई आपराधिक घटना हुई नहीं,बिहार से किसी घपले-घोटाले-अव्यवस्था की खबर आई नहीं कि तुरंत अपने श्रीमुख से विषवमन करना शुरू कर देते हैं कि ऐसा हमारे यहाँ ही होता है क्या? वहाँ उस राज्य में भी तो हुआ है?मतलब यह कि भला जो देखन मैं चला,भला न दीखा कोय। जो दिल ढूंढ़ा आपना, मुझसा भला न कोय।। अब आप ही बताईए कि फिर किस माई के लाल में दम है कि ऐसे स्वनामधन्य महामूढ़ को उसकी गलती का अहसास दिला दे?
मित्रों,लेकिन हमारे लालू प्रसाद जी ठहरे महातेजस्वी तेजस्वी यादव जी के पिता सो इस मामले में बेटे से पीछे कैसे रह जाते? सो बिहार के सबसे शरीफ नगर बिहार शरीफ में पाकिस्तान झंडा फहराए जाने की घटना सामने आते ही थेथरई के मैदान में नया कीर्तिमान स्थापित कर ही तो दिया। बिहार की तुलना सीधे जन्नत से जहन्नुम बना दिए गए कश्मीर से करते हुए कह ही तो दिया कि इसमें कौन-सी बड़ी बात है ऐसा तो कश्मीर में रोजे होता है। मानो बिहार और कश्मीर दोनों एकसमान हों। मानो कश्मीर की तरह बिहार की भी 70 प्रतिशत आबादी मुस्लिम हो। मानो बिहार में भी पाकिस्तान की शह पर वर्षों से अलगाववादी आतंकवाद चल रहा हो।
मित्रों,यद्यपि हम लालू से नाराज हैं कि पूरी तरह से सक्षम होते हुए भी उन्होंने पाकिस्तान के समर्थन में नारेबाजी या पाकिस्तान का झंडा फहराए जाने की घटना के मामले में बिहार की तुलना पाकिस्तान, फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका, इराक, सीरिया, मिस्र, नाइजीरिया आदि देशों में घटी घटनाओं से क्यों नहीं की। वैसे,हमें लालूजी की महान सूक्ष्मबुद्धि को देखते हुए उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है कि वे भविष्य में किसी-न-किसी प्रसंग में कभी-न-कभी ऐसा जरूर करेंगे। आखिर कब तक बिहार की तुलना देसी राज्यों से होती रहेगी? बिहार की ईज्जत का सवाल है भाई।

सोमवार, 18 जुलाई 2016

बिहार के विकास दर का कड़वा सच

मित्रों,महाभारत की लड़ाई अंतिम खंड में थी। महारथी कर्ण और अर्जुन आमने-सामने थे। तभी अर्जुन ने भयंकर वाणों का प्रयोग कर कर्ण के रथ को कई योजन पीछे पटक दिया। मगर अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण निश्चल बने रहे। जवाब में कर्ण ने भी वाण चलाए और अर्जुन के रथ को कुछेक अंगुल पीछे कर दिया। मगर यह क्या! श्रीकृष्ण कर्ण के इस कृत्य पर बाँसों उछलने लगे और उसकी तारीफ के पुल बांध दिए। अर्जुन हतप्रभ। पूछ ही तो दिया। ऐसा क्यों माधव? श्रीकृष्ण ने कहा कि तुम्हारे रथ की पताका पर रूद्रावतार हनुमान विराजमान हैं और मैं खुद भी तीनों लोकों का भार लेकर बैठा हूँ। फिर भी महावीर कर्ण ने तुम्हारे रथ को कई अंगुल पीछे धकेल दिया।
मित्रों,हमारे महान लालूजी का महान परिवार इन दिनों खासे उत्साह में हैं। वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि गुजरात अर्जुन का रथ है और बिहार कर्ण का। गुजरात पहले ही विकास कर चुका है और संतृप्तावस्था को प्राप्त कर चुका है जबकि बिहार ने अभी  विकास का ककहरा पढ़ना शुरू ही किया है। शून्य के मुकाबले 1 अनन्त गुना होता है जबकि 1 के मुकाबले दो सिर्फ दोगुना। तो क्या शून्य से 1 प्रतिशत पर पहुँचनेवाला राज्य यह कहेगा कि हमने पिछले साल के मुकाबले इस साल अनन्त गुना विकासदर प्राप्त कर लिया है? खैर,5 बार मैट्रिक में फेल लालू और उनके नौवीं फेल बच्चे अगर ऐसा करें भी तो इसमें उनका क्या दोष?
मित्रों,समय और दूरी में आपने पढ़ा होगा कि एक कार इतने किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलना शुरू करती है। इतने घंटे बाद दूसरी कार इतने किमी प्रति घंटे की गति से उसका पीछा करना शुरू करती है तो दूसरी कार पहली कार को कितने घंटे में पकड़ लेगी। गुजरात काफी पहले से विकास के पथ पर सरपट दौड़ रहा है जबकि बिहार ने कथित रूप से अब दौड़ना शुरू किया है। बिहार प्रति व्यक्ति आय में 34 हजार रूपये प्रति वर्ष के साथ अभी भी सबसे पीछे है। अभी तो उसको भारत के सबसे पिछड़े राज्यों को ही पीछे करने में कई दशक लगनेवाले हैं। अभी तो उसको भारत की प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय औसत आय 72889 रूपये तक पहुँचने में ही कई दशक लग जानेवाले हैं फिर देश के अग्रणी राज्यों को पीछे छोड़ने की तो बात ही दूर है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जनसंख्या-घनत्व और जनसंख्या वृद्धि में बिहार देश में सबसे आगे है। इसलिए कुल जीडीपी बढ़ने का यह मतलब कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए कि बिहार की प्रति व्यक्ति आय भी उसी दर से बढ़ रही है।
मित्रों,बिहार प्रति व्यक्ति औसत आय के मामले में तब सबसे पीछे से आगे बढेगा जबकि बिहार सरकार द्वारा तैयार किए गए विकास दर के आंकड़े सही हों। बिहार में धरातल पर जो कुछ घटित हो रहा है उससे तो ऐसा नहीं लगता कि बिहार की जीडीपी इतनी तेज गति से बढ़ रही है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जो लोग बाईक पर भैंस को ढो सकते हैं उनके लिए आंकड़ों में हेरा-फेरी करना कौन-सी बड़ी बात है। यहाँ हम आपको बता दें कि जीडीपी विकास दर के आंकड़े राज्य खुद तैयार करते हैं राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन सिर्फ उन पर मुहर लगाता है।

रविवार, 17 जुलाई 2016

कौन हैं देश के सबसे बड़े दुश्मन,बुरहान या ये सफेदपोश

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,हम वर्षों से कहते आ रहे हैं कि सदियों से भारत के सबसे बड़े दुश्मन मोहम्मद गोरी नहीं रहे हैं बल्कि भारत को हमेशा से सबसे ज्यादा खतरा जयचंदों से था,है और रहेगा। यह हमारा दुर्भाग्य है कि भारत कभी ऐसे जयचंदों से मुक्त नहीं रहा। वरना मरता एक क्रूर आतंकी है और घुटनों तक से आँसू बहने लगते हैं छद्मधर्मनिरपेक्षतावादियों के।
मित्रों,जब सेना या अर्द्धसैनिकों की आतंकी हमले में मौत होती है तब ये महासंवेदनशील लोग कुंभकर्णी निद्रा में निमग्न होते हैं जैसे इन्होंने मान रखा हो कि सेना और अर्द्धसैनिक बलों में तो लोग मरने के लिए ही आते हैं। लेकिन जैसे ही बुरहान जैसा कोई भयंकर दानव मारा जाता है ये अकस्मात् रूदाली बन जाते हैं। कोई बुरहान को हेडमास्टर का बेटा बताती है तो कोई कहता है कि बेचारे ने गरीबी के कारण आतंकवाद का रास्ता चुना होगा। जैसे यह अमीर हेडमास्टर का गरीब बेटा गरीब बच्चों को महान इंसान बनने की तालीम देता हुआ शहीद हो गया। मानो बुरहान मलाला हो गया और भारतीय सेना तालिबान।
मित्रों, जब सैनिक प्राचीन हथियार पत्थर का जवाब प्राचीन हथियार गुलेल से देते हुए घायल हो जाते हैं या मारे जाते हैं तब तो इन महादयालुओं को दया नहीं आती। तब इनको यह दिखाई नहीं देता कि इन्हीं सैनिकों ने बाढ़ के समय अपनी पीठ और कंधों के ऊपर रास्ता देकर इनकी जान बचाई थी। तब इनको यह दिखाई नहीं देता कि सिर्फ 500 रूपये के बदले ये लोग कितनी बड़ी कृतघ्नता कर रहे हैं लेकिन जैसे ही भारतीय सैनिकों के हाथों में गुलेल के बदले छर्रे उगलनेवाली बंदूक पकड़ा दी जाती है ये महापाखंडी जैसे दयासागर बन जाते हैं। इनको यह नहीं दिखता कि छोटे-छोटे बच्चे भी कैसे मृत्योपरांत हूरों से मिलने की बेचैनी में और कुछ सौ रूपयों के लिए उन सैनिकों पर पत्थर फेंक रहे हैं जिन्होंने अपनी पीठों और कंधों पर चढ़ाकर जलप्रलय के समय इनकी जान बचाई थी। हालाँकि महिलाओं को हूरों के बदले सुंदर पुरूषों के मिलने की कोई संभावना नहीं है बावजूद इसके संगसारी में वे भी किसी से पीछे रहना नहीं चाहतीं। उनको भूलना नहीं चाहिए कि यही महिलायें जयप्रलय के समय सैनिकों को दुआयें देते थक नहीं रही थीं। खैर,भूल तो छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी भी गए हैं कि वे हिंदुस्तानी हैं या पाकिस्तानी।
मित्रों,आपको याद होगा कि हमारे रक्षा राज्य मंत्री ने ऐसे लोगों को प्रेश्या कहा था। परंतु मुझे लगता है कि ये लोग उससे भी गये-बीते हैं। इनको प्रेश्या कहना कदाचित अजीजन बाई जैसी वेश्याओं का अपमान होगा जिन्होंने आजादी की लड़ाई में देश के लिए शहादत दी थी। मुझे बरखा,राजदीप,सागरिका जैसे पत्रकारों के ऊपर पूरी तरह से सटीक बैठनेवाले शब्द की तलाश तो है ही साथ ही उस शब्द में ऐसा गुण भी होना चाहिए कि वो भारत के सारे छद्मधर्मनिरपेक्षतावादियों की विशेषताओं को समाहित कर सके। क्या आप इस काम में मेरी मदद करेंगे?